[64]
“सरिता जी, संसार की तीन अवस्थाएं हैं, उत्पत्ति – स्थिति – प्रलय। इन तीनों अवस्थाओं से संसार चक्र चलता रहता है। संसार के चलने के लिए हम जन्म लेते हैं, शरीर धारण करके शरीर के माध्यम से कर्म करते हैं, सुख दु:ख का अनुभव करते हैं, समय आने पर उसी शरीर को त्याग कर चले जाते हैं। प्रत्येक पुरुष को अर्थात आत्मा को किसी न किसी विशेष कार्य के लिए जन्म लेना पड़ता है। मेरे इस शरीर का भी कोई विशेष कार्य हेतु प्रयोजन होगा। आपके शरीर का भी ऐसा ही कोई विशेष प्रयोजन होगा। सभी का कोई न कोई प्रयोजन अवश्य होता है।”
“मेरे इस शरीर का प्रयोजन, विशेष प्रयोजन क्या होगा?”
“मुझे तो कोई विशेष प्रयोजन नहीं दिख रहा। मैं तो वही कर रहा हूँ जो सभी मनुष्य कर रहे हैं। जन्म लेना, खाना, संबंध रखना, नौकरी करना, परिवार बनाना, सुख दु:ख भोगना और मर जाना। इसमें विशेष क्या है?”
“शैल, प्रथम दृष्टि से तुम्हारी बात उचित है। मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी बिना प्रयोजन के कुछ भी नहीं करता। सृष्टि के और हम सब के रचयिता ईश्वर क्या किसी प्रयोजन के बिना ही इस सारे संसार को रचकर बैठ गया होगा? कोई तो प्रयोजन अवश्य होगा ही।”
“मान लिया। किन्तु वह प्रयोजन है क्या? हमें कैसे ज्ञात होगा कि हम किस प्रयोजन से इस धरती पर इस शरीर को लेकर भेजे गए हैं?”
“सरिता जी, इसका मेरे पास कोई उत्तर नहीं है। इतना कह सकता हूँ कि जिसे हम नियति कहते हैं वह समय आने पर हमें एक ऐसे बिन्दु पर ले जाती है जहां से हम उस प्रयोजन की दिशा में कार्य करने लगते हैं। हम कितना भी उस कार्य से दूर जाना चाहें, वह कार्य हमसे दूर नहीं जाता।”
“उस बिन्दु का ज्ञान कैसे होता है?”
“उस बिन्दु का ज्ञान कब होता है?”
“जब हम उस कार्य को सम्पन्न कर लेते हैं तब हमारे मन को यह समज आता है कि नियति हमसे यह कार्य करवाना चाहती थी। यही हमारा विशेष प्रयोजन था। इससे पूर्व कोई विरल पुरुष ही इसको जान सकता है।”
“ओह, हमारे शरीर का यह महत्व है!”
“शैल, हमारे शरीर के उस विशेष प्रयोजन की हमें प्रतीक्षा करनी है। तब तक इसे धारण कर के रखना होगा। इसका त्याग नहीं करना है। हैं न वत्सर?”
“आपने ठीक समझा, सरिता जी। शैल, एक और बात। हम केवल पुरुष या आत्मा ही नहीं हैं। हम उस परमतत्व के अंश भी हैं। वह भी हमारे साथ इस शरीर में रहता है। इसका क्या अर्थ समझते हो?”
“हमारा शरीर अति मूल्यवान संपत्ति है क्यों कि इसमें हमारे साथ परमतत्व भी रहता है।”
“पूर्ण सत्य कहा आपने सरिता जी।”
“अब मैं कभी इसे नष्ट करने का प्रयास नहीं करूंगी।”
“मैं भी नहीं करूंगा।”
“आप दोनों पर श्री कृष्ण की कृपा बनी रहे। और कोई प्रश्न तो नहीं?”
‘है, प्रश्न तो अनगिनत है वत्सर। किन्तु अभी रात्री अधिक हो चुकी है तो कल पुछ सकते हैं?”
