शायद PATEL RJ द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शायद



मिलना — जहाँ से सब शुरू हुआ था*

हम मिले थे एक कमेंट सेक्शन में। इतना अजीब था मिलना कि अब सोचता हूँ तो हँसी आती है।

मैंने एक रैंडम पोस्ट पे लिखा था — "ये फ़िल्टर ज़्यादा हो गया यार।"

उसने तुरंत रिप्लाई किया — "तुझे बड़ा पता है फ़िल्टर का?"

मैंने बोला — "हाँ, क्योंकि तुम रोज़ लगाती हो।"

वो बोली — "स्टॉकर हो क्या? हर जगह दिख जाते हो।"

वहीं से लड़ाई शुरू, और लड़ाई से बात।

कमेंट से DM, DM से Snap। मैंने उसका नाम "फ़िल्टर वाली" सेव किया था। उसने मेरा "बोरिंग लड़का"।

पहले हफ्ते तो सिर्फ एक दूसरे को चिढ़ाना। वो कहती "तुमसे बात करके नींद आती है", मैं कहता "तुम इतना बोलती हो, इयरफोन गरम हो जाते हैं।" मैं उसकी हर स्टोरी का रिप्लाई करता, वो हर रिप्लाई पे "उग्ग्घ तुम फिर आ गए" बोलती, पर ऑनलाइन दोनों रहते थे।

पर उसी बकवास में कब रात के 1 बज जाते, पता ही नहीं चलता। कब "गुड नाईट" बोलने के बाद भी दोनों 1 घंटा और ऑनलाइन रहते, ये भी पता नहीं चलता।

वो ऑनलाइन नहीं आती तो मैं बार-बार Snapchat खोलता। एक बार तो मैंने 2 घंटे में 14 बार उसका Snap Score चेक किया था। वो भी सेम करती थी, बाद में उसने खुद बताया था।

तब नहीं पता था, ये आदत बन जाएगी।

 प्यार — जब लगा कि ये ही है*

पता ही नहीं चला कब "टाइमपास" वाला रिश्ता, "तू नहीं तो कोई नहीं" वाला बन गया।

एक दिन उसको बुखार था। उसने सुबह से एक भी मैसेज नहीं किया। मैं सुबह से शाम तक पागल। 30 बार कॉल, उसकी बेस्ट फ्रेंड को मैसेज — "उसको बोलो ऑनलाइन आए, तबीयत कैसी है उसकी?" दोस्त बोल रहे थे "भाई शांत हो जा, बुखार ही तो है", पर मुझे शांत होना नहीं आ रहा था।

शाम को जब उसने बोला — "थोड़ा बुखार था, अब ठीक हूँ, तू क्यों इतना हाइपर हो रहा है?" — तो मेरी आँखों में आँसू थे। मैंने बोला — "पता नहीं क्यों, पर तेरे बिना घबराहट होती है, साँस अटक सी जाती है।"

उस रात मैंने कह दिया — "मुझे तुझसे प्यार हो गया है, फ़िल्टर वाली।"

उसने 10 मिनट तक टाइपिंग किया, डिलीट किया, फिर लिखा — "मुझे भी। पर डर लगता है।"

मैंने पूछा — "किस चीज़ का?"

बोली — "कि तू भी चला जाएगा, जैसे सब गए। सब शुरू में ऐसे ही बोलते हैं।"

मैंने कहा — "मैं कहीं नहीं जाऊँगा। तू मेरी आदत नहीं, ज़रूरत बन गई है। आदत बदल जाती है, ज़रूरत नहीं।"

फिर जो 5 महीने आए, वो जन्नत थे।

सुबह उसकी "उठ जा गधे, ब्रश कर लिया?" वाली कॉल से उठना। दोपहर में उसका "क्या खाया?" पे लड़ना। रात को उसकी आवाज़ सुनते-सुनते सो जाना। बिना मिले भी लगता था, साथ हैं। हमने लड़ाई भी की, पर 2 घंटे से ज़्यादा कभी नाराज़ नहीं रह पाए।

हमने सपने देखे थे। मिलने का। पहली बार मिलेंगे तो क्या करेंगे। उसने कहा था — "पहले लड़ूँगी, क्योंकि तू लेट आएगा, फिर गले लगूँगी।" मैंने कहा था — "मैं तुझे देख के कुछ बोल ही नहीं पाऊँगा, बस देखता रहूँगा।"

मैंने सच में सोच लिया था, ये ही मेरी कहानी का एंड है। हैप्पी एंडिंग।

तड़प — जब सब बदलने लगा*

प्यार में सबसे ज़्यादा दर्द तब होता है जब सब होते हुए भी सब खत्म होने लगता है।

धीरे-धीरे उसके मैसेज छोटे होने लगे। मेरी 10 लाइन की बात का जवाब सिर्फ "हम्म" या "ओके" या "बिजी हूँ"। पहले जो लड़की मेरी एक "हाँ" पे 10 सवाल पूछती थी, अब मेरी पूरी कहानी पे सिर्फ सीन करके छोड़ देती थी।

