बांसुरी की धुन भाग :-१९ prem chand hembram द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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बांसुरी की धुन भाग :-१९


बाँसुरी की धुन
भाग 19 — अंतर्मन का द्वंद्व
गाँव की बैठक समाप्त हो चुकी थी। लोग धीरे-धीरे अपने घरों की ओर लौटने लगे थे। लेकिन बैठक में लिए गए निर्णय की गूँज अभी भी पूरे गाँव में सुनाई दे रही थी।
संथाल समाज के अध्यक्ष सिनाराम मुर्मू कुछ देर तक माँझी थान के पास बैठे रहे। उनके चेहरे पर गंभीरता थी। आज की बैठक ने उनके अंतर्मन में अनेक प्रश्न खड़े कर दिए थे।
उन्होंने अपने जीवन में न जाने कितनी पंचायतें की थीं। कितनी सामाजिक बैठकें आयोजित की थीं और कितने विवादों का निपटारा किया था।
कभी पति-पत्नी के झगड़े, कभी शराब पीकर मारपीट करने के मामले, कभी जमीन-जायदाद के विवाद। कभी भूत-प्रेत, डायन-बिसाही और अंधविश्वास से जुड़े मामले।
उन्होंने न जाने कितने लोगों को समझाया था। कितनों को अच्छे-बुरे का अंतर बताया था। समाज में एकता और सद्भाव बनाए रखने के लिए हमेशा प्रयास किया था।
लेकिन आज अकेले बैठे-बैठे वे अपने बीते जीवन का हिसाब लगाने लगे।
मन ही मन सोचने लगे—
'मैंने इतने वर्षों तक समाज की बैठकें कीं। लोगों को समझाया। अच्छे-बुरे का अंतर बताया। लेकिन क्या वास्तव में समाज को उस दिशा में ले जा पाया, जिसकी मैंने कल्पना की थी?'
उन्हें याद आया कि जो व्यक्ति शराब पीता था, वह आज भी शराब पी रहा है। जो दूसरों से झगड़ता था, वह आज भी झगड़ रहा है। जो आलसी था, वह आज भी कामचोर बना हुआ है।
उन्होंने एक लंबी साँस ली।
'आखिर मेरे समझाने का असर क्यों नहीं हुआ? क्या केवल पंचायत करने और निर्णय सुनाने से समाज बदल सकता है?'
तभी उनके मन में रामलाल का चेहरा उभर आया।
रामलाल!
एक ऐसा व्यक्ति, जिसके जीवन में कुछ समय पहले तक साधारण धार्मिक जिज्ञासा भी दिखाई नहीं देती थी। लेकिन आज वही व्यक्ति अपने पूरे परिवार के साथ सत्य और अध्यात्म की खोज में निकल पड़ा था।
सिनाराम मुर्मू सोचने लगे—
'रामलाल के जीवन में यह परिवर्तन अचानक कैसे आ गया? उसे किसने समझाया? किसने उपदेश दिया? किसने समाज की बैठक बुलाकर उसे सुधारने का प्रयास किया?'
फिर उन्हें याद आया कि रामलाल ने श्री श्री ठाकुर अनुकूलचन्द्र जी से सतदीक्षा ग्रहण की थी।
शायद यही उसके जीवन का निर्णायक मोड़ था।
उसके भीतर स्वयं परिवर्तन की प्रेरणा जागी थी। अब वह केवल अपने जीवन के बारे में नहीं सोच रहा था, बल्कि अपने पूरे परिवार को सत्य और सदाचार के रास्ते पर ले जाना चाहता था।
उसके मन में प्रश्न उठने लगे थे—
मारांग बुरु कौन हैं? लुगू बाबा कौन हैं? संथाल समाज का वास्तविक दर्शन क्या है? हमारी परंपराओं का मूल उद्देश्य क्या है? समाज को किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए?
ये प्रश्न किसी विवाद को जन्म देने के लिए नहीं, बल्कि सत्य को जानने की जिज्ञासा से उठे थे।
सिनाराम मुर्मू ने मन ही मन स्वीकार किया कि ऐसी जिज्ञासा ही सच्चे धर्म-जिज्ञासु का लक्षण है।
लेकिन दूसरी ओर, गाँव के चौक-चौराहों पर अब उनसे सवाल पूछे जाने लगे थे।
कोई कहता—
"अध्यक्ष जी, आखिर रामलाल का अपराध क्या था?"
