मेरी शादी की कहानी जितनी अजीब थी, उतनी ही अजीब मेरी किस्मत भी थी।
लेकिन अगर आप समझना चाहते हैं कि उस रात पुराने फोन में अंजली का नाम देखकर मैं टूटकर क्यों नहीं बैठ गई, तो आपको मेरे साथ कुछ साल पीछे चलना होगा।
उस घर में, जहाँ मेरा जन्म हुआ था।
मैं आज जो हूँ, वह मुझे किसी ने बनाकर नहीं दिया। मेरे माँ-पापा ने मुझे हिम्मत दी, लेकिन रास्ते पर चलना मुझे खुद सीखना पड़ा।
मेरे जन्म से पहले माँ-पापा की शादी को लगभग दस साल हो चुके थे। इतने सालों तक उनकी कोई संतान नहीं हुई थी। माँ ने कितनी मन्नतें माँगीं, कितने मंदिरों में माथा टेका—यह सब उन्होंने मुझे बाद में बताया था। पापा भी एक बच्चे के लिए प्रार्थना करते थे।
फिर मेरा जन्म हुआ।
माँ बताती थीं कि उस दिन पापा मुझे गोद में लेकर पूरे घर में घूम रहे थे। जो भी मिलने आता, उसे मेरा चेहरा दिखाकर कहते, “देखो, हमारी बेटी आई है।”
मेरे आने पर घर में त्योहार जैसा माहौल था।
लेकिन अगले कुछ सालों में हमारा परिवार इतना बड़ा हो गया कि उस खुशी के साथ बहुत बड़ी जिम्मेदारियाँ भी जुड़ गईं। मेरे बाद एक के बाद एक बच्चे हुए। हर बार बेटी।
एक। दो। तीन।
और धीरे-धीरे हमारे घर में ग्यारह बेटियाँ हो गईं।
हाँ, ग्यारह बेटियाँ।
लड़के की उम्मीद में परिवार बढ़ता गया। मैं सबसे बड़ी थी। घर में कुल तेरह लोग थे—हम ग्यारह बहनें, माँ और पापा।
कमाने वाले केवल पापा थे। वे एक मिल में मजदूरी करते थे। तनख्वाह बहुत बड़ी नहीं थी और कई बार समय पर मिलती भी नहीं थी। महीने के आखिर में घर के इतने लोगों के लिए खाना जुटाने का हिसाब लगाते हुए माँ का चेहरा बदल जाता। वह हमसे कुछ कहती नहीं थीं, लेकिन मुझे समझ आने लगा था कि उन्हें रोज खर्च का हिसाब लगाना पड़ता है।
कभी घर में राशन होता तो दूसरी जरूरतों के लिए पैसे नहीं होते। कभी पापा की तनख्वाह आती तो पहले से खड़ी देनदारियाँ उसे खत्म कर देतीं। किसी बहन को स्कूल की किताब चाहिए होती, किसी की चप्पल टूट जाती, तो किसी को बुखार आ जाता।
इतने बड़े घर में एक छोटी-सी जरूरत भी अकेली नहीं आती थी।
फिर भी पापा की एक बात कभी नहीं बदली। वे हम सभी बहनों से कहते, “पैसा आज है, कल नहीं भी होगा। लेकिन पढ़ाई कर ली तो उसे कोई तुमसे नहीं छीन सकता।”
मैं छोटी थी। उस समय मुझे पूरी बात समझ नहीं आती थी। बस इतना समझती थी कि पापा थके हुए घर लौटें, तब भी हमारी कॉपियाँ देखकर पूछते थे, “आज स्कूल में क्या पढ़ाया?”
