पहली कहानी Raam द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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पहली कहानी

उस रात विनय के सामने एक खाली कागज था और भीतर सवालों का पूरा जंगल।
बाहर बारिश हो रही थी। छत से टपकती बूँदें किसी पुराने गीत की तरह एक ही लय में गिर रही थीं। मेज पर रखी चाय ठंडी हो चुकी थी और कमरे की दीवार पर टँगी घड़ी रात के बारह बजने का संकेत दे रही थी।
विनय ने कलम उठाई, कागज पर तारीख लिखी और फिर रुक गया।
वह कई वर्षों से कहानियाँ पढ़ता आया था। कभी प्रेमचंद के पात्रों में अपना गाँव खोजता, कभी गुलज़ार के शब्दों में अपने मन की उदासी। उसे लगता था कि दुनिया में ऐसा कोई दुख नहीं, जिसे किसी लेखक ने शब्द न दिए हों। फिर भी उसके भीतर एक कहानी थी, जो किसी किताब में नहीं मिलती थी।
वह अपनी कहानी लिखना चाहता था।
लेकिन शुरुआत कैसे करे?
उसने लिखा, 'एक समय की बात है...'
फिर उसे काट दिया।
लिखा, 'रामपुर नाम के एक गाँव में...'
वह भी काट दिया।
कुछ देर बाद झुँझलाकर उसने कलम मेज पर रख दी।
"कहानी लिखना इतना मुश्किल होता है क्या?" उसने खुद से पूछा।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
इतनी रात को कौन हो सकता था?
विनय ने दरवाजा खोला। सामने लगभग साठ वर्ष का एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। उसके कपड़े बारिश से भीगे हुए थे। हाथ में कपड़े का एक पुराना थैला था और आँखों में अजीब-सी थकान।
"बेटा, थोड़ी देर यहाँ बैठ सकता हूँ? बारिश रुक जाए तो चला जाऊँगा।"
विनय ने उसे भीतर बुला लिया। तौलिया दिया और चाय बनाने चला गया।
चाय पीते हुए बूढ़े ने मेज पर पड़े कागजों को देखा।
"लेखक हो?"
विनय मुस्कराया।
"अभी नहीं। बनने की कोशिश कर रहा हूँ।"
बूढ़ा हँसा।
"यह तो अच्छी बात है। आजकल लोग बिना कुछ बने ही अपने आपको बहुत कुछ समझने लगते हैं। तुम कम-से-कम बनने की कोशिश तो कर रहे हो।"
विनय को उसकी बात अच्छी लगी।
"बाबा, आप भी कभी लिखते थे क्या?"
बूढ़े ने चाय का प्याला नीचे रखा।
"नहीं बेटा, मैं तो बस जिंदगी लिखता रहा।"
"मतलब?"
"मतलब यह कि पैंतीस साल तक डाकघर में चिट्ठियाँ बाँटता रहा। लोगों के सुख-दुख उनके दरवाजों तक पहुँचाए। किसी की बेटी की शादी का निमंत्रण, किसी के बेटे की नौकरी की खबर, किसी की माँ के मरने का तार... सब पहुँचाया। बस अपनी जिंदगी का एक पत्र कभी नहीं लिख पाया।"
विनय चुप हो गया।
बूढ़ा कुछ देर खिड़की से बारिश देखता रहा, फिर बोला,
"एक चिट्ठी थी मेरे पास। बहुत साल पहले की। एक लड़की ने अपने पिता को लिखी थी। वह उनसे नाराज होकर घर छोड़ गई थी। चिट्ठी में लिखा था कि वह लौटना चाहती है, बस पिता उसे एक बार माफ कर दें।"
"फिर आपने चिट्ठी पहुँचा दी?"
बूढ़े ने सिर झुका लिया।
"नहीं।"
"क्यों?"
"उस पते पर गया तो पता चला, उसके पिता मर चुके थे। मैंने सोचा, अब इस चिट्ठी का क्या करूँ? लड़की का पता भी अधूरा था। चिट्ठी अपने पास रख ली। सोचा, कभी कुछ पता चलेगा तो पहुँचा दूँगा।"
उसने थैले से एक पुराना लिफाफा निकाला। उसके किनारे पीले पड़ चुके थे।
"आज सफाई करते समय मिला। नौकरी से रिटायर हुए भी कई साल हो गए। अब लगता है, कुछ चिट्ठियाँ देर से नहीं पहुँचतीं, कभी पहुँचती ही नहीं हैं।"
विनय ने लिफाफे को ध्यान से देखा।
"आप उसे ढूँढ़ने की कोशिश कर सकते हैं।"
"कहाँ ढूँढ़ूँगा, बेटा? इतने साल बाद वह कहाँ होगी, जिंदा भी होगी या नहीं, कौन जाने!"