दूसरा पूछता—
"वह तो किसी से झगड़ा भी नहीं कर रहा था। फिर उसे गाँव छोड़ने के लिए क्यों मजबूर किया गया?"
एक दिन किसी ने सीधे पूछ लिया—
"सिनाराम बाबू, आपने एक निरपराध व्यक्ति को गाँव से कैसे निकाल दिया?"
ये शब्द उनके कानों में हथौड़े की तरह बजने लगे।
वे सोचने लगे कि शायद समाज की एकता बनाए रखने के प्रयास में कहीं वे स्वयं ही एक परिवार के दुख का कारण बन गए।
उनके भीतर एक नई समझ जन्म लेने लगी थी।
बागुन के सूने आँगन में
गाँव के दूसरे छोर पर बागुन अपने घर के आँगन में बैठा कुछ काम कर रहा था। अचानक उसे एक धागा दिखाई दिया। उसने इधर-उधर देखा और अनायास ही आवाज लगा बैठा—
"माही ओ माही! जरा इधर आना बेटी। इस धागे को सुई में पिरो दो।"
आवाज देने के बाद वह कुछ क्षण चुप रहा। फिर जैसे उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। माही अब वहाँ कहाँ थी?
उसकी पत्नी घर के भीतर से बाहर आई। पति की ओर देखते हुए बोली—
"किसे आवाज लगा रहे हो? भूल गए क्या, माही अब हमारे बीच नहीं है?"
बागुन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसके हाथ में धागा और सुई वैसे ही पड़े रहे।
पत्नी की आँखें भर आईं।
"काश! आज माही सामने होती। कितनी बार तो इसी आँगन में दौड़ती हुई आ जाती थी। कितनी प्यारी लगती थी वह।"
कुछ देर रुककर वह फिर बोली—
"और रामलाल के दोनों छोटे बच्चे! कभी आँगन में कूदते-फाँदते, कभी सोहराय के गीत गाते हुए पूरे घर में घूमते रहते थे। उनकी शरारतों से घर कितना भरा-पूरा लगता था।"
बागुन की आँखें नम हो गईं।
उसे याद आने लगा कि कैसे माही और सलमा की हँसी से कभी यह आँगन गूँजता रहता था। बच्चे जब खेलते-खेलते थक जाते, तो उसकी गोद में आकर बैठ जाते थे।
आज वही आँगन सूना पड़ा था।
न बच्चों की किलकारियाँ थीं, न माही की प्यारी आवाज और न सलमा की हँसी।
बागुन की पत्नी ने सूने आँगन की ओर देखते हुए कहा—
"कैसे भाई हो तुम? अब यह आँगन मुझे काटने दौड़ता है। कहीं मन नहीं लगता।"
बागुन ने धीमे स्वर में कहा—
"मैं क्या कर सकता था? उस दिन बैठक में जो कुछ हुआ, उसके सामने मेरी भी एक नहीं चली।"
पत्नी ने उसकी बात बीच में ही काट दी।
"मुझे कुछ नहीं सुनना। कल माही को मना कर वापस लाएँगे। आखिर वह हमारी बेटी जैसी ही तो है। बच्चे किस गलती की सजा भुगत रहे हैं?"
बागुन कुछ देर तक मौन रहा। फिर उसने अपनी पत्नी की ओर देखा।
"हाँ, कल चलेंगे। रामलाल से भी मिलेंगे।"
उसकी पत्नी ने तुरंत कहा—
"सिर्फ मिलने नहीं जाएँगे। माही को भी वापस लाएँगे। घर का आँगन फिर से बच्चों की आवाजों से गूँजना चाहिए।"
बागुन ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसने सामने खाली पड़े आँगन को देखा। शायद पहली बार उसे महसूस हुआ कि किसी परिवार का गाँव छोड़कर चले जाना केवल एक घर का खाली होना नहीं होता, बल्कि पूरे गाँव की आत्मीयता का एक हिस्सा खो जाना होता है।
चातुर मांझी का पश्चाताप
उधर चातुर मांझी, जो अब वृद्ध हो चले थे, उनके अंतर्मन में भी एक गहरा द्वंद्व चल रहा था।
वे अपने जीवन को याद करने लगे। उन्होंने हमेशा स्वयं को समाज को जोड़ने वाला व्यक्ति समझा था। लेकिन आज उन्हें लग रहा था कि कहीं वे स्वयं ही समाज को तोड़ने का कारण तो नहीं बन गए?
