स्वाभिमान - लघुकथा - 51 Lata Agrawal द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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स्वाभिमान - लघुकथा - 51

स्वाभिमान

डॉ लता अग्रवाल

1 - मैं ही कृष्ण हूँ

“व्शी ....!!! जानेमन ! अकेले- अकेले कहाँ चल दीं ...हमसे कहा होता ...संग चल देते |” कराटे क्लास से घर जा रही प्रतिभा को सुनसान रास्ते में कुछ मनचलों ने रोक लिया | सीटी बजाते हुए वे प्रतिभा पर कमेंट्स करने लगे | प्रतिभा ने अपने कदम तेज कर लिए | तभी दो मनचलों ने उसे आगे से घेरते हुए उसका दुपट्टा खींच लिया।

"रुको तो ..कहाँ चल दी द्रोपदी ।" फ़िल्मी अंदाज में कहते हुए उसने प्रतिभा के दुपट्टे को अपनी कलाई पर लपेट लिया।

"वाह भई ! कलयुग में द्रोपदी का चीर हरण।" दूसरा कामुक नजरों से प्रतिभा को घूरता हुआ बोला |

"हा ! हा! हा ! " सभी कुटिलता से अट्टाहस करने लगे । प्रतिभा ने झपटकर अपना दुपट्टा छीनने का प्रयास किया |

“दुपट्टा चाहिए ...हुन्न्नं ...ऐसे नहीं मिलेगा ...हमारी बात माननी पड़ेगी ..द्रोपदी ...हम दु:शासन , दुर्योधन नहीं जो तुम्हें अपनी जंघा पर बैठाएंगे ...बस एक-एक किस हमें दे दो चले जायेंगे |” इठलाते हुए तीसरा मनचला बोला |

"तुम दुःशासन या दुर्योधन के बारे में जानते हो तो द्रोपदी के चीरहरण के बारे में भी जानते ही होंगे |" प्रतिभा ने पलटकर जवाब दिया |

“अरे यार ! ये द्रोपदी तो बोलना भी जानती है | तो चलो जरा हो जाये द्युत का सीन |”

“स्वागत है द्रोपदी ! इस द्युत क्रीडा में तुम्हारा । चलो तो चीर –चीर खेलते हैं |" चौथा मनचला बोला |

“तुम भूल गये शायद जब द्रोपदी का आंचल दु:शासन के हाथ आया तो कैसा महाभारत मचा था, और दुर्योधन को अपनी उस नापाक हरकत के लिए क्या दंड मिला था |"

“अच्छा ! तो आप महाभारत मचाना भी जानती हैं पांचाली !"

“अरे ! नहीं, ये नहीं इनके सखा कृष्ण मचाएंगे महाभारत ।" दूसरा मनचला बोला |

“ओहो ! कहाँ हैं सखा कृष्ण , बुलाओ भाई हम भी देखें।" कहते हुए वे प्रतिभा के और नजदीक आने लगे । अगले ही पल प्रतिभा के हाथ अपने कराटे की मुद्रा में आ गये एक-एक कर सारे मनचले धराशाही पड़े थे | हाथ झाड़ते हुए प्रतिभा बोली,

“मुझे कृष्ण को बुलाने की जरूरत नहीं दु:शासनों, मैं अगर सृष्टि की जन्मदात्री हूँ तो तुम जैसे पापियों के लिए मैं ही चंडी भी हूँ और कृष्ण भी मैं ही हूँ ।"

***

2 - घरानों की परंपरा

हस्तिनापुर साम्राज्य में आज बहुत सरगर्मी है। महल के बाहर कई महिलाएं मदिरापान और द्युत के विरोध में नारेबाजी कर रही थीं | विरोध के स्वर रनिवास तक पहुंचे |

"सेविका ! पता करो बाहर किस बात को लेकर शोर मचा है ?" विश्रामकक्ष में विश्राम कर रही द्रोपदी ने पंखा झल रही सेविका से पूछा |

"महारानी ! ये साम्राज्य की महिलाएं हैं, जो महाराज युधिष्ठिर के समक्ष द्युत क्रीडा एवं मदिरापान पर रोक लगाने का सत्याग्रह करना चाहती हैं। सेविका का यह कथन सुनते ही द्रोपदी तीव्रता से राजमहल के मुख्यद्वार की ओर बढ़ गई।

" महारानी द्रोपदी ! असमय, इस तरह कहाँ चल दीं ?" युधिष्ठिर ने द्रोपदी को टोकते हुए कहा।

"महाराज ! बाहर नगर की स्त्रियाँ द्युत क्रीडा एवं मदिरापान के विरोध में सत्याग्रह कर रही हैं मैं वहीं जा रही हूँ। "

" तुम्हारा वहाँ क्या काम ...प्रिये ?"