मैं पूछता — "क्या हुआ? लड़ाई हुई किसी से? बता ना, शेयर कर ना।"

वो कहती — "कुछ नहीं, बस मूड ऑफ है, तू हर बात को बड़ा बना देता है।"

मूड ऑफ एक दिन होता है, दो दिन होता है, रोज़ नहीं होता।

एक रात मैंने देखा — वो ऑनलाइन थी। मेरा मैसेज डिलीवर्ड था, सीन नहीं था, 2 घंटे से। पर दूसरी लड़की की स्टोरी पे उसने 2 मिनट पहले रिप्लाई किया था — "हाहाहा सो फनी यार्रर।"

मेरा दिल वहीं बैठ गया। लगा जैसे किसी ने सीने पे हाथ रख के दबा दिया हो। साँस लेनी भी मुश्किल हो गई।

मैंने गुस्से में नहीं, दर्द में बोला — "तू बदल गई है, फ़िल्टर वाली। तू वो नहीं रही।"

उसने बोला — "तू ओवरथिंक करता है, मैं ऐसी ही हूँ, तू मुझे समझता ही नहीं।"

नहीं, वो ऐसी नहीं थी। वो पहले ऐसी नहीं थी। पहले वो मेरे "ओवरथिंक" पे हँसती थी, कहती थी "गधा है तू, पर मेरा गधा है।"

फिर एक दिन रात के 1:30 बजे उसने लिखा — "मुझे ब्रेक चाहिए।"

मैंने स्क्रीन को 10 बार पढ़ा। ब्रेक।

मैंने लिखा — "ब्रेक मतलब? हम कोई फोन हैं जो हैंग हो गया है तो ब्रेक चाहिए? हम इंसान हैं यार।"

बोली — "मुझे समझ नहीं आ रहा, अब पहले जैसा फील नहीं आता। थक गई हूँ मैं इस रोज़-रोज़ की बातों से, रोज़-रोज़ के झगड़ों से।"

थक गई हूँ।

वही लफ्ज़। जो आज तक कान में गूँजता है। थक गई हूँ।

मैंने बोला — "तो खत्म? इतनी आसानी से? 5 महीने का सब कुछ एक लाइन में खत्म?"

उसने कहा — "शायद। मुझे टाइम चाहिए।"

शायद। 5 महीने के प्यार का, 150 रातों की बातों का जवाब "शायद" था।

*4. दर्द — जो अब रोज़ होता है*

उस "शायद" के बाद से वो चली गई।

मैंने उसको रोका नहीं। क्योंकि प्यार में भीख नहीं माँगते। अगर उसको जाना है, तो जाने देना ही प्यार है, रोक लेना ज़िद है।

पर अंदर? अंदर तो मैं उसी रात मर गया था।

आज भी रात के 2 बजे आँख खुल जाती है। आदत है ना। पहले इस टाइम हम बात करते थे। अब आदत से फोन देखता हूँ, उसकी चैट देखता हूँ, लास्ट सीन देखता हूँ। वो ऑनलाइन आती है, पर मेरे लिए नहीं। कभी-कभी तो लगता है वो भी मेरी चैट देखती होगी, पर शायद मेरा वहम है।

उसकी पुरानी वॉइस नोट्स अब भी सेव हैं। "ओए सुन ना", "कहाँ मर गया था सुबह से", "आई लव यू गधे, सुन रहा है ना"। कभी-कभी इतनी तड़प होती है तो एक ही वॉइस नोट 10 बार सुन लेता हूँ, और पता भी नहीं चलता कब आँखें गीली हो जाती हैं, कब तकिया गीला हो जाता है।

आज भी उसकी चैट पिन पे है। सबसे ऊपर। मैं हटा नहीं पा रहा। लगता है हटा दिया तो सच में वो चली जाएगी। वैसे तो चली ही गई है, पर दिल अभी भी नहीं मानता। दिल अभी भी उसी कमेंट सेक्शन में अटका हुआ है, जहाँ उसने पहली बार बोला था "स्टॉकर हो क्या?"

लोग कहते हैं — "मूव ऑन कर जा, और लड़कियाँ मिल जाएँगी, ये उमर ही ऐसी है।"

उनको कौन समझाए, मुझे लड़की नहीं चाहिए थी, मुझे वो चाहिए थी। वही फ़िल्टर वाली। जो बिना फ़िल्टर के भी सबसे खूबसूरत लगती थी।

उसने कहा था — "तू चला गया तो मैं मर जाऊँगी।"

आज देखो, वो खुद चली गई, और मैं यहाँ रोज़ थोड़ा-थोड़ा मर रहा हूँ। हर सुबह उठ के ये सोचना कि आज शायद उसका मैसेज आए, और हर रात ये सोच के सोना कि आज भी नहीं आया — इससे बड़ी तड़प क्या होगी?

ये प्यार अधूरा रह गया। पर ये दर्द पूरा है। ये तड़प पूरी है।

और शायद ये तड़प ही अब मेरा प्यार है।

PATEL RJ