“अवश्य शैल। मैं मेरी मति अनुसार उसका समाधान करने का यत्न करूंगा। जय श्रीकृष्ण।”
[/][/][/][/]
रात्री का अंतिम प्रहर बीतने को था। तभी सहसा कुछ ध्वनि से सरिता की निद्रा भंग हो गई। उसने ध्वनि की तरफ देखा। अंधकार के कारण कुछ भी स्पष्ट नहीं दिख सका। ध्यान से देखा तो उसे एक आकृति दूर से समीप आती हुई दिखी। वह आकृति जब समीप आकर मंदिर की दिशा में चली तो सरिता का कुतूहल आशंका में बदल गया। उसने शैल को जगाया।
“कहीं कोई दुष्ट व्यक्ति तो नहीं जो मंदिर के भीतर किसी दुष्ट आशय से गया हो। हमें देखना चाहिए।”
“चलो। किन्तु सावधानी से।”
दोनों आकृति के पीछे पीछे गए। आकृति मंदिर के पास रुकी। उसने मंदिर के द्वार खोले, भीतर चली गई। गर्भ द्वार खोला। भीतर जल रहे दीपक का प्रकाश उस आकृति पर पड़ा। उस आकृति को देखकर दोनों आश्चर्य से परस्पर देखने लगे। दोनों के होंठों पर स्मित था।
“अरे, यह तो वत्सर है!”
दोनों लौट गए, मन शांत हो गया। प्रभात के पूर्व समय की मधुर वायु बह रही थी जिसने दोनों को निद्राधिन कर दिया।
[;][;][;][;][;]
सूर्य की प्रथम किरण ने मंदिर के द्वार से प्रवेश कर भगवान श्रीकृष्ण के ललाट पर तिलक किया तब वत्सर ने मधुर स्वरों में बोलते हुए भगवान की आरती प्रारंभ की। एक हाथ से आरती तो दूसरे हाथ से घंटारव होने लगा। घंटारव की ध्वनि ने सरिता शैल को निद्रा जगत से वास्तविक जगत में ला दिया। दोनों त्वरा से उठे। मंदिर की दिशा में हाथ जोड़कर दूर से ही आरती में सम्मिलित हो गए। आरती सम्पन्न हुई। प्रभु को नमन कर दोनों लौट रहे थे कि वत्सर ने दोनों को रोका, “आरती लेकर जाइएगा।”
दोनों लौटे, भाव पूर्वक आरती ली और खड़े रहे। वत्सर ने मंत्रोच्चार किया, दोनों को आशीष देते हुए कहा, “ईश्वर आपका कल्याण करें।”
वत्सर मंदिर के भीतर चला गया। दोनों स्नान आदि से शुद्ध होकर वत्सर के पास मंदिर में आ गए। वत्सर अपने नित्य पूजा, संध्या आदि में रत था। दोनों ने दर्शन किए और शांत चित्त से भगवान के सम्मुख बैठकर प्रतिमा को निहारने लगे।
समय पर वत्सर ने अपना नित्य कर्म सम्पन्न किया। प्रभु को वंदन कर दोनों के पास आया, “मैं खेत में जा रहा हूँ। आप भी चाहो तो आ सकते हो। काम भी करेंगे, बातें भी होती रहेगी।” दोनों ने एक दूसरे को देखा।
“यदि आप चाहो तो मंदिर में बैठकर प्रभु की भक्ति भी कर सकते हो। मुझे लौटते लौटते दोपहर हो जाएगी। तब मैं भगवान के लिए भोग लेकर आऊँगा।” वत्सर जाने लगा।
क्षणभर विचार और विलंब करने के पश्चात दोनों खड़े हुए, वत्सर के साथ चलने लगे।
“वैसे तो तुम्हारा मंदिर और खेत एक ही है तो ऐसा क्यों कह रहे हो कि खेत में जा रहा हूँ?”
सस्मित वत्सर बोला, “सत्य कह रहे हो तुम शैल, वैसे तो दोनों एक ही है केवल क्रियाओं का भेद इसे मंदिर और खेत में बाँट देता है।”
“वह कैसे?”