उनके मन में पश्चाताप की भावना उठने लगी।
'मैं जोड़ने वाला व्यक्ति हूँ, तोड़ने वाला नहीं। फिर मैंने ऐसा क्यों किया?'
उन्हें रामलाल का परिवार याद आया। उसकी पत्नी सलमा, उसकी बड़ी बेटी माही और वे छोटे-छोटे बच्चे, जिनका गाँव से क्या दोष था?
उन्होंने एक निरपराध बेटी को, एक भक्तिपरायण मनुष्य को केवल इसलिए गाँव से बाहर जाने दिया, क्योंकि उसकी धार्मिक मान्यताएँ हमारी मान्यताओं से अलग थीं।
क्या यही धर्म है?
क्या धर्म मनुष्यों को जोड़ने के बजाय अलग करने का नाम है?
उनके मन में एक विचार कौंधा—
'शायद हमने कभी धर्म को उसकी वास्तविक अनुभूति में समझने का प्रयास ही नहीं किया। हम धर्म को केवल अपनी मान्यताओं, रीति-रिवाजों और परंपराओं तक सीमित करके बैठ गए।'
उनके मन में अनेक धार्मिक स्वरूप उभरने लगे।
शिव, राम, अल्लाह, यीशु, मारांग बुरु और लुगू बाबा।
क्या मनुष्य की श्रद्धा के अलग-अलग नाम होने से परम सत्य भी अलग-अलग हो जाता है?
क्या ईश्वर तक पहुँचने के रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन सत्य का मूल एक नहीं हो सकता?
वे देर तक मौन बैठे रहे।
उन्हें रामलाल का पुराना व्यवहार भी याद आया।
एक समय था, जब उन्होंने रामलाल को कड़े शब्द कहे थे। उसे अपमानित किया था। यहाँ तक कि गाली-गलौज और मारपीट तक की नौबत आ गई थी।
लेकिन उन कठोर शब्दों और व्यवहार से रामलाल में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं आया था।
आज वही रामलाल अपने भीतर आए परिवर्तन के कारण एक अलग दिशा में चल पड़ा था।
यह परिवर्तन किसी भय से नहीं आया था, न किसी सामाजिक दबाव से।
यह परिवर्तन उसकी सतदीक्षा और उसके भीतर जागी आध्यात्मिक प्रेरणा से आया था।
चातुर मांझी सोचने लगे—
'क्या श्री श्री ठाकुर अनुकूलचन्द्र जी कोई ऐसी दिव्य आत्मा हैं, जिनकी प्रेरणा से मनुष्य अपने भीतर झाँकने लगता है? क्या उनके उपदेशों में वही सत्य है, जिसे हम मारांग बुरु और लुगू बाबा की परंपराओं में खोजते रहे हैं?'
उनके पास इन प्रश्नों का उत्तर नहीं था।
लेकिन इतना अवश्य था कि अब उनके भीतर रामलाल के प्रति पहले जैसा विरोध नहीं बचा था।
वन में तापस मंडल
उधर रामलाल अपने परिवार के साथ वन की ओर जा चुका था।
तापस मंडल को जैसे ही इस घटना का समाचार मिला, वे अत्यंत दुखी हुए।
उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि रामलाल को गाँव छोड़ना पड़ा है।
उन्होंने तत्काल वन की ओर जाने का निर्णय लिया।
कुछ देर की यात्रा के बाद वे उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ रामलाल अपने परिवार के साथ ठहरा हुआ था।
रामलाल ने तापस मंडल को देखते ही आगे बढ़कर प्रणाम किया।
"दादा, आप यहाँ?"
तापस मंडल ने भावुक स्वर में कहा—
"रामलाल, यह सब क्या हो गया? तुमने गाँव छोड़ने का निर्णय क्यों लिया? क्या हम लोगों के रहते तुम्हें इतना बड़ा कदम उठाना चाहिए था?"
रामलाल ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
"दादा, मैंने गाँव को छोड़ा नहीं है। गाँव के लोग आज भी मेरे अपने हैं। वहाँ मेरे चाचा हैं, भाई हैं, भतीजे हैं। मैं किसी से द्वेष नहीं करता।"
"फिर तुम यहाँ क्यों चले आए?"
