इस कहानी में सुरेश मास्साब बस में चढ़ते हैं और देखते हैं कि ड्राइवर भूरा नहीं है। बस में सामान्यत: भीड़ होती थी, लेकिन आज बस में उदासी है। लोग आमतौर पर जल्दी आकर सीटें कब्जा कर लेते हैं और अपने बैग से बगल की सीट भी घेर लेते हैं। बस में सवार होते समय सभी लोग एक समान हो जाते हैं, जहां पुरुष 'सर' और महिलाएं 'मैडम' बन जाते हैं। इस परिवेश में सामाजिक भेदभाव समाप्त हो जाता है और सभी एक साथ यात्रा करते हैं, यह दर्शाते हुए कि बस यात्रा एक अस्थायी समानता का अनुभव प्रदान करती है। पहचान Rajesh Zarpure द्वारा हिंदी लघुकथा 1.5k 1.7k Downloads 9.6k Views Writen by Rajesh Zarpure Category लघुकथा पढ़ें पूरी कहानी मोबाईल पर डाऊनलोड करें विवरण पहचान राजेश झरपुरे जब सुरेश मास्साब बस में चढ़े तो ड्राइविंग सीट पर मरियल सा आदमी बैठा दिखा। हालाँकि रोज़ कोई और उस सीट पर बैठा होता। वे उसे अच्छी तरह जानते थे। उसका नाम भूरा है। वह बस का नियमित ड्राइवर है। आज नहीं आया होगा। सोचकर उन्होंने उधर से निगाह हटा ली अन्यथा नमस्ते करने की बनती थी, जैसा सोचकर ही उनकी दृष्टि वहाँ गई थी। कन्डक्टर बस के दरवाज़े पर खड़ा सवारी की प्रतीक्षा कर रहा था। वह थोड़ा खुश हुआ पर चन्द निमेष में पुनः परेशान दिखने लगा। उसकी बेचैनी चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी। बस More Likes This नेहरू फाइल्स - भूल-113 द्वारा Rachel Abraham प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम - 2 द्वारा Abantika हिकमत और कमाई द्वारा Devendra Kumar उड़ान (1) द्वारा Asfal Ashok नौकरी द्वारा S Sinha रागिनी से राघवी (भाग 1) द्वारा Asfal Ashok अभिनेता मुन्नन द्वारा Devendra Kumar अन्य रसप्रद विकल्प हिंदी लघुकथा हिंदी आध्यात्मिक कथा हिंदी फिक्शन कहानी हिंदी प्रेरक कथा हिंदी क्लासिक कहानियां हिंदी बाल कथाएँ हिंदी हास्य कथाएं हिंदी पत्रिका हिंदी कविता हिंदी यात्रा विशेष हिंदी महिला विशेष हिंदी नाटक हिंदी प्रेम कथाएँ हिंदी जासूसी कहानी हिंदी सामाजिक कहानियां हिंदी रोमांचक कहानियाँ हिंदी मानवीय विज्ञान हिंदी मनोविज्ञान हिंदी स्वास्थ्य हिंदी जीवनी हिंदी पकाने की विधि हिंदी पत्र हिंदी डरावनी कहानी हिंदी फिल्म समीक्षा हिंदी पौराणिक कथा हिंदी पुस्तक समीक्षाएं हिंदी थ्रिलर हिंदी कल्पित-विज्ञान हिंदी व्यापार हिंदी खेल हिंदी जानवरों हिंदी ज्योतिष शास्त्र हिंदी विज्ञान हिंदी कुछ भी हिंदी क्राइम कहानी