“सरिता जी, मंदिर में धान नहीं उगाया जाता, खेत में संध्या पूजा आरती नहीं की जा सकती।” बोलकर वत्सर हंस पड़ा। सरिता और शैल भी।
वत्सर खेती का काम करता रहा, शैल उसे यथा संभव सहाय करने का प्रयत्न करता रहा। सरिता साथ साथ चलते हुए बातें करने लगी।
“वत्सर, प्रात:काल तुम जब भीगे वस्त्रों के साथ मंदिर में प्रवेश कर रहे थे तब हमने अंधकार के कारण तुम्हें चोर समझ लिया था। तुम्हारे पिछे पीछे मैं और शैल वहाँ तक आए थे।”
“जब तुम्हें वहाँ देखा तो हम निश्चिंत होकर लौट गए और निद्राधिन हो गए।”
“शैल, इसका अर्थ यह है कि आप दोनों अभी भी अपने मूल स्वभाव के वश में हो।”
“क्या? कैसा स्वभाव?” दोनों एक साथ बोल पड़े।
“पुलिस वाला स्वभाव।”
“सत्य कहा, वत्सर।”
“मैंने तो मेरा पूरा जीवन पुलिस का ही काम किया है। तो अब तो यह स्वभाव इस देह के साथ ही जाएगा।”
“अरे वाह ! सरिता जी। आप तो तत्व चिंतक की भाषा बोल रहे हैं।”
“यह सब तो तुम्हारे संग का और इस मंदिर के पवित्र तरंगों का प्रभाव है।”
“तत्वज्ञान से मुझे एक प्रश्न हो रहा है, वत्सर। क्या मैं पूछूँ?”
“शैल, अभी रुको। प्रथम मेरी जिज्ञासा का उत्तर दो।” वत्सर ने कहा।
“तुम्हारी जिज्ञासा? और हम उत्तर दें?”
“हाँ, आप दोनों। आप दोनों ने अभी अभी कहा कि आपका पुलिसवाला मूल स्वभाव अभी भी जीवित है तो तब आप क्या कर रहे थे जब आपको सपन और निहारिका प्रताड़ित कर रहे थे? तब भी आप उसका प्रतिकार करने के स्थान पर उनसे भागते रहे? यह तो पुलिसवाला स्वभाव नहीं है?”
“तुम सही कह रहे हो, वत्सर। उस समय हम डरे हुए थे क्यूँ कि मैं नहीं चाहता था कि सरिता जी को पुन: पाकिस्तान लौटना पड़े। इसीलिए हमने प्रतिकार करना उचित नहीं समझा।”
“हमारी इसी मानसिकता का वे लाभ उठाते हैं और हम पिछड़ जाते हैं।”
“वत्सर, तुमसे मिलकर अब हम निर्भय हो गए हैं। मैं विश्वास दिलाती हूँ कि अब कभी उन दोनों का सामना हुआ तो मैं उसे नहीं छोड़ूँगी।”
“मैं भी।”
“अब हुई न पुलिसवाली बात।” वत्सर ने कहा।
“अब मैं मेरा प्रश्न रखूं?”
“रखो शैल। अब तो सरिता जी भी प्रश्नों के उत्तर दे सकती हैं। हैं न सरिता जी?”
“वत्सर, तुम मेरा उपहास क्यों कर रहे हो?”
“मुझे तो उत्तर चाहिए। सरिता जी आप दें या वत्सर तुम दो। प्रथम मुझे प्रश्न तो कर लेने दो।”
“करो न। किसने रोका है तुम्हें?”
“सरिता जी, सुनिए। प्रात: काल वत्सर तुम भीगे वस्त्रों में क्यों थे?”
“तारा स्नान करके मैं लौटा था इस लिए।”
“तारा स्नान क्या होता है?”
“रात्री के अंतिम प्रहर में जब आकाश में तारें होते हैं, सूर्योदय में कुछ समय शेष होता है तब किसी बहते हुए पानी में – जैसे नदी, झरना, सरोवर आदि में स्नान करने की क्रिया को तारा स्नान कहते हैं।”
“घर के भीतर भी तो स्नान किया जा सकता है तो नदी झरनों में क्यों?”
“जहां नदी झरने उपलब्ध हो वहाँ यथा संभव तारा स्नान करने का शास्त्रों में महत्व कहा गया है। क्यों कि वहाँ पानी बहता रहता है। बहता पानी पवित्र भी होता है, शुद्ध भी।”
“शुद्ध तो मान लिया, पवित्र कैसे?”
“नदी और झरने का पानी बहते बहते अनेक प्रदेशों से होता हुआ आता है। अपने साथ अनेक प्रदेशों की धुली लेकर आता है। इन धुली में न जाने कीन कीन ऋषि, साधु, संत, पवित्र आत्माओं के चरण पड़े होंगे। उनके शुद्ध और पवित्र विचारों का प्रभाव यह जल पर भी पड़ता है। बहता पानी अपने साथ उन पवित्र विचारों को भी लेकर आता है। इसी लिए बहता पानी सदैव शुद्ध और पवित्र होता है।”