खील बताशे से लेकर महंगे गिफ्ट तक
लेखिका: डॉ. वंदना शर्मा
दीपावली पर्व सभी के लिए खुशियाँ लेकर आता है। खरीदने वाला भी खुश, बेचने वाला भी खुश। मिठाई से लेकर बेशकीमती हीरे तक सब बिकता है। धनतेरस से भाई दूज तक यह त्योहार सबके घर अन्न-धन बरसाता है। सभी अपनी सामर्थ्य से ज्यादा खरीदारी करते हैं। नए कपड़े, नया फ्रिज, नया घर, चारों तरफ जगमगाती रोशनी।
आधुनिक समय में यह पर्व और भी भव्य हो गया है। करोड़ों का व्यापार, लेन-देन और उपहार का आदान-प्रदान होता है। सभी अपनी सामर्थ्य अनुसार अपने परिचितों को बढ़िया गिफ्ट देते हैं। कुछ लोग सामने वाले की कुर्सी, पावर या हैसियत देखकर गिफ्ट की कीमत लगाते हैं।
दस-पंद्रह साल पहले दीपावली पूजन के बाद सभी अपने पड़ोसियों को खोये-बताशे, मिठाइयां बांटकर खुशी मनाते थे। अब महंगे गिफ्ट ने खोये-बताशे की जगह ले ली। ड्राई-फ्रूट्स ने मिलावटी मिठाई को ठिकाने लगा दिया। अब तो काजू, बादाम, किचन आइटम, कुछ भी दे सकते हैं गिफ्ट में। लेने वाला भी खुश और देने वाला भी खुश।
दीपावली केवल दीयों का त्योहार नहीं है, यह रिश्तों को रोशन करने का त्योहार है। साल भर की भागदौड़ के बाद यह पर्व हमें एक-दूसरे के करीब लाता है। गिफ्ट इसी करीब आने का माध्यम है। जब हम किसी को गिफ्ट देते हैं, तो असल में हम कहते हैं कि तुम हमारे लिए महत्वपूर्ण हो, हम तुम्हें भूले नहीं हैं।
पहले गिफ्ट का अर्थ दिखावा नहीं था। पड़ोस में एक कटोरी खीर या मुट्ठी भर बताशे ही काफी थे। उनमें मिठास बाजार की नहीं, मन की होती थी। लोग दरवाजा खटखटाकर कहते थे, प्रसाद ले लीजिए, और इसी बहाने हाल-चाल पूछ लेते थे। रिश्ते ऐसे ही छोटे आदान-प्रदान से मजबूत होते थे।
आज गिफ्ट सुंदर पैकिंग में, बड़े ब्रांड के नाम के साथ आता है। दफ्तरों में, व्यापार में गिफ्ट देना औपचारिकता भी बन गया है। कई बार गिफ्ट की कीमत से सामने वाले का पद नापा जाता है। यहीं पर त्योहार की आत्मा कमजोर पड़ जाती है। क्योंकि गिफ्ट का मूल्य उसके दाम से नहीं, उसके पीछे की भावना से तय होना चाहिए।
क्या गिफ्ट देना ही प्यार जताने का एकमात्र तरीका है? कई बार एक छोटा सा फोन, एक मिलने आना, एक साथ चाय पीना, किसी बड़े गिफ्ट से ज्यादा सुकून देता है। बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ा गिफ्ट समय है। बच्चों के लिए सबसे बड़ा गिफ्ट माता-पिता का साथ है। पड़ोसी के लिए सबसे बड़ा गिफ्ट मुस्कान और अपनापन है।
इसलिए गिफ्ट चुनते समय थोड़ा ठहरकर सोचना चाहिए। क्या हम गिफ्ट दिखावे के लिए दे रहे हैं या दिल से दे रहे हैं? क्या हम अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर रहे हैं? प्लास्टिक की पैकिंग से बचकर हम सादा, उपयोगी गिफ्ट दे सकते हैं। जैसे पौधा, किताब, घर की बनी मिठाई, हाथ से लिखा कार्ड। ये चीजें लंबे समय तक याद रहती हैं।
अंत में दीपावली का असली गिफ्ट खुशी है। लेने वाला भी खुश और देने वाला भी खुश, यही इस पर्व की सुंदरता है। अगर हमारा गिफ्ट किसी के चेहरे पर सच्ची मुस्कान ले आए, किसी रिश्ते की दूरी को मिटा दे, तो समझिए त्योहार सफल हो गया। आइए इस बार गिफ्ट के साथ थोड़ा सा समय, थोड़ी सी ममता और ढेर सारा अपनापन भी बांटें। यही सबसे कीमती उपहार होगा।
डॉ. वंदना शर्मा नई दिल्ली