यह कहानी विभव दा की दाढ़ी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक साधारण विषय होते हुए भी उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गई। विभव दा ने अपनी दाढ़ी रखी थी, जो उनके लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रतीक थी। लेकिन समाज के दकियानूसी और आलोचनात्मक दृष्टिकोण ने उनके इस फैसले को विवाद का कारण बना दिया। लोग उनके दाढ़ी रखने पर अनर्गल टिप्पणियाँ करने लगे, जैसे कि यह उनकी छवि को बिगाड़ रहा है या उनके करियर पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा। विभव दा के लिए यह सब अपमानजनक था, और यह उनकी व्यक्तिगत पसंद पर अतिक्रमण जैसा महसूस हुआ। कहानी इस बात पर जोर देती है कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद, जैसे कि दाढ़ी रखना, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है और इसे समाज या लोगों की नुक्ताचीनी से नहीं आंका जाना चाहिए। विभव दा की स्थिति को समझना और उनकी दृष्टि से देखना जरूरी है, ताकि हम उनकी त्रासदी को सही तरीके से महसूस कर सकें। अंततः, यह कहानी समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक मानकों के बीच के संघर्ष को उजागर करती है। Vibhav Da ki Dadhi Vinod Viplav द्वारा हिंदी लघुकथा 617 1.7k Downloads 9.6k Views Writen by Vinod Viplav Category लघुकथा पढ़ें पूरी कहानी मोबाईल पर डाऊनलोड करें विवरण जातीयता और साम्प्रदायिकता की पड़ताल करती कहानी विभव दा की दाढ़ी बिहार की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी है जहां जाती का भेदभाव धार्मिक भेदभाव से अधिक गहरा है। विनोद विप्लव की कलम से लिखी गई इस कहानी में यह दिखाया गया है कि कई बार साम्प्रदायिकता की काट के रूप में जातिवाद उभरता है। यह कहानी मंडल और कमंडल की राजनीति की पृष्ठभूमि में लिखी गई थी, लेकिन आज भी यह सामयिक जान पड़ती है। विनोद विप्लव की प्रमुख कहानियों में ‘‘अवरोध’’, ’’विभव दा की दाढ़ी’’, ’’रक्तबीज’’, ‘‘चक्रव्यूह’’ आदि प्रमुख है। विनोद विप्लव ने करीब ढाई दशक से अधिक समय से लेखन एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। स्कूल के दिनों से ही कहानी लेखन में विशेष दिचलस्पी रही। देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में उनकी कई कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘‘अवरोध’’ नामक उनकी कहानी को दिल्ली सरकार की हिन्दी अकादमी की ओर से प्रथम नवोदित लेखन पुरस्कार मिल चुका है। इसके अलावा हिन्दी अकादमी के वित्तीय सहयोग से उनका पहला कहानी संग्रह ‘‘विभव दा का अंगूठा’’ प्रकाश्तिा हुआ। पिछले कुछ वर्षों के दौरान उन्होंने मीडिया और राजनीति पर कई व्यंग्य भी लिखे जो नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान और जनसत्ता जैसे अखबारों तथा मीडिया आधारित वेबसाइटों में प्रकाशित हुए हैं। मीडिया को लेकर उनके व्यंग्य काफी पसंद किये गये। इन व्यंग्यों का संग्रह ‘‘ढिबरी चैनल‘‘ तैयार किया गया है जो शीघ्र प्रकाषित होने वाला है। उन्होंने महान गायक मोहम्मद रफी की पहल जीवनी (मेरी आवाज सुनो) के अलावा अभिनय सम्राट दिलीप कुमार तथा हरफनमौला अभिनेता-निर्देशक राजकपूर एवं सदाबहार अभिनेता देव आनंद पर पुस्तकें लिखी है। इसके अलावा सिनेमा जगत की 140 हस्तियों के बारे में ’’हिन्दी सिनेमा के 150 सितारे’’ नामक पुस्तक लिखी है। More Likes This उड़ान (1) द्वारा Asfal Ashok नौकरी द्वारा S Sinha रागिनी से राघवी (भाग 1) द्वारा Asfal Ashok अभिनेता मुन्नन द्वारा Devendra Kumar यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (1) द्वारा Ramesh Desai मां... हमारे अस्तित्व की पहचान - 3 द्वारा Soni shakya शनिवार की शपथ द्वारा Dhaval Chauhan अन्य रसप्रद विकल्प हिंदी लघुकथा हिंदी आध्यात्मिक कथा हिंदी फिक्शन कहानी हिंदी प्रेरक कथा हिंदी क्लासिक कहानियां हिंदी बाल कथाएँ हिंदी हास्य कथाएं हिंदी पत्रिका हिंदी कविता हिंदी यात्रा विशेष हिंदी महिला विशेष हिंदी नाटक हिंदी प्रेम कथाएँ हिंदी जासूसी कहानी हिंदी सामाजिक कहानियां हिंदी रोमांचक कहानियाँ हिंदी मानवीय विज्ञान हिंदी मनोविज्ञान हिंदी स्वास्थ्य हिंदी जीवनी हिंदी पकाने की विधि हिंदी पत्र हिंदी डरावनी कहानी हिंदी फिल्म समीक्षा हिंदी पौराणिक कथा हिंदी पुस्तक समीक्षाएं हिंदी थ्रिलर हिंदी कल्पित-विज्ञान हिंदी व्यापार हिंदी खेल हिंदी जानवरों हिंदी ज्योतिष शास्त्र हिंदी विज्ञान हिंदी कुछ भी हिंदी क्राइम कहानी