चक्रवात Deepak sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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चक्रवात

                 1

शशि की बेहोशी जब टूटी तो उस ने अपने को सोफ़े पर पाया ।

                 एक नई चेतना के साथ। 

                 उस के हिये में एक डिबिया थी। बारजे की चीख जिस में बंद थी। ढक्कन के ऐन नीचे। और जिसे वहीं रोके रखने का डाट उसे अपने पास गुप्त रखना था।

                 “तुम्हें बता रहा हूं,” शशि की भनक पाते ही बिस्तर पर लेटे रहे जगन ने कहा, “फिर कभी मेरी मां का उल्लेख तुम अपनी ज़ुबान पर लाई तो तुम्हारी ज़ुबान बाहर खींच लूंगा।”  

 

                 पिछली रात उस के वैवाहिक कक्ष में जैसे ही जगन को नींद ने अपने आगोश में लिया था,शशि कक्ष के बाहर बने बारजे पर आ खड़ी हुई थी। 

                जभी उसे एक कराह का खड़का हुआ था और एक खुला उसास उस के समीप चला आया था। 

               शशि ने अपने श्वास में उसे अंदर खींच लिया था। 

               चक्रवात बनने में उस ने अधिक समय न लगाया था।उसी चक्रवात से एक चीख शशि के कंठ की ओर बढ़ ली थी। प्रबल और वेगवान।

               “क्या हुआ?” जगन बाहर बारजे पर चला आया था, “तुम चीखीं क्या?”

               “बताती हूं,” शशि ने उस चीख को कंठ से अपने हिये में उतर आने दिया था और वह कमरे के अंदर चली आई थी, “अभी बताती हूं….”

                बिस्तर के पास एक सोफ़ा था। शशि उसी पर बैठ गई थी। दीवार पर जगन की मां की तस्वीर थी।

                दुल्हन के लिबास में।

                “बारजे पर मैं ने इन्हें देखा था,” शशि ने गढ़ी की ठेक पर वार किया था, “इन्हीं कपड़ों में।”

               “असंभव,” जगन ने कहा था, “उन्हें मरे तो अरसा हो गया।”

                “लेकिन उन्हें मैं ने साफ़ देखा । बारजे पर खड़ीं। क्रंदन करती हुईं। फिर अचानक वह चीखीं और नीचे कूद गईं।”

                अफ़वाह फैलाने वालों से शशि ने सुन रखा था, जगन की मां इसी बारजे से नीचे कूद कर मरीं थीं।

                 “क्या..या…या?” ताव खा कर जगन ने शशि की गाल पर ज़ोरदार एक तमाचा जड़ दिया था और वह चक्कर खाकर सोफ़े पर गिर पड़ी थी।

 

2

 

                 “आप की मां का फ़ोन आया है,” सुबह नौ बजने में पंद्रह मिनट अभी बाकी थे जब शशि से नौकरानी ने आते ही बोला, “उधर चोंगे वाले फ़ोन पर….”

                 मां के पास जगन की लैंडलाइन का नंबर रहा था। अपना मोबाइल शशि मां को दे आई थी।

                “सुन लो,” जगन बिस्तर से बोला, “तुम्हारे पगफेरे पर तुम्हारे साथ जाऊंगा नहीं। जब जाना चाहोगी, ड्राइवर तुम्हें वहां छोड़ आएगा। दुनियादारी निभाने की खातिर तुम्हें लिवाने ज़रूर एक बजे पहुंच जाऊंगा….”

 

                 जगन के मकान की वास्तुशैली पुराने ढंग की थी। प्रत्येक मंज़िल के बीचोंबीच समरूप एक सींखचेदार प्रांगण था। जिस की सींखचेदार छत अगली मंज़िल के प्रांगण का काम दिया करती।

                “इधर,” तीसरी मंज़िल के दरवाज़े पर जाकर नौकरानी रुक गई, “चोंगे वाला फ़ोन इधर की बैठक में है।”

                बैठक में शशि की दोनों ननदें एक सोफ़े पर बैठी थीं और जगन की सौतेली मां दूसरे सोफ़े पर।

