बांसुरी की धुन भाग :-१७ prem chand hembram द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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बांसुरी की धुन भाग :-१७

Writing
बाँसुरी की धुन
भाग १७ — रिश्तों की वापसी
पीपल के पेड़ के नीचे सभा अब भी जारी थी। माही के सवालों ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया था। कोई परंपरा के पक्ष में था, तो कोई न्याय की बात कर रहा था।
माही अपनी माँ और चाची के पास खड़ी थी। रामलाल कुछ दूरी पर सिर झुकाए बैठा था। उसके चेहरे पर अपमान, थकान और वर्षों की पीड़ा साफ दिखाई दे रही थी।
मांझी हाड़ाम ने सभा की ओर देखा।
“अब रामलाल भी कुछ कहना चाहता है। उसे अपनी बात रखने दो।”
रामलाल धीरे-धीरे उठा। उसने सामने बैठे लोगों को देखा। उसकी आँखें भर आईं।
“मैंने कभी समाज से लड़ना नहीं चाहा। मैं भी इसी मिट्टी में पैदा हुआ हूँ। इसी समाज में पला-बढ़ा हूँ। लेकिन जब अपने ही लोग आपकी बात सुनने से पहले आपको गलत ठहरा दें, तब आदमी जाए तो कहाँ जाए?”
सभा में सन्नाटा छा गया।
रामलाल ने अपने बड़े भाई बागून की ओर देखा।
“दादा, मैंने आपसे कभी धन नहीं माँगा। आपका अधिकार भी नहीं छीना। मुझे बस इतना चाहिए था कि जब मेरे घर पर सवाल उठे, तब आप एक बार मेरा पक्ष भी सुन लेते।”
बागून ने सिर उठाया। वह कुछ बोलना चाहता था, मगर शब्द उसके गले में अटक गए। उसके होंठ काँपे। आँखों में पछतावा उतर आया।
“रामलाल...”
बस इतना ही निकल सका।
रामलाल ने अपनी आँखें पोंछीं।
“आज मेरी बेटी को अपने विश्वास का कारण बताना पड़ रहा है। मैं उससे नाराज नहीं हूँ। मुझे गर्व है कि उसने सवाल पूछने का साहस किया। लेकिन दुख इस बात का है कि उसके सवालों को सुनने से पहले ही उसे परंपरा का विरोधी मान लिया गया।”
माही की आँखें नम हो गईं।
उसने धीमे स्वर में कहा, “बाबा, मैं किसी का अपमान नहीं करना चाहती। मैं केवल इतना जानना चाहती हूँ कि हमारी परंपरा का उद्देश्य क्या है। यदि उसका उद्देश्य सुख, शांति और कल्याण है, तो फिर किसी के मन में भय क्यों होना चाहिए?”
एक बुजुर्ग ने कहा, “बेटी, हर बात का उत्तर इतनी आसानी से नहीं मिलता।”
माही ने विनम्रता से सिर झुकाया।
“बाबा, मैं भी यही मानती हूँ। इसलिए तो पूछ रही हूँ। जहाँ समझ नहीं है, वहाँ प्रश्न होना गलत कैसे हो सकता है?”
कुछ लोगों ने सहमति में सिर हिलाया।
तभी बागून अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ। उसकी आँखें रामलाल पर टिकी थीं।
“भाइयो, आज मुझे भी कुछ कहना है।”
उसकी आवाज भारी थी।
“मैं रामलाल का बड़ा भाई हूँ। मुझे उसका सहारा बनना चाहिए था। लेकिन मैं लोगों की बातें सुनता रहा। मैंने अपने भाई की आँखों में छिपा दर्द नहीं देखा।”
वह कुछ पल रुका। फिर रामलाल के पास जाने के लिए कदम बढ़ाया।
“छोटे भाई, मुझे माफ कर दे।”
रामलाल स्तब्ध रह गया।
बागून की आवाज फिर काँपी।
“मैंने तुझे अकेला छोड़ दिया। शायद मैं अपनी उम्र और बड़े होने के अहंकार में यह भूल गया कि बड़ा होने का अर्थ केवल अधिकार जताना नहीं, बल्कि छोटे का दुख समझना भी है।”
बागून की आँखों से आँसू बह निकले।
“आज तेरे सामने सिर झुकाते हुए मुझे शर्म नहीं आती। शर्म इस बात की है कि मुझे यह समझने में इतना समय लग गया।”
रामलाल ने अपने भाई की ओर देखा। उसके भीतर वर्षों से जमा पीड़ा एकाएक उमड़ आई। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन आवाज नहीं निकली।
फिर उसने धीरे से कहा, “दादा, रिश्ते टूटते हैं तो आवाज नहीं होती। मगर उन्हें जोड़ने में पूरी जिंदगी लग जाती है।”
बागून ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तो मुझे एक मौका दे दे, भाई।”
रामलाल ने हाथ नहीं खींचा। लेकिन उसने तुरंत गले भी नहीं लगाया। दोनों भाई कुछ देर तक एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े रहे। उनके बीच का मौन उन शब्दों से कहीं अधिक गहरा था, जो वे बोल नहीं पा रहे थे।
सभा के एक कोने में लाटू हंसदा और रामेश्वर हंसदा चुपचाप बैठे थे।
लाटू हंसदा कभी माही की ओर देखता, कभी रामलाल की ओर। वही लाटू, जो पहले रामलाल का विरोध कर रहा था, आज भीतर से बेचैन था।
रामेश्वर हंसदा ने धीरे से पूछा, “लाटू, कब तक चुप बैठे रहोगे? मन में कुछ है तो कह क्यों नहीं देते?”