बूढ़े की आवाज भर्रा गई।
"लेकिन एक बात समझ नहीं आई। उस लड़की को अपने पिता से शिकायत थी। पिता को अपनी बेटी से शिकायत रही होगी। दोनों अपनी-अपनी जगह सही रहे होंगे। मगर एक चिट्ठी दोनों के बीच का रास्ता बन सकती थी। वह रास्ता मैंने बंद कर दिया।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
विनय को लगा, उसके सामने कोई बूढ़ा आदमी नहीं, एक अधूरी कहानी बैठी है।
उसने पूछा, "आपको अपने किए का पछतावा है?"
"बहुत।"
"तो क्या आप चाहते हैं कि मैं इस पर कहानी लिखूँ?"
बूढ़े ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।
"लिखना, तो इतना लिखना कि लोग अपने गुस्से में कही गई बातों और अपनी जिद में तोड़े गए रिश्तों के बारे में सोचें। और हाँ, मुझे अच्छा आदमी मत बनाना। गलती मेरी थी। कहानी में मेरी गलती रहने देना।"
विनय के हाथ अपने आप कलम की ओर बढ़ गए।
वह लिखने बैठा। पहली बार उसे लगा कि कहानी बनाने के लिए किसी राजकुमार, किसी महल या किसी चमत्कार की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक मामूली-सी गलती भी पूरी जिंदगी से बड़ी हो जाती है।
उसने बूढ़े की बातें लिखीं। चिट्ठी लिखी। उस बेटी का इंतजार लिखा, जिसके बारे में वह कुछ नहीं जानता था। उस पिता की मृत्यु लिखी, जो अपनी बेटी की एक पुकार सुनने से पहले ही चला गया था।
और अंत में उसने लिखा,
'कुछ चिट्ठियाँ डाकिए की थैली में नहीं, इंसान के अपराधबोध में पड़ी रहती हैं। वे तब तक नहीं पहुँचतीं, जब तक कोई उन्हें पढ़कर अपने भीतर कुछ बदल न ले।'
लिखते-लिखते सुबह हो गई।
विनय ने सिर उठाया तो बूढ़ा कुर्सी पर सो रहा था। बारिश थम चुकी थी। खिड़की से आती धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
विनय ने धीरे से उसे जगाया।
"बाबा, आपकी चिट्ठी पर कहानी पूरी हो गई।"
बूढ़े ने कागज उठाया। वह धीरे-धीरे पढ़ता रहा। कुछ पंक्तियों पर रुका, कुछ पर उसकी आँखें भर आईं।
आखिर में उसने कागज मेज पर रख दिया।
"बेटा, अब यह मेरी कहानी नहीं रही।"
"तो किसकी हो गई?"
बूढ़ा उठकर दरवाजे की ओर चला। बाहर निकलने से पहले पलटा और बोला,
"अब यह उन सबकी है, जिनके पास किसी को कहने के लिए कुछ है, लेकिन वे कल पर टाल रहे हैं।"
वह चला गया।
विनय देर तक दरवाजे पर खड़ा रहा। उसे बूढ़े का नाम तक नहीं मालूम था। वह दोबारा कभी मिला भी नहीं।
उस दिन विनय ने अपनी कहानी का नाम रखा, 'आखिरी चिट्ठी'।
उसने उसे एक पत्रिका में भेज दिया।
दो महीने बाद कहानी प्रकाशित हुई। उसके नाम के नीचे पहली बार छपा था, 'लेखक : विनय'।
वह पत्रिका हाथ में लिए बहुत देर तक बैठा रहा। फिर उसने अपनी माँ को फोन किया, जिनसे पिछले कई दिनों से किसी छोटी-सी बात पर नाराज था।
"माँ, खाना खा लिया?"
दूसरी ओर से आवाज आई, "हाँ बेटा, तूने खाया?"
विनय की आँखें भर आईं।
"माँ, एक बात कहनी थी..."
"क्या हुआ बेटा?"
"कुछ नहीं। बस... तुमसे बात करने का मन था।"
उसने फोन रख दिया।
मेज पर उसकी कहानी की एक प्रति रखी थी। खिड़की से आती हवा में उसका आखिरी पन्ना धीरे-धीरे हिल रहा था।
विनय मुस्कराया।
उसे समझ आ गया था कि लेखक बनने के लिए केवल शब्दों का जानकार होना काफी नहीं है। जरूरी है कि आदमी दूसरों के दुख को सुन सके, अपनी गलतियों को स्वीकार कर सके और उन बातों को लिखने का साहस जुटा सके, जिन्हें लोग अक्सर अपने भीतर ही दफन कर देते हैं।
उसकी पहली कहानी