कहानी "कर्मभूमि" में प्रेमचंद ने एक छोटे से गांव का चित्रण किया है, जहां गंगा नदी की सुंदरता और पहाड़ की शांति का सामंजस्य है। इस गांव में कुछ झोंपड़े हैं, जहां लोग अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहानी का मुख्य पात्र, अमरकांत, एक युवक है जो परदेशी के रूप में गांव में आता है। वह कई महीनों से गांवों का दौरा कर रहा है और वहां की साधारण और सीधे-सादे लोगों की जीवनशैली से प्रभावित है। अमरकांत जात-पांत के भेदभाव को नहीं मानता और मानता है कि सच्चाई और ईमानदारी ही सबसे महत्वपूर्ण हैं। भविष्य के लिए अपनी तैयारी करते हुए, वह ग्रामीणों के प्रति हो रहे अन्याय को देखकर क्रोधित होता है। एक बुढ़िया से मिलने पर, वह उसकी मदद करता है और उसके स्नेह को स्वीकार करता है। बुढ़िया अपनी दरिद्रता के बावजूद उसे दूध देती है, जो अमरकांत के लिए एक गहरी संवेदना का कारण बनता है। कहानी में अमरकांत की तपस्या और संघर्ष को दर्शाया गया है, जो समाज में व्याप्त अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का संकल्प करता है। यह कहानी ग्रामीण जीवन की सच्चाई और मानवीय मूल्यों की महत्वपूर्णता को उजागर करती है। कर्मभूमि अध्याय 2 Munshi Premchand द्वारा हिंदी लघुकथा 13.1k 6.7k Downloads 18.6k Views Writen by Munshi Premchand Category लघुकथा पढ़ें पूरी कहानी मोबाईल पर डाऊनलोड करें विवरण कर्मभूमि प्रेमचन्द का राजनीतिक उपन्यास है जो पहली बार १९३२ में प्रकाशित हुआ। शहर छोड़कर वे हरिद्वार के पास एक ऐसे देहाती इलाके में पहुँचे चहाँ मुर्दाखोर और अछूत कहे जाने वाले लोग और किसान रहते थे। वे सलोनी के यहाँ रहते हुए गूदड़, प्रयाग, काशी आदि के सम्पर्क में आये और गाँववालों में शिक्षा, अच्छी- अच्छी आदतों, सफाई आदि का प्रचार करने प्रचार करने लगे। यहाँ रहते हुए उनकी मुन्नी से भेंट हुई। दोनों में परस्पर आकर्षण भी उत्पन्न हुआ। काशी से आये आत्मानन्द से उन्हें अपने सेवा- कार्य में बराबर सहायत प्राप्त होती रहती थी। कृषकों की सहायता के लिए वे महंत आशाराम गिरि से मिले किंतु उन्हें अधिक सफलता प्राप्त न हुई किंतु काशी में सुखदा के त्याग समाचार सुनकर भी वे उत्तेजित हो उठाते हैं और लगानबन्दी का आंदोलन शुरू कर देते हैं। उनका पुराना मित्र सलीम, अब आई. सी. एस. ऑफिसर और उस इलाके का इंचार्ज, उन्हें पकड़ ले जाता है। किंतु लाला समरकांत, जिनमें अब परिवर्तन हो चुका था, जन - सेवा की ओर मुड़कर उसी इलाके में पहुँच जाते हैं और किसान - आन्दोलन के सिलसिले में कारावास दण्ड भी भुगतते हैं। उनके प्रभाव से सलीम के हृदय में भी परिवर्तन हो जाता है। वह स्वंय आन्दोलन की बागडोर सम्हालता है और अंत में पकड़ा जाता है। तत्पश्चत मुन्नी और सकीना (वह भी उस इलाके में पहुँच जाती है) भी गिरफ़्तार हो जाती हैं। उग्र आत्मनन्द भी सरकारी शिकंजे से बच नहीं पाते। Novels कर्मभूमि कर्मभूमि प्रेमचन्द का राजनीतिक उपन्यास है जो पहली बार १९३२ में प्रकाशित हुआ। अमरकांत बनारस के रईस समरकांत के पुत्र हैं। वे विद्यार्थी- जीवन से ही... More Likes This लोकतंत्र की ज़मीनी सच्चाई - 1 द्वारा Std Maurya दिल्ली जिमखाना क्लब द्वारा Devendra Kumar Fake Boyfriend real Feelings - 1 द्वारा Mawaskar Pratigya कॉल - 1 द्वारा sky कुछ बातें मां बाप के दिल की । - 3 द्वारा miss k पढ़ाकू द्वारा Vandna Sharma कोन्निचिवा: माय देसी लव - 1 द्वारा Kajal Soam अन्य रसप्रद विकल्प हिंदी लघुकथा हिंदी आध्यात्मिक कथा हिंदी फिक्शन कहानी हिंदी प्रेरक कथा हिंदी क्लासिक कहानियां हिंदी बाल कथाएँ हिंदी हास्य कथाएं हिंदी पत्रिका हिंदी कविता हिंदी यात्रा विशेष हिंदी महिला विशेष हिंदी नाटक हिंदी प्रेम कथाएँ हिंदी जासूसी कहानी हिंदी सामाजिक कहानियां हिंदी रोमांचक कहानियाँ हिंदी मानवीय विज्ञान हिंदी मनोविज्ञान हिंदी स्वास्थ्य हिंदी जीवनी हिंदी पकाने की विधि हिंदी पत्र हिंदी डरावनी कहानी हिंदी फिल्म समीक्षा हिंदी पौराणिक कथा हिंदी पुस्तक समीक्षाएं हिंदी थ्रिलर हिंदी कल्पित-विज्ञान हिंदी व्यापार हिंदी खेल हिंदी जानवरों हिंदी ज्योतिष शास्त्र हिंदी विज्ञान हिंदी कुछ भी हिंदी क्राइम कहानी