रामलाल कुछ क्षण मौन रहा। फिर बोला—
"दादा, मुझे शांति चाहिए। मैं अपने जीवन को समझना चाहता हूँ। मैं अपने धर्म को समझना चाहता हूँ। अपने मारांग बुरु को जानना चाहता हूँ। लुगू बाबा के दर्शन और उनके संदेश को समझना चाहता हूँ।"
तापस मंडल ध्यानपूर्वक उसकी बातें सुनते रहे।
रामलाल ने आगे कहा—
"दादा, आपको याद है, इसी वन की एक चट्टान के पास मुझे एक अद्भुत बाँसुरी की धुन सुनाई दी थी। उसी धुन के साथ मुझे एक दिव्य आत्मा के दर्शन हुए थे। आज तक मैं नहीं समझ पाया कि वे कौन थे? क्यों मिले थे? उनका संदेश क्या था? मैं उस अनुभूति को समझना चाहता हूँ।"
तापस मंडल ने पूछा—
"क्या तुम्हें लगता है कि गाँव छोड़कर तुम्हें इन प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे?"
रामलाल ने विनम्रता से कहा—
"नहीं दादा, मैं ऐसा दावा नहीं करता। लेकिन इतना अवश्य जानता हूँ कि जब तक मनुष्य के भीतर जिज्ञासा जीवित है, तब तक उसकी खोज समाप्त नहीं होती। मैं किसी से लड़ना नहीं चाहता। मैं केवल जानना चाहता हूँ।"
तापस मंडल की आँखों में नमी आ गई।
उन्होंने रामलाल के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा—
"तुम्हारी बातों में आज एक अलग ही गंभीरता दिखाई दे रही है। शायद तुम्हारी यह यात्रा केवल वनवास नहीं, बल्कि आत्मखोज की यात्रा है।"
रामलाल ने हाथ जोड़कर कहा—
"दादा, मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए।"
तापस मंडल कुछ देर तक उसे देखते रहे।
फिर बोले—
"रामलाल, याद रखना, सत्य की खोज में कभी अपने लोगों के प्रति द्वेष मत रखना। तुम्हारी जिज्ञासा तुम्हें ऊँचाई तक ले जाए, लेकिन तुम्हारे भीतर विनम्रता बनी रहे।"
रामलाल ने उनके चरण स्पर्श किए।
वन में संध्या उतरने लगी थी। दूर कहीं पक्षियों का कलरव सुनाई दे रहा था। हवा के झोंकों से साल के पत्ते धीरे-धीरे हिल रहे थे।
तापस मंडल की दृष्टि सामने की विशाल चट्टान पर पड़ी।
कुछ क्षणों के लिए उन्हें भी ऐसा लगा, मानो इस वन की नीरवता में कोई अनकही कहानी छिपी हुई है।
रामलाल ने उस चट्टान की ओर देखते हुए कहा—
"दादा, शायद मेरी यात्रा का उत्तर वहीं कहीं छिपा है।"
तापस मंडल ने कोई उत्तर नहीं दिया।
लेकिन उनके मन में भी एक नया प्रश्न जन्म ले चुका था।
क्या रामलाल वास्तव में किसी ऐसे सत्य की खोज में निकल पड़ा है, जिसे समाज ने अपनी परंपराओं और मान्यताओं के बीच कहीं खो दिया है?
और क्या अब समय आ गया है कि समाज स्वयं अपने अंतर्मन में झाँके?
गाँव में सिनाराम मुर्मू अपने निर्णयों पर विचार कर रहे थे। चातुर मांझी अपने भीतर उठते पश्चाताप से गुजर रहे थे। बागुन अपनी बेटी माही और उन बच्चों की याद में व्याकुल था। उसकी पत्नी अगले दिन रामलाल के परिवार से मिलने की तैयारी करने लगी थी।
और वन में रामलाल अपने परिवार के साथ एक नई सुबह की प्रतीक्षा कर रहा था।
शायद परिवर्तन की पहली किरण कहीं न कहीं जन्म ले चुकी थी।
वन की नीरवता में जैसे कोई अदृश्य बाँसुरी फिर बजने की प्रतीक्षा कर रही थी।
क्रमशः...