लाटू ने लंबी साँस ली।
“गलती मानना आसान नहीं होता, रामेश्वर। खासकर तब, जब आदमी सबके सामने किसी का विरोध कर चुका हो।”
रामेश्वर ने कहा, “गलती मानने से आदमी छोटा नहीं होता। सच को समझने के बाद भी चुप रहना जरूर भारी पड़ता है।”
कुछ देर बाद लाटू हंसदा अपनी जगह से उठा।
“मांझी हाड़ाम, मुझे भी कुछ कहना है।”
सबकी नजरें उसकी ओर मुड़ गईं।
लाटू ने माही को देखा।
“बेटी, मैंने तुम्हारी बात सुने बिना तुम्हारा विरोध किया। मुझे लगा कि तुम परंपरा से दूर जा रही हो। लेकिन आज तुम्हारे सवाल सुनकर समझ आया कि तुम परंपरा को मिटाना नहीं चाहतीं। तुम उसका अर्थ जानना चाहती हो।”
उसने सिर झुका लिया।
“मैंने तुम्हारे सवालों को चुनौती समझा। शायद मुझे उन्हें समझने का अवसर समझना चाहिए था।”
माही ने विनम्रता से कहा, “लाटू काका, मैं भी सीख रही हूँ। मैं यह नहीं कहती कि मुझे सब कुछ मालूम है।”
लाटू ने उत्तर दिया, “यही बात मुझे समझनी थी। जो स्वयं सीखने को तैयार है, उसे बोलने से रोकना ठीक नहीं।”
सभा में हलचल हुई।
अब तक चुप बैठे रामेश्वर हंसदा भी उठे।
“मांझी हाड़ाम, मेरी बात भी सुनिए।”
उन्होंने सबकी ओर देखा।
“हमारे बुजुर्ग पूजा-पाठ करते आए हैं। उनका विश्वास रहा है कि पूजा से सुख-शांति मिलती है। सिद्ध मंत्रों और साधना के माध्यम से देवशक्ति की अनुभूति भी हो सकती है। मैं इस विश्वास का अपमान नहीं करता।”
उन्होंने थोड़ी देर रुककर माही की ओर देखा।
“लेकिन पूजा का उद्देश्य क्या है? क्या केवल विधि पूरी करना? या अपने मन को निर्मल करना, परिवार में शांति लाना और समाज का कल्याण करना?”
एक बुजुर्ग ने कहा, “पूजा का अर्थ तो कल्याण ही है।”
रामेश्वर ने सिर हिलाया।
“तब हमें यह भी देखना होगा कि हमारी किसी परंपरा से किसी के मन में अनावश्यक भय तो नहीं पैदा हो रहा। विश्वास को समझाने से वह कमजोर नहीं होता। और प्रश्न सुन लेने से देवता नाराज हो जाएँ, ऐसा भय भी हमें बिना सोचे नहीं पालना चाहिए।”
सभा में कई लोग गंभीर हो गए।
रामेश्वर ने आगे कहा, “मैं यह नहीं कहता कि हमारी सारी पुरानी मान्यताएँ गलत हैं। मैं इतना कहता हूँ कि जो बात हम अगली पीढ़ी को सौंप रहे हैं, उसका अर्थ भी समझाएँ। केवल यह कह देना कि ऐसा होता आया है, हर प्रश्न का उत्तर नहीं है।”
माही की माँ की आँखों में राहत दिखाई दी। उसकी चाची ने चुपचाप माही का हाथ थाम लिया।
सिनाराम मुर्मू ने अब तक सबकी बातें ध्यान से सुनी थीं। उन्होंने मांझी हाड़ाम की ओर देखकर कहा, “आज सभा में केवल मतभेद नहीं खुल रहे हैं। आज हम एक-दूसरे को सुनना भी सीख रहे हैं।”
मांझी हाड़ाम ने अपनी लाठी जमीन पर टिकाई।
“लेकिन एक बात अभी बाकी है। क्या हम बिना प्रमाण के किसी को दोषी ठहराएँगे? क्या हम किसी के विश्वास को सुने बिना उसका अपमान करेंगे?”
