यह कहानी इस बात पर केंद्रित है कि संसदीय जनतंत्र और कल्याणकारी राज्य अब एक-दूसरे के लिए कार्य नहीं कर रहे हैं, बल्कि पूंजीवादी जनतंत्र में बदल गए हैं। लेखक विवेकानंद राय का कहना है कि आगामी आम चुनाव में चर्चा का विषय यह नहीं होना चाहिए कि कौन जीतेगा, बल्कि यह होना चाहिए कि सरकार कितनी संप्रभु और जनपक्षधर होगी। उन्होंने बताया कि पिछले चुनावों में सरकारों की संप्रभुता में गिरावट आई है, और इसका कारण अंतरराष्ट्रीय दबाव है। सैन्य पूँजीवाद इस दबाव का प्रमुख घटक है, जो युद्ध और आतंकवाद को बढ़ावा देता है। भारत सैन्य सामग्री का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है, जिससे यह पूंजीवाद की नीतियों को प्रभावित करता है। राय यह भी बताते हैं कि अन्य पूंजीवादी समूह भी महत्वपूर्ण हैं और चुनावों में सभी प्रकार की पूंजी का समान अभियान चल रहा है। नई अर्थनीतियों ने अधिकांश राजनीतिक दलों को कमजोर कर दिया है और उनकी नीतियां बहुत हद तक समान हो गई हैं। सामाजिक-सांस्कृतिक नीतियों में भिन्नता भी केवल याचना की है, चुनौती की नहीं। इस प्रकार, आने वाले चुनावों में जनतंत्र की स्थिति पर गंभीर सवाल उठता है। और जनता हार जायेगी vivekanand rai द्वारा हिंदी पत्रिका 1.2k 2.6k Downloads 8.3k Views Writen by vivekanand rai Category पत्रिका पढ़ें पूरी कहानी मोबाईल पर डाऊनलोड करें विवरण वे दिन बीत गए जब संसदीय जनतंत्र और कल्या्णकारी राज्य् एक-दूसरे के लिए कार्य करते थे। हालांकि दोनों औद्योगिक पूँजी के ही उत्पारद हैं। अब संसदीय जनतंत्र पूँजीवादी जनतंत्र में तब्दीमल हो चुका है, इसलिए उसकी प्रक्रिया और परिणति पर कोई दुविधा बेमानी है। फिर भी औचित्यं के लिए कुछ नाटक तो करने ही पड़ते हैं । इसके तहत फिलहाल राज्यई प्रायोजित बहस इस गणित पर कराई जा रही है कि आगामी आमचुनाव में किस दल, गठबंधन और नेता की जीत होगी और किसकी सरकार बनेगी। दरअसल, विचार और बहस इस पर होनी चाहिए कि आगामी लोकसभा और सरकार कितनी संप्रभु और जनपक्षधर होगी। इस कोण से चिंतन और चर्चा का कारण यह है कि भूमंडलीकृत भारत में जितने लोकसभा चुनाव हुए हैं और उनकी कोख से जितनी भी भारत सरकारें बनी हैं, उनकी संप्रभुता में निरंतर गिरावट हुई है। ऐसा इसलिए हुआ है कि भयावह अंतरराष्ट्री य दबावतंत्र देश पर काबिज़ करा दिया गया है और सरकारें उनकी मन-माफ़िक चल रही है। इस स्थिति में ज़ाहिर है कि सोलहवाँ लोकसभा चुनाव भी पहले की तरह भीषण दबावतंत्र के साए में होगा। अब सिर्फ़ यह पहचानने की ज़रूरत है कि इस दबावतंत्र में कौन-कौन सी शक्िण दयाँ और घटक भागीदार हैं। यदि शिखर से धरातल तक दबावतंत्र में भागीदारी की सूची बनाई जाए तो नामावली काफ़ी विस्तृतत होगी, इसलिए कुछ महत्व पूर्ण शक्िावतयों और घटकों को रेखांकित करना ही सामयिक और प्रासंगिक है। More Likes This नेहरू फाइल्स - भूल-85 द्वारा Rachel Abraham इतना तो चलता है - 3 द्वारा Komal Mehta जब पहाड़ रो पड़े - 1 द्वारा DHIRENDRA SINGH BISHT DHiR कल्पतरु - ज्ञान की छाया - 1 द्वारा संदीप सिंह (ईशू) नव कलेंडर वर्ष-2025 - भाग 1 द्वारा nand lal mani tripathi कुछ तो मिलेगा? द्वारा Ashish आओ कुछ पाए हम द्वारा Ashish अन्य रसप्रद विकल्प हिंदी लघुकथा हिंदी आध्यात्मिक कथा हिंदी फिक्शन कहानी हिंदी प्रेरक कथा हिंदी क्लासिक कहानियां हिंदी बाल कथाएँ हिंदी हास्य कथाएं हिंदी पत्रिका हिंदी कविता हिंदी यात्रा विशेष हिंदी महिला विशेष हिंदी नाटक हिंदी प्रेम कथाएँ हिंदी जासूसी कहानी हिंदी सामाजिक कहानियां हिंदी रोमांचक कहानियाँ हिंदी मानवीय विज्ञान हिंदी मनोविज्ञान हिंदी स्वास्थ्य हिंदी जीवनी हिंदी पकाने की विधि हिंदी पत्र हिंदी डरावनी कहानी हिंदी फिल्म समीक्षा हिंदी पौराणिक कथा हिंदी पुस्तक समीक्षाएं हिंदी थ्रिलर हिंदी कल्पित-विज्ञान हिंदी व्यापार हिंदी खेल हिंदी जानवरों हिंदी ज्योतिष शास्त्र हिंदी विज्ञान हिंदी कुछ भी हिंदी क्राइम कहानी