भारत को आज़ाद हुए अभी कुछ ही वर्ष हुए थे। देश स्वतंत्र हो चुका था, लेकिन गाँवों की गरीबी अभी भी वैसी ही थी, जैसे आज़ादी की किरण पहाड़ों के उस पार कहीं रुक गई हो। पेट की आग, कर्ज का बोझ और अभाव से भरा जीवन करोड़ों लोगों की नियति बना हुआ था। जिस धरती पर वीर सिद्धू-कान्हू मुर्मू ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँका था, उसी संताल परगना के एक पहाड़ी इलाके में जिलिंग टांडी नाम का एक छोटा-सा गाँव था।
बांसुरी की धुन - भाग 1
बांसुरी की वह धुनभाग — प्रथमभारत को आज़ाद हुए अभी कुछ ही वर्ष हुए थे।देश स्वतंत्र हो चुका था, गाँवों की गरीबी अभी भी वैसी ही थी, जैसे आज़ादी की किरण पहाड़ों के उस पार कहीं रुक गई हो। पेट की आग, कर्ज का बोझ और अभाव से भरा जीवन करोड़ों लोगों की नियति बना हुआ था।जिस धरती पर वीर सिद्धू-कान्हू मुर्मू ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँका था, उसी संताल परगना के एक पहाड़ी इलाके में जिलिंग टांडी नाम का एक छोटा-सा गाँव था।चारों ओर पहाड़ थे, घने जंगल थे और लाल मिट्टी की सँकरी ...और पढ़े
बांसुरी की धुन - भाग 2
जयगुरु श्रीमान् बांसुरी की वह धुनभाग द्वितीय — जागरणरामलाल तेज कदमों से दौड़ता हुआ घने जंगल में जा पहुँचा।वही कभी वह बचपन में बकरियाँ चराया करता था।वही पहाड़...वही पेड़...और वही बड़ी-सी चट्टान, जिस पर बैठकर उसने पहली बार बाँसुरी में सुर भरना सीखा था।वर्षों बाद उस चट्टान को देखते ही उसके कदम लड़खड़ा गए।वह वहीं गिर पड़ा।हाथ-पाँव शिथिल हो गए। साँसें तेज चलने लगीं। उसके मुँह से झाग निकलने लगा और कुछ ही क्षणों में उसकी आँखें बंद हो गईं।वह बेहोश हो चुका था।उसके भीतर जैसे वर्षों का संचित दर्द एक साथ उठ खड़ा हुआ था। मानो स्मृतियों की ...और पढ़े
बांसुरी की धुन - भाग 3
रामलाल ने अपनी माँ की मृत देह को धीरे से जमीन पर रख दिया।कुछ क्षण तक वह निःशब्द माँ चेहरे को देखता रहा। फिर जैसे उसके भीतर वर्षों से दबा हुआ कोई बाँध अचानक टूट गया। वह जोर से दहाड़ मारकर रो पड़ा।“भैया... मेरे चलते माँ ने हमें छोड़ दिया।”फिर उसने अपनी भाभी की ओर मुड़कर कहा—“भाभी माँ के समान होती हैं... तुम मुझे अवश्य माफ करोगी।”उसकी आवाज काँप रही थी।फिर वह माँ के निर्जीव चेहरे की ओर देखकर फूट-फूटकर बोला—“नानकू की माँ... मैंने जिंदगी भर तुझे केवल आँसू दिए। मुझे माफ कर देना।”चम्पा मुर्मू भी अपने आँसू रोक ...और पढ़े
बांसुरी की धुन - भाग 4
रामलाल की पहली वाणी"जयगुरु..."रामलाल के मुँह से निकला यह एक शब्द पूरे प्रांगण में जैसे ठहर गया।उसने सामने बैठे की ओर देखा। सैकड़ों आँखें उसी पर टिकी थीं।उसके हाथ काँप रहे थे।माइक पकड़ने का यह उसका पहला अवसर था।कुछ क्षण वह मौन खड़ा रहा। फिर उसने गहरी साँस ली और धीरे-धीरे बोलना शुरू किया—"जयगुरु... आप सभी को।"उसकी आवाज में न वक्ता का आत्मविश्वास था, न किसी विद्वान का गर्व।वहाँ केवल एक पश्चाताप से भरे मनुष्य की सच्चाई थी।"मैं कोई ज्ञानी नहीं हूँ... न गुणी हूँ।"भीड़ बिल्कुल शांत थी।"मैंने ऐसी कोई गली, चौक या रास्ता नहीं छोड़ा, जहाँ मैं शराब ...और पढ़े
बांसुरी की धुन - भाग 5
बांसुरी की धुनभाग : ०५प्रश्न जटिल था, लेकिन रावण हेंब्रम के चेहरे पर अब भी वही शांति थी।उन्होंने कुछ उस व्यक्ति की ओर देखा, फिर थोड़ा गंभीर होकर बोले—“भाई, आपने जो प्रश्न किया है, वह केवल आपका प्रश्न नहीं है। ऐसे प्रश्न बहुत-से लोगों के मन में हैं। इसलिए इसका उत्तर भी स्पष्ट होना चाहिए।”उन्होंने माइक को थोड़ा पास किया।“युगपुरुष वही होते हैं, जिनके जीवन में सत्य और आदर्श का प्रकाश दिखाई देता है। मनुष्य जन्म से मनुष्य ही होता है। परमात्मा की दृष्टि में किसी मनुष्य का मूल्य केवल उसकी जन्मभूमि या कुल से निर्धारित नहीं होता।”सभा शांत ...और पढ़े
बांसुरी की धुन - भाग 6
बांसुरी की धुनभाग : ०६रावण हेंब्रम ने धीरे-धीरे सभा की ओर देखा। उनके चेहरे पर संतोष की हल्की मुस्कान सामने बैठे लोगों की आँखों में अभी भी प्रश्नों की चमक थी।उन्होंने कहा—“मुझे बहुत अच्छा लगा। यहाँ के भक्तवृंद काफी जिज्ञासु हैं। इनके प्रश्न भी उतने ही गहरे हैं। ज्ञान अनंत है और हम सब उस अनंत ज्ञान के पथिक हैं। आज हमने जो समझा है, वह अंतिम सत्य नहीं है। समझने और सीखने की यात्रा निरंतर चलती रहती है।”संध्या अब धीरे-धीरे प्रांगण पर उतर रही थी। दूर पश्चिम के आकाश में सूर्य की अंतिम लालिमा शेष थी। पेड़ों की ...और पढ़े