"धर्मराज ! मुझसे बेहतर द्युत क्रीडा व मदिरापान के दोष को कौन समझ सकता है|”

"मगर पांचाली, अब उन बातों से क्या लाभ ?...अब तो महाभारत समाप्त हो गया...तुम्हारे खुले केश दु:शासन के लहू से नहा लिए, ..दुर्योधन से तुम्हारे अपमान का बदला भी पूरा हुआ। हमारा राज्य हमें मिल गया... तुम पटरानी बन गईं। फिर क्यों द्रोपदी ?"

"महाराज ! कुरु वंश ने द्युत क्रीडा और मदिरापान का बहुत बड़ा मूल्य चुकाया है । मैं नहीं चाहती कि इस साम्राज्य में फिर कोई नारी किसी युधिष्ठिर के मद्यपायी होने पर किसी दुर्योधन की बदनियति का शिकार हो, फिर से इस साम्राज्य में कोई महाभारत हो |”

" बीती पर बिंदी लगाओ द्रोपदी। और महल में चलो | द्युत और मदिरापान तो राजवंशों के मनोरंजन के साधन हैं ...इन्हें कैसे बंद किया जा सकता है ? "

" कैसे बिंदी लगाऊँ महाराज , द्युत और मदिरापान राजवंशों के लिए मनोरंजन का साधन हो सकते हैं किन्तु नारी मनोरंजन का साधन नहीं ...! आखिर मैं पटरानी हूँ साम्राज्य की । प्रजा मेरे लिए सन्तान तुल्य है, संतान की रक्षा करना धर्म है मेरा । ये परम्पराएं जो बड़े घरानों से चलन में आती हैं वे समाज के लिए पत्थर की लकीर बन संकट का कारण बनती हैं | अत: उन्हें बन्द होना ही होगा महाराज ।" कहते हुए द्रोपदी महल के बाहर खड़ी स्त्रियों की अगुआई में खड़ी हो गई ।

***

3 - अनुत्तरीय प्रश्न

“हे कुरुकुल श्रेष्ठ पितामह ! मैं आपकी कुल वधू आपको प्रणाम करते हुए, यह पूछना चाहती हूँ कि क्या आपकी प्रतिबध्दता, संकल्प केवल राजसिंहासन के प्रति है, कुल वधू की मर्यादा के प्रति क्या आपका कोई दायित्व नहीं ....?” द्युत सभाग्रह में अपमानित कर खींचकर लाई गई द्रोपदी ने भीष्म पितामह से विनती करते हुए पूछा | (पितामह गर्दन झुकाए मौन बैठे हैं )

“ओह ! समझी , जो स्वयं लज्जायुत हैं वे मेरी क्या सहायता करेंगे | आपके लिए संभवतः यह कोई लज्जा का विषय भी न हो ...क्योंकि आप तो स्वयं तीन-तीन नारियों को बलात अपहृत करने के अपराधी हैं |” द्रोपदी ने उपेक्षा दृष्टि पितामह पर डालते हुए कहा |

“काका श्री ! विदुर आप तो कुरु कुल के दिशा-निर्देशक हैं ,..प्रकाण्ड विद्वान् हैं वेद शास्त्रों के ..., अत: हे वेदपाठी आप ही बताइए, क्या किसी शास्त्र में है इस नीच कर्म का कोई दंड ...?” (विदुर पराभिमुख हो धृतराष्ट्र की ओर देखते हैं )

“हुम्म !!! मैं मूर्ख भी किनसे रक्षा की भीख माँग रही हूँ ..., यहाँ सारे मस्तक बिके हुए हैं | लगता है कुलवधू की रक्षार्थ कुरुकुल में कोई विधान ही नहीं |”

“तो मैं हस्तिनापुर नरेश महाराज धृतराष्ट्र और कुरु वंश के गुरु आचार्य द्रोणाचार्य से केवल इतना पूछना चाहती हूँ कि हे महानुभावों ! यदि मेरे स्थान पर महाराज आपकी पुत्री दु:शाला को उसका पति जुएँ में हारता अथवा रजस्वला अवस्था में उसे खींचकर बीच सभा में लाया जाता ...., गुरु द्रोण आपकी पुत्री जयति का चीर हरण किया जाता ...., दुर्योधन द्वारा उसे जंघा पर बैठने ..., कर्ण द्वारा उसे वेश्या की उपाधि देने पर भी क्या आप इसी तरह मौन साधे बैठते ....?”