                “हलो,” उसे देख कर दोनों एक साथ बोल पड़ीं।

                दोनों ही जगन की सौतेली बहनें थीं। शशि जानती थी वह उन दोनों के कुतूहल का विषय रही थी।उन के लिए यह एक अजूबा ही था जो पंचमंज़िले इस मकान की निचली दो मंज़िलों में चल रहे उन के टी.वी. और कम्प्यूटर सेंटर की नगण्य एक कंप्यूटर आपरेटर उनके सौतेले भाई को रिझाने में सफल हो सकी थी।

                “हलो,” उन दोनों को एक फीकी मुस्कान दे कर शशि जगन की सौतेली मां की ओर मुड़ ली।

                “प्रणाम,” बिना किसी संबोधन के शशि ने दूर ही से उस की ओर देख कर अपने हाथ जोड़ दिए।

               जगन की सौतेली मां ने हल्के से अपनी आंखें झपका कर अपना सिर हिलाया।

               “बोलो मां,” शशि ने मां का मोबाइल नंबर मिलाया।

               “सब ठीक है ना?” मां ने पूछा।

               “क्यों?” शशि ने पूछा।

                यह शादी शशि की मनमरज़ी की नहीं थी। जगन की बजाए वह मुकुल से शादी करना चाहती थी।

                “मुझे फ़िक्र हो रही थी,” मां ने कहा, “तुम्हारे पगभेरे की।”

                 इस शादी के लिए उसे मां ने राज़ी किया था, ‘यह मत सोच लड़का केवल दसवीं पास है। यह सोच वह तुझे बदनामी और गरीबी से दूर ले जा रहा है।’

                अपने संग अपने प्रस्तावित विवाह को मुकुल का पूरे दो वर्ष तक लगातार स्थगित करते चले जाने ने शशि के लिए अनावश्यक लोक- निंदा तो बटोरी ही थी।

                “तुम मेरी फ़िक्र अब छोड़ दो, मां,” शशि मां से बहुत नाराज़ थी। पति के बिना बच्चों को समय पर भोजन व औषधि उपलब्ध कराने भर को कार्य- सिद्धि मान कर चलने वाली मां के दिल में उन पांचों में से किसी के लिए भी अनुरक्ति न रही थी। मां के लिए वे मात्र पांच कार्यभार थे। अतिरिक्त कार्यभार।

                मां फ़ोन पर रोने लगी। 

               “पगफेरे के लिए अभी आ रही हूं। वह बाद में आएंगे,” शशि ने चोंगा नीचे रख दिया।

                “पगफेरे के लिए पूछा है?” जगन की सौतेली मां ने उसे धर दबोचा।

                 “जी,” शशि ने कहा।

                 “अभी जाओगी? अकेली? जगन के बिना?” जगन की सौतेली मां ने अपने सिर को अगल- बगल हिलाया।

                 “जी।अभी,” शशि ने कहा, “उन्हें सुबह यहां कुछ काम है….”

                 “सुबह उसे काम है तो तुम्हीं रुक जाओ। अकेले जाना तुम्हें शोभा नहीं देगा….”

                 “वही बोले मैं जब जाना चाहूं, ड्राइवर के साथ चली जाऊं। वह बाद में आ जाएंगे….” बिना दांए- बांए देखे शशि बैठक से बाहर हो ली।

                 उसे उस समय एकांत चाहिए था। जो वहीं संभव था।

 

3

 

                 जब वह घर पहुंची तो घर में दादी थीं। हमेशा की तरह अकेली।

                 “मिठाई खांएगी?” शशि उदार हो आई।

                  दादी के साथ घर का कोई भी सदस्य न कभी अपना सुख बांटता, न दुख। अपने उस चौरासीवें वर्ष में उन के पास एक ही तरंग बची थी : खाने की। जिस समय भी वह खातीं, भरपेट से ज़्यादा ही खातीं और जिस भी समय खा नहीं रहीं होतीं, भूख की शिकायत कर रहीं होतीं।

                “तेरी ससुराल की है?” दादी की लार टपक ली।

                “हां,” पूरा डिब्बा दादी के हाथ में थमा कर वह अंदर वाले कमरे में चली आई। 

                अलगनी पर मां की साड़ी फैली थी। उन की आदत की तहत। जो रोज़ ही दफ़्तर के लिए निकलने से पहले वह नहाने के बाद अपने कपड़े धोकर जाती थीं।

