बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, जिन्हें मानवता का मशीहा और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है, का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू में हुआ। वह महार जाति से थे, जिसे समाज में अछूत समझा जाता था। उनके पिता रामजी सकपाल भारतीय सेना में सुबेदार रहे और उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया और 1956 में उन्हें बोधिसत्व की उपाधि दी गई। उन्हें भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है। उन्होंने जातीय भेदभाव के बावजूद कई शैक्षिक, प्रशासनिक और सामाजिक सुधार किए। उनके योगदान के लिए उन्हें 1990 में भारत रत्न और 2004 में कोलंबियन अहेड ऑफ देअर टाइम जैसे सम्मान मिले। उनका विवाह 1906 में रमाबाई से हुआ, और उनके चार पुत्र और एक पुत्री थी। उनके जीवन ने समाज में शिक्षा और समानता के लिए एक नई दिशा प्रदान की। मानवता के मशीहा - बाबा साहेब Lakshmi Narayan Panna द्वारा हिंदी जीवनी 53.1k 4.3k Downloads 13.8k Views Writen by Lakshmi Narayan Panna Category जीवनी पढ़ें पूरी कहानी मोबाईल पर डाऊनलोड करें विवरण मानवता का मशीहा , नारी मुक्तिदाता , ज्ञान का प्रतीक या आधुनिक भारत के सम्विधान का जनक कहें । उनकी महानता , जीवन संघर्ष और उपलब्धियों से देश का प्रत्येक व्यक्ति परिचित है । बहुजन समाज उन्हें प्यार से बोधिसत्व बाबा साहब भीमराव अंबेडकर कहता है । उनकी विद्वता की सराहना भारत ही नही अपितु विदेशों में भी होती है । बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का जीवन बहुत ही कष्टों में बीता परंतु उन्होंने हार नही मानी और दुनिया में ज्ञान का प्रतीक बने । बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात 1956 में उन्हें बोधिसत्व की उपाधि से सम्मानित किया गया । बाबा साहेब भीमराव की भारत की आजादी में सक्रिय भूमिका से लेकर तमाम शैक्षिक ,प्रशासनिक एवं सामाजिक सुधारों के बावजूद भी जातीय भेदभाव के चलते उनके परिनिर्वाण से काफी लम्बे समय बाद सन 1990 में उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया । सन 2004 में उन्हें पहले कोलंबियन अहेड ऑफ देअर टाईम से सम्मानित किया गया और 2012 में उन्हें द ग्रेटेस्ट इंडियन More Likes This खण्ड - 01 महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - 1.. बाप्पा रावल : मेवाड़ के संस्थापक राजा द्वारा Hind Gaurav सम्राट अशोक : तलवार, युद्ध और धर्म - 1 द्वारा Rishav raj मैं दादा-दादी की लाड़ली - 1 द्वारा sapna यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (2) द्वारा Ramesh Desai नकल से कहीं क्रान्ति नहीं हुई - 1 द्वारा Dr. Suryapal Singh अवसान विहीन अरुणेश द्वारा नंदलाल मणि त्रिपाठी प्रेमानंद जी : राधा-कृष्ण लीला के रसिक साधक - 1 द्वारा mood Writer अन्य रसप्रद विकल्प हिंदी लघुकथा हिंदी आध्यात्मिक कथा हिंदी फिक्शन कहानी हिंदी प्रेरक कथा हिंदी क्लासिक कहानियां हिंदी बाल कथाएँ हिंदी हास्य कथाएं हिंदी पत्रिका हिंदी कविता हिंदी यात्रा विशेष हिंदी महिला विशेष हिंदी नाटक हिंदी प्रेम कथाएँ हिंदी जासूसी कहानी हिंदी सामाजिक कहानियां हिंदी रोमांचक कहानियाँ हिंदी मानवीय विज्ञान हिंदी मनोविज्ञान हिंदी स्वास्थ्य हिंदी जीवनी हिंदी पकाने की विधि हिंदी पत्र हिंदी डरावनी कहानी हिंदी फिल्म समीक्षा हिंदी पौराणिक कथा हिंदी पुस्तक समीक्षाएं हिंदी थ्रिलर हिंदी कल्पित-विज्ञान हिंदी व्यापार हिंदी खेल हिंदी जानवरों हिंदी ज्योतिष शास्त्र हिंदी विज्ञान हिंदी कुछ भी हिंदी क्राइम कहानी