ऑटो नम्बर 9288 Vandna Sharma द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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ऑटो नम्बर 9288



नवम्बर माह की गुनगुनी धूप थी। ठंड अभी इतनी भी नहीं हुई थी कि ठंड से ठिठुरा जाए। सुबह-सुबह मौसम ठंडा-सा हो रहा था। दिल्ली में वैसे भी कम ठंड पड़ती है। बस दिसम्बर और जनवरी, दो माह के लिए। लेकिन पड़ती है तो कड़ाके की है, दिल्ली की सर्दी।

तनु दोपहर के एक बजे घर से निकली, प्रीतविहार से अपने बच्चे को वापस लाने के लिए। डेढ़ बजे छुट्टी होनी थी, और अभी तक कोई ऑटो नहीं मिला था। उसे बहुत चिंता हो रही थी कि समय से स्कूल पहुँच जाए, जिससे उसके बेटे को स्कूल के बाहर इंतज़ार न करना पड़े। माँ का मन था, एक-एक मिनट भारी लग रहा था। सड़क पर आती-जाती गाड़ियों को देखती, हाथ उठाती, पर कोई ऑटो रुकता ही नहीं था।

तभी अचानक से एक ऑटो नं. 9288 आकर रुका। तनु ने हल्की-सी ही झलक देखी थी, लेकिन उसने नम्बर पहचान लिया। यह वही ऑटो है, जिसने उसकी बारिश के दिन सहायता की थी।

एक बार तनु को खड़े-खड़े बहुत देर हो गई थी। बारिश भी सुबह से हो रही थी, कोई ऑटो नहीं रुक रहा था। प्रीतविहार जाने के लिए कोई भी तैयार नहीं हो रहा था। तभी 9288 ऑटो आया, उसने तनु को देखा और कहा - 'बैठिए'। तनु ने स्कूल का पता बताया और बैठ गई।

स्कूल के रास्ते में एक छोटा-सा गाँव शकरपुर पड़ता था। उस सड़क पर पुल के नीचे बरसात में बहुत पानी भर जाता था। बारिश में कोई भी ऑटो या रिक्शा उस रास्ते जाना नहीं चाहता था। पर उस 9288 वाले ऑटो वाले भाई में इंसानियत ज़िंदा थी। उसने उसे सही-सलामत बच्चे के साथ घर तक पहुँचाया। तनु ने भी उसे खुश होकर 500 का नोट दिया। उस दिन तनु के मन में उस अनजान व्यक्ति के लिए एक गहरा सम्मान बैठ गया था।

तनु को उस ऑटो का नम्बर याद हो गया था। अब जब भी उसे वो ऑटो नम्बर दिखाई देता, तो वह बिना कुछ कहे चुपचाप ऑटो में बैठ जाती।

ऑटोवाला भी शरीफ़ था, पूरे रास्ते खामोश रहता, कोई बात नहीं करता, लेकिन सुरक्षा का पूरा ध्यान रखता, सही-सलामत तनु को घर पहुँचाता। अभी तक तनु ने उसका नाम भी नहीं पूछा था, बस उसे भी ऑटो का नम्बर याद था - 9288।

तनु अपने बेटे को लाने के लिए गली के सामने मोड़ पर एक ही नियत स्थान पर खड़ी होती। वो ऑटोवाला अक्सर उसके सामने आकर रुकता, बैठने का इशारा करता और तनु भी बिना कुछ कहे, बिना कुछ पूछे बैठ जाती। उन दोनों के बीच विश्वास का गहरा रिश्ता बन गया था।

ना कभी तनु ने पैसों का मोलभाव किया, ना कभी ऑटोवाले ने कोई प्रतीक्षा की। तनु अपने हिसाब से उसको पैसे देती, वो चुपचाप रख लेता। कभी दोनों में कोई बात नहीं हुई।

अब तो तनु सिर्फ नम्बर देखती और पहचान लेती, बिना ऑटोवाले का चेहरा देखे बैठ जाती। ऑटोवाला रोज़ एक ही टी-शर्ट, लाल रंग की पहनता था। इसीलिए तनु दूर से ही एक झलक में पहचान लेती। कभी-कभी उसे कोई और सवारी मिल जाती तो वह कई दिन तक नहीं आता। दोनों ने एक-दूसरे का नम्बर नहीं लिया था, पूछा भी नहीं। हो सकता था, पर ज़रूरत ही नहीं पड़ी।

लेकिन तनु का समय फिक्स था, वह ठीक एक बजे वहीं खड़ी ऑटो का इंतज़ार करती। कभी-कभी दूसरे ऑटो से भी जाना पड़ता, जो बहुत मोल-भाव करते, कभी ज़्यादा पैसे भी माँगते। मजबूरी में, कि बच्चे को परेशानी न हो, उसे जाना पड़ता।

लेकिन अक्सर 9288 वाला ऑटो आ ही जाता। भरोसे का यह रिश्ता सिर्फ भरोसे पर ही टिका था। बस तनु ऑटो का नम्बर देखती, एक झलक उसकी टी-शर्ट पहचानती और बैठ जाती। एक साल बीत चुका था। लेकिन कभी दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई। तनु को उसका नाम तक नहीं पता था।

लेकिन अक्सर वो ऑटो उसके सामने रुकता तो पहचान लेती और कभी-कभी तो दूसरे ऑटो से उतर कर उसी 9288 में ही जाती। बिना बातचीत, बिना जानपहचान का, भरोसे का, इंसानियत का, सिर्फ आँखों ही आँखों में बात होने वाला अनोखा रिश्ता बन गया था तनु और 9288 का।

ना तनु कोई सवाल करती, न ही ऑटोवाला कभी कुछ पूछता। बस उसके सामने आकर रुकता, बैठने का इशारा करता और तनु भी चुपचाप बैठ जाती बिना कुछ कहे।

ऑटो चलता रहता, दिल्ली की भागती सड़कें पीछे छूटती रहतीं, और दोनों के बीच एक खामोश समझदारी पलती रहती। इस भागती-दौड़ती दुनिया में जहाँ हर कोई जल्दी में है, हर कोई अपने फायदे के लिए है, वहाँ बिना स्वार्थ का यह रिश्ता किसी चमत्कार से कम नहीं था।

तनु सोच रही थी, इस दुनिया में इतने शरीफ़ भी व्यक्ति होते हैं।

काश, सारी दुनिया इतनी ही अच्छी होती।