                पंद्रह वर्ष पूर्व हुई शशि के पिता की मृत्यु के बाद मां की भरती उसी बिजली के दफ़्तर में बतौर क्लर्क हो गई थी, जहां उस के पिता एकाउंटेंट रहे थे।

                कपड़ों की घोड़ी पर वीणा के दो सलवार सूट खुले थे। अपनी एम.ए. क्लास के लिए जाने से पहले जब भी वह वस्त्र धारण करती, कम- से- कम दो पहनावे तो खोलती ही खोलती। 

                ऊंची मेज़ पर दसवीं में पढ़ रहे रोहित की किताबें- कापियां थीं। बिचली मेज़ पर बी.एस.सी. के दूसरे साल के छात्र मोहित का भारी- भरकम ज्यामिति बाक्स और सभी रंगों की पेंसिलों से भरा पेन स्टैंड खड़ा था।

तख्त पर एम.कौम. कर चुके संजय की सिविल परीक्षा की कई पत्रिकाएं और अखबार बिखरे पड़े थे।

                शशि अपने बक्से की ओर बढ़ ली। उस के ताले की चाबी उस के पर्स में थी। बक्से के तल पर बिछे कागज़ के नीचे रखे वे दोनों पत्र वह बाहर ले आई। 

               दोनों मुकुल के थे।

               उस ने पहले बाद वाला पत्र खोला:

‘अपने को पूर्ण रूप से अब समझा हूं। मैं निचान हूं। एक तली। एक तह। तुम्हें जहाज़ चाहिए।’

                पहला पत्र बेहतर दिनों में लिखा गया था :

                ‘बहुतों ने तुम्हें बहुत रूपवान बताया होगा किंतु मेरे लिए तुम मेरी सब से ऊंची तान हो। मेरा गहरा रंग हो।मेरा परम उत्साह।’ 

                उन्हें फाड़ते समय उस के हिये में बंद चीख ने अचानक ढक्कन के डाट को परे धकेल दिया और बाहर उछल पड़ी। उस के कंठ की ओर। 

                पत्थर फेंकने की दूरी पर बसे दूसरे घरों में उपस्थित कई जन उस के एकांत में घुस पड़े।

               “यह सब क्या है?” सभी चौंके थे, “तुम्हारी मां को खबर करते हैं….”

                वह पुनः बंद हो गई। 

 

                दोपहर में नियत समय पर जगन शशि को लेने आया।

                स्वेच्छाचारी और घुमंतू छोटी और तीनों लड़के अभी भी घर से नदारद थे।

               बाज़ार में सामान खरीद रही मां खबर पाते ही ज़रूर समय से बहुत पहले पहुंच ली थी।

               दामाद के स्वागत में उसने दोनों को चाय- नाश्ता दिया। जगन के ड्राइवर को चाय- नाश्ता कराया और फिर ड्राइवर के हाथ ‘पगफेरे’ का साजोसामान जगन की मोटरगाड़ी में रखवाया।

               गली के मुहाने पर खड़ी मोटरगाड़ी तक भी केवल मां ही उसे छोड़ने आई। जगन के पीछे- पीछे।

 

4

 

               अपने मकान पर पहुंचते ही जगन ने अपनी सौतेली मां के सामने शशि की मां के सामान को अपनी उद्धत निगाह में उतारा और एक ओर सरका दिया, “उस गरीब विधवा के पास मगज़ नाम की कोई चीज़ नहीं। मगज़ अगर होता तो हमारे लिए यह कूड़ा- करकट भेजती?”

               शशि इस के लिए तैयार न थी। उस का हिया डोल गया। उस में बंद डिबिया का ढक्कन खटखटाया।

               मां उस के सामने आ खड़ी हुईं। 

               बेरहम इन लोगों से लानतें लेती हुई। दुगुने वेग से ज़्यादा कर्मठ और मज़बूत बनने का निश्चय करती हुई। निस्तेज और ढुलमुल अपनी अवस्था में चुकती- चुकाती हुई।

               नहीं, शशि मां की ज़िम्मेदारियों में वृद्धि नहीं कर सकती। नहीं करेगी।

               एक ही सांस में शशि ने तीसरी मंज़िल की सीढ़ियां पार कीं। चौथी मंज़िल की सीढ़ियां पार कीं। पांचवीं मंज़िल का प्रांगण पार किया और बारजे पर पहुंचते ही अपनी चीख के साथ नीचे जा कूदी।