पापा चाहते थे कि उनकी हर बेटी पढ़े। लेकिन सिर्फ चाहने से घर का खर्च नहीं चलता था।
माँ खेतों में मजदूरी करने लगीं। सुबह अँधेरा रहते उठतीं, सबके लिए जो बन सके वह पकातीं और काम पर निकल जातीं। शाम को लौटतीं तो उनके हाथों और कपड़ों पर मिट्टी लगी होती। वह दरवाजे पर बैठकर कुछ देर साँस लेतीं, फिर घर के काम में लग जातीं।
मैं उन्हें देखा करती थी। कई बार मन करता था कि कह दूँ, “माँ, आप बैठो। आज कुछ मत करो।” मगर तब इतनी बड़ी नहीं थी कि उनका सारा काम अपने हाथ में ले सकूँ।
एक समय ऐसा आया जब पापा ने सोचा कि गाँव में रहकर घर चलाना और मुश्किल होता जाएगा। उन्होंने मुंबई जाने का फैसला किया। वहाँ बेहतर काम मिलने की उम्मीद थी।
जिस दिन वे निकले, माँ ने उनके लिए खाना बाँधा। हम बहनें दरवाजे पर खड़ी थीं। पापा ने मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा, “घर में माँ का ध्यान रखना। और पढ़ाई बंद मत करना।”
मैंने तुरंत कहा, “आप जल्दी वापस आना।”
उन्होंने मुस्कुराकर हामी भर दी।
मुंबई में उन्हें जितनी उम्मीद थी, उतना सहारा नहीं मिला। उन्हें पहले से पाइल्स की तकलीफ थी। वहाँ की भागदौड़ और अनियमित खाने-पीने से उनकी तबीयत और बिगड़ने लगी। कुछ समय बाद उन्हें वापस गाँव आना पड़ा।
पापा लौटे तो हम सब खुश हुए। लेकिन माँ का चेहरा देखकर मैं समझ गई कि घर की चिंता भी उनके साथ लौट आई थी।
बीमारी के कारण पापा पहले की तरह काम नहीं कर पा रहे थे। माँ खेतों में जाती थीं, मगर उससे मिलने वाले पैसे तेरह लोगों के लिए काफी नहीं होते थे। मैं सबसे बड़ी थी। मेरी एक छोटी बहन भी मेरे साथ मदद करने लगी।
मैं आसपास के घरों में छोटे-मोटे काम करने लगी। कहीं बर्तन माँज देती, कहीं कपड़े धो देती। जो काम मिल जाता, कर लेती। काम खत्म होने पर जो पैसे हाथ में आते, सीधे माँ को दे देती।
एक दिन माँ ने पैसे लेते हुए कहा, “तुझे इतनी छोटी उम्र में यह सब नहीं करना चाहिए।”
मैंने कहा, “तो आप अकेली कितना काम करोगी?”
उन्होंने मेरा चेहरा देखा, फिर मुझे अपने पास बैठा लिया। वह कुछ बोल नहीं पाईं। मैं भी नहीं बोली। माँ के हाथों की थकान मुझे दिखाई दे रही थी; मेरे हाथों पर लगे साबुन और पानी के निशान उन्हें।
मुझे काम करने में शर्म नहीं आती थी। मैं जानती थी कि बर्तन माँजने या कपड़े धोने से मैं छोटी नहीं हो जाऊँगी। शाम को घर में खाना बने और माँ को थोड़ी राहत मिले, मेरे लिए वही काफी था।
बाद में मैं और मेरी छोटी बहन भी माँ के साथ खेतों में जाने लगे।
सुबह जल्दी उठना। काम मिलने वाली जगह तक पैदल जाना। दिन भर खेत में मेहनत करना। फिर थके हुए शरीर के साथ घर लौटना।
कई बार काम आठ-दस किलोमीटर दूर मिलता था। चलते समय मैं रास्ते के पत्थर गिनती रहती, ताकि थकान के बारे में कम सोचूँ। लौटते हुए पाँव दुखते थे। छोटी बहन पूछती, “दीदी, और कितना चलना है?”