सभा से आवाज आई, “नहीं!”
मांझी हाड़ाम ने कहा, “तो निर्णय भी जल्दबाजी में नहीं होगा। माही के सवालों पर विचार किया जाएगा। परंपरा जानने वाले बुजुर्ग अपनी बात रखेंगे। जो मान्यता जिस आधार पर है, उसे समझाया जाएगा। किसी को केवल सवाल पूछने के कारण दोषी नहीं कहा जाएगा।”
उन्होंने रामलाल की ओर देखा।
“और रामलाल, तुम्हारा परिवार इस गाँव का हिस्सा है। तुम्हें अपमानित करके गाँव की शांति नहीं बचाई जा सकती।”
रामलाल की आँखें फिर भर आईं।
“मांझी हाड़ाम, मैं शांति चाहता हूँ। लेकिन अपने बच्चों का सिर झुकाकर नहीं।”
मांझी हाड़ाम ने गंभीर स्वर में कहा, “और तुम्हें ऐसा करने के लिए कोई मजबूर भी नहीं करेगा।”
बागून ने तुरंत कहा, “रामलाल अब अकेला नहीं है। यदि उसने मुझे भाई माना, तो मैं उसके साथ खड़ा रहूँगा।”
रामलाल ने उसकी ओर देखा। इस बार उसके चेहरे पर हल्की-सी नरमी दिखाई दी।
“दादा, मैं आपका छोटा भाई हूँ। आपका हाथ पकड़ने से मुझे कभी इनकार नहीं था। बस चाहता था कि आप मेरा हाथ छोड़ें नहीं।”
बागून ने उसे गले लगा लिया।
सभा में बैठे कई लोगों की आँखें नम हो गईं।
मगर माही के चेहरे पर अभी भी गंभीरता थी। उसने मांझी हाड़ाम से पूछा, “क्या आगे भी किसी लड़की को अपने विश्वास और समझ के कारण ऐसी सभा में सफाई देनी पड़ेगी?”
मांझी हाड़ाम कुछ क्षण चुप रहे।
“बेटी, आज मैं यह वचन दे सकता हूँ कि तुम्हारी बात सुने बिना तुम्हारे विरुद्ध निर्णय नहीं होगा। लेकिन पूरे समाज की सोच बदलने के लिए हमें मिलकर काम करना होगा।”
माही ने सिर झुका दिया।
“मुझे बस यही चाहिए, मांझी हाड़ाम। मेरी बात सही निकले, यह जरूरी नहीं। लेकिन मुझे अपनी बात रखने का अवसर मिले, यह जरूरी है।”
सभा समाप्त होने लगी। लोग छोटे-छोटे समूहों में चर्चा करते हुए लौटने लगे। कुछ लोग अब भी असहमत थे, लेकिन आज उनके पास सोचने के लिए नए प्रश्न थे।
रामलाल अपने परिवार के साथ घर की ओर चला। बागून कुछ दूरी तक उसके साथ आया। दोनों के बीच बातें कम थीं, मगर आज उनके कदम अलग-अलग दिशाओं में नहीं बढ़ रहे थे।
रास्ते में दूर कहीं बाँसुरी की धुन सुनाई दी।
रामलाल ठिठक गया।
बागून ने पूछा, “क्या हुआ?”
रामलाल ने मुस्कराने की कोशिश की।
“कुछ नहीं दादा। बहुत दिनों बाद यह धुन सुनी है।”
बागून ने धीमे स्वर में कहा, “शायद कुछ आवाजें लौटने में देर करती हैं, लेकिन हमेशा के लिए खोती नहीं।”
दोनों भाई फिर चल पड़े।
पीछे पीपल का पेड़ शांत खड़ा था। उसके नीचे हुई सभा ने सभी समस्याओं का समाधान नहीं किया था। पर एक शुरुआत जरूर हुई थी—रिश्तों को फिर से जोड़ने की, विश्वास को समझने की और परंपरा को प्रश्नों के साथ देखने की।
लेकिन माही के मन में एक सवाल अब भी बाकी था।
यदि परंपरा का उद्देश्य मानव-कल्याण है, तो क्या समय के साथ उसकी व्याख्या बदल सकती है, बिना उसकी आत्मा को खोए?
इस प्रश्न का उत्तर अभी समाज को खोजना था।
और बाँसुरी की धुन अब भी जारी थी...
संवादों में थोड़ा अधिक भाव भरें
सभा में मतभेदों को थोड़ा गहरा करें
रामलाल और बागून का मेल धीमा करें