***

4 - पान्च्य्जन्य घोष

“प्रिय कृष्ण ! आज तुम्हारी शिक्षा पूर्ण हो रही है ...तुम अब अपने गृह की और प्रस्थान करोगे |” ब्रह्म ज्ञानी गुरु संदीपनी ने अंतिम दिन श्री कृष्ण से वार्तालाप करते हुए कहा |

“जी गुरु देव, मन तो व्यथित है, आपसे बिछड़ने का दुःख भी है | किन्तु ...”

बैठक में चल रहे टेलीविजन पर रघुनंदन जी की माता केला देवी, पत्नी लीला, भाभी और बेटी शांत भाव से श्रीकृष्ण लीला देख रहे थे कि दो दिन पूर्व विवाह होकर आई बहू रोमा भी आकर सबके बीच बैठ टेलीविजन देखने लगी |

“यशोदा नंदन तुम्हारे जाने से गुरुकुल सुना हो जायेगा ...बहुत याद आओगे कान्हा ..|” नम आँखों से गुरु पत्नी सुषुश्रा ने संदीपनी आश्रम से चौसठ कलाओं की शिक्षा प्राप्त कर गृह प्रस्थान कर रहे श्रीकृष्ण की बलैय्या लेते हुए कहा |

रोमा के बैठक में सबके बीच बैठते ही रघुनंदन जी की माता जी ने अपने बेटे की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से घूर कर देखा ...मानो कह रही हो ,

‘और लाओ पढ़ी –लिखी बहू ...अच्छी भली गाँव की संस्कारी लड़की देखी थी मैंने ...अब देख लो संस्कार...बेल्क्खन्नी ! यूँ सबके बीच .... |’ रघुनंदन जी ने माँ के भाव समझते हुए अपनी पत्नी लीला की ओर प्रश्न भरी दृष्टि से घूरकर देखा, मानो कह रहे हों ,

‘तुमसे इतना भी नो सका कि बहू को घर के तौर तरीके सिखा दें ...हमारे यहाँ बहुएं यूँ बैठक में सबके सामने आकर नहीं बैठतीं ...उनका स्थान रसोई में हैं वह भी घूंघट के अंदर ...|’

“हे कृष्ण ! तुमने तो हमें बहुत मधुर स्मृतियाँ दी हैं जिन्हें हम सदैव अपने दिल में संजोकर रखेंगे ...हम तुम्हें भी कुछ भेंट देना चाहते हैं |” ऋषि संदीपनी और ऋषि पत्नी सुषुश्रा ने एक स्वर में कहा |

“अहो भाग्य गुरु देव ! मैं उस भेंट को अपने शीश से लगाकर रखूँगा |” दोनों ने श्रीकृष्ण को एक शंख भेंट किया |

“पांचजन्य शंख ...! यह तो वही अनमोल शंख है गुरुदेव जो समुद्र मंथन में चौदह रत्नों संग प्राप्त हुआ था !” श्रीकृष्ण ने कहा |

“हाँ ! वत्स तुम ही इसके सच्चे उतराधिकारी हो | तुम इससे पुराने युग की समाप्ति और नये युग के आरम्भ का शंखनाद करोगे |” गुरु के इतना कहते ही श्रीकृष्ण ने उसी पल पान्चजन्य फूँक कर पुराने युग की समाप्ति और नये युग के सूत्रपात का जयघोष कर दिया |

लीला ने एक पल को सासु माँ की ओर देखा ..., फिर आँखों में दृढ़ता भर पति को देखा ,मानो कह रही हो बहुत ढो लिया पुरानी सड़ी गली मान्यताओं को ... और खड़े हो उसने भी ऊँचे स्वर में नये युग की घोषणा कर ही दी,

“आज से घर में बहु-बेटी एक समान रहेंगी |”

***