एक रात का सौदा
एक गरीब छात्रा ने अपने छोटे भाई के अस्पताल के बिल चुकाने के लिए अपने करोड़पति बॉस के साथ एक रात बिताई… और उस फैसले ने उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
“एक गरीब छात्रा ने अपने छोटे भाई के अस्पताल के बिल चुकाने के लिए अपने करोड़पति बॉस के साथ एक रात बिताई… और उस फैसले ने उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
आरती शर्मा ने दो दिनों से आँख तक नहीं झपकी थी। उसके छोटे भाई रोहन को बाइक दुर्घटना के बाद सिटीकेयर मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, और हर बीतते घंटे के साथ इमरजेंसी सर्जरी का खर्च बढ़ता ही जा रहा था।
बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन की छात्रा और मल्होत्रा एंड कंपनी में इंटर्न आरती ने हर संभव कोशिश कर ली थी स्टूडेंट लोन, सैलरी एडवांस, यहाँ तक कि अपने पास की थोड़ी-बहुत कीमती चीज़ें भी बेच दीं। लेकिन कुछ भी काफी नहीं था।
पिछली रात, मजबूरी के चरम पर पहुँचकर, उसने कंपनी के सीईओ अर्जुन मल्होत्रा से मिलने की हिम्मत जुटाई एक ऐसा आदमी, जो अपनी सख्ती और परफेक्शन के जुनून के लिए जाना जाता था। लिफ्ट में औपचारिक नमस्ते से आगे उसकी कभी उनसे बात नहीं हुई थी। लेकिन उस रात, जब अर्जुन ने आरती की काँपती आवाज़ में उसकी पूरी स्थिति सुनी, तो उसके चेहरे का भाव बदल गया।
अर्जुन ने तुरंत जवाब नहीं दिया। वह अपने केबिन की खिड़की तक गया, जहाँ से मुंबई की चमकती हुई रात दिखाई दे रही थी। फिर बिना उसकी ओर देखे, उसने बर्फ जैसे ठंडे स्वर में कहा:
“मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ। लेकिन बदले में मुझे भी कुछ चाहिए।”
उसका प्रस्ताव साफ था।
निर्दयी।
अपमानजनक।
सिर्फ एक रात।
एक ऐसा सौदा, जिसे स्वीकार करने की आरती ने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
लेकिन रोहन की वह छवि ऑक्सीजन ट्यूबों से जुड़ा हुआ, डॉक्टरों का उस पर तुरंत फैसला लेने का दबाव, और हर तरफ से बंद होते रास्ते उसकी सारी हिम्मत तोड़ गए। उस रात, अपने भाई की जान बचाने के लिए आरती ने अपनी इज़्ज़त दाँव पर लगा दी।
अगली सुबह जब उसकी आँख खुली, वह उस उद्योगपति के निजी अपार्टमेंट में थी। अर्जुन अब भी सो रहा था। मेज़ पर एक लिफाफा रखा था अस्पताल की रसीद और एक छोटा-सा नोट, उसकी बेहद सुथरी लिखावट में:
“तुम पर मेरा कोई कर्ज़ नहीं है। इस बात को यहीं खत्म समझो।”
आरती के भीतर एक साथ राहत, शर्म और गुस्से का तूफान उमड़ पड़ा। उसने बिना कुछ कहे कपड़े पहने, नोट को वहीं छोड़ दिया जहाँ वह रखा था, और बिना पीछे देखे चली गई।
उसे लगा, बस यही अंत था।
उसकी यादों के सबसे अंधेरे कोने में दफ्न कर देने लायक एक अध्याय।
लेकिन ऐसा नहीं था।
दो हफ्ते बाद, जब वह ऑफिस में रिपोर्ट तैयार कर रही थी, तभी उसे एचआर की तरफ़ से एक ईमेल मिला:
“सीईओ के साथ तत्काल मीटिंग। सुबह 10:00 बजे।”
उसका दिल इतनी तेज़ी से धड़कने लगा कि उसे अपनी ही धड़कन सुनाई देने लगी। उसे डर था कि वह उस रात की बात छेड़ेगा… या उससे भी बुरा, और कुछ माँगेगा। उसने नौकरी छोड़ने के बारे में सोचा।
भाग जाने के बारे में सोचा।
बीमार होने का बहाना बनाने के बारे में भी सोचा।
लेकिन उसने इनमें से कुछ नहीं किया।
ठीक दस बजे, वह अर्जुन मल्होत्रा के केबिन में दाखिल हुई।
इस बार वह उसे एक ऐसे भाव से देख रहा था, जो उसने पहले कभी नहीं देखा था उलझन, तनाव और… क्या वह अपराधबोध था?
“आरती, मुझे तुमसे बात करनी है,” उसने दरवाज़ा बंद करते हुए कहा।
कहानी का असली मोड़ अब शुरू होने वाला था।
यह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है।
पूरी कहानी और चौंका देने वाला अंत है…
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