मैं कहती, “बस थोड़ा-सा।”
मुझे पता होता था कि अभी रास्ता बाकी है। फिर भी उसके लिए वही जवाब देती। वह मेरा हाथ पकड़कर चलती रहती।
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है, शायद वहीं मेरी असली ट्रेनिंग शुरू हुई थी। डॉक्टर बनने की नहीं—मुश्किल दिन काटने की।
उन दिनों मजदूरी का काम भी रोज नहीं मिलता था। कभी इतना पैदल चलने के बाद पता चलता कि आज और लोगों की जरूरत नहीं है। माँ चेहरे पर निराशा आने नहीं देती थीं। वह हमें लेकर वापस चल पड़तीं और रास्ते में सोचतीं कि घर पहुँचकर क्या बनाया जा सकता है।
हमारी जरूरतें बहुत छोटी थीं। शाम को खाना मिल जाए तो अच्छा दिन लगता। स्कूल जाने के लिए किताब मिल जाए तो बड़ी बात थी।
पर मैं स्कूल छोड़ना नहीं चाहती थी।
एक दिन खेत से लौटकर मैं किताब खोलकर बैठी थी। आँखें पढ़े हुए शब्दों पर टिक नहीं रही थीं। माँ ने कहा, “आज बहुत थक गई होगी। कल पढ़ लेना।”
मैंने किताब बंद की, पर नींद भी नहीं आई। मुझे पापा की बात याद आ रही थी—पढ़ाई कर ली तो कोई उसे छीन नहीं सकता।
कुछ देर बाद पापा मेरे पास आए। “क्या हुआ? किताब क्यों बंद कर दी?”
“आज कुछ समझ नहीं आ रहा,” मैंने कहा।
उन्होंने मेरी कॉपी उठाई। उन्हें मेरी पढ़ाई का हर विषय आता हो, ऐसा नहीं था। फिर भी उन्होंने पूछा, “कल स्कूल में यही पूछेंगे?”
मैंने सिर हिलाया।
“तो थोड़ा पढ़ ले। फिर सो जाना। कल खेत जाने की जरूरत हुई, तो मैं देखूँगा क्या करना है।”
मैंने उनकी ओर देखा। उनकी अपनी तबीयत ठीक नहीं थी, फिर भी वे मेरे स्कूल के अगले दिन के बारे में सोच रहे थे। मैंने दोबारा किताब खोली।
धीरे-धीरे मेरे मन में एक सपना जगह बनाने लगा।
मुझे डॉक्टर बनना था।
शायद इसलिए कि मैं पापा को बीमारी से परेशान देखती थी। शायद इसलिए कि हमारे घर में किसी की तबीयत बिगड़ती तो इलाज का खर्च सुनकर माँ-पापा पहले एक-दूसरे का चेहरा देखते थे। मैं चाहती थी कि एक दिन उनके सामने ऐसी परेशानी आए तो वे बेबस महसूस न करें।
और शायद इसलिए भी कि पापा ने एक बार मुझसे कहा था, “बेटी, अगर तू पढ़-लिखकर डॉक्टर बन गई ना, तो मुझे लगेगा मेरी सारी मेहनत सफल हो गई।”
मुझे उनका वह चेहरा आज भी याद है। वे मुझे देख रहे थे, मगर उनकी आँखों में मेरा आने वाला कल था।
मैंने उसी दिन मन में फैसला किया—चाहे कितना भी समय लगे, मैं डॉक्टर बनूँगी।
मेरे आसपास के लोग इसे आसान सपना नहीं मानते थे।
किसी ने कहा, “इतने बड़े परिवार में एक लड़की को डॉक्टर बनाने के पैसे कहाँ से आएँगे?”
किसी ने माँ से पूछा, “इतना पढ़ाकर क्या करोगे? आगे शादी ही तो करनी है।”
एक आदमी ने तो मेरे सामने ही कहा, “ग्यारह बेटियों में से सबको कितना पढ़ाओगे?”
मैं पापा की ओर देखने लगी। मुझे डर था कि शायद वे भी सोचने लगेंगे कि लोग सही कह रहे हैं।
लेकिन पापा ने साफ जवाब दिया, “जितना होगा, उतना करूँगा। मेरी बेटी की पढ़ाई नहीं रुकेगी।”
उस दिन उन्होंने कोई लंबी बात नहीं की। वे अपने काम में लग गए। पर उनका जवाब मेरे साथ रह गया।
उसके बाद जब भी मैं थकती, मुझे वही आवाज सुनाई देती—मेरी बेटी की पढ़ाई नहीं रुकेगी।
माँ ने भी कभी मुझे यह नहीं कहा कि पढ़ाई छोड़कर बस घर सँभालो। काम सबको करना था, मैं भी करती थी। लेकिन किताब हाथ में लेकर बैठती तो वह दूसरी बहनों को थोड़ी देर मेरे पास शोर न करने को कह देतीं।
मैं धीरे-धीरे समझ रही थी कि मेरा डॉक्टर बनने का सपना केवल मेरा नहीं रहा था। माँ-पापा भी उसे अपने हिस्से का सपना मानने लगे थे।
गाँव में कुछ लोग अब भी पूछते, “बनेगी डॉक्टर?”
मैं कहती, “हाँ।”
कई बार वे हँस देते। मैं उस हँसी को अपने साथ घर नहीं लाती थी। मेरे पास पहले से ही बहुत काम था—स्कूल का, घर का और खेत का। किसी को जवाब देने से ज्यादा जरूरी था अगले दिन फिर किताब खोलना।
बचपन में मैंने भूख देखी थी। मजदूरी की थी। लंबे रास्ते पैदल चली थी। लेकिन मैंने यह भी देखा था कि माँ थककर लौटने के बाद हमारे लिए खाना बनाती हैं, और पापा अपनी बीमारी के बावजूद हमारी पढ़ाई पूछते हैं।
उन्हीं के बीच मुझे मुश्किल समय में आगे बढ़ते रहने का तरीका मिला था।
जब मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनी, तो लोग अक्सर पूछते थे कि इतने मुश्किल हालात में पढ़ाई कैसे पूरी की।
मैं उन्हें हर दिन का हिसाब नहीं सुना पाती थी। बस कहती थी, “घरवालों ने साथ दिया। फिर मैंने पढ़ना जारी रखा।”
लेकिन उस जवाब के पीछे बहुत-सी सुबहें थीं, जब काम पर जाने से पहले किताब उठाई थी। बहुत-सी शामें थीं, जब थकान के बाद भी कॉपी खोली थी। माँ के हाथ थे। पापा की आवाज थी। और ग्यारह बहनों से भरा वह घर था, जिसमें मेरे लिए बैठकर पढ़ने की जगह मुश्किल से मिलती थी—फिर भी मिलती थी।
शायद इसीलिए शादी के कुछ साल बाद जब मेरे हाथ वह पुराना फोन लगा, तो मैंने खुद को सँभाला।
फोन में अंजली के संदेश थे। मैं जिस बहन की मदद के लिए कभी माँ-पापा के सामने खड़ी हुई थी, वही मुझसे सबसे बड़ी बात छिपा गई थी। और जिस आदमी से मेरी शादी हुई थी, वह इतने साल मुझसे सच छिपाता रहा था।
मुझे चोट लगी थी। बहुत गहरी चोट।
मगर मैं वह लड़की भी थी जो अपनी छोटी बहन का हाथ पकड़कर आठ-दस किलोमीटर पैदल चलती थी और घर लौटकर किताब खोलती थी। मैंने तब रास्ता बीच में नहीं छोड़ा था। अब भी नहीं छोड़ने वाली थी।
मैंने फोन दोबारा उठाया। पुराने संदेश एक-एक करके खोलने लगी। मुझे याद था कि अंजली के जाने से पहले घर में क्या हुआ था। अब देखना था कि उन संदेशों में उस दिन की कौन-सी बात छिपी थी।
अंजली शादी से एक दिन पहले कहाँ गई थी?
इस सवाल का जवाब पाने के लिए मुझे सबसे पहले यह समझना था कि वह जाने से पहले किससे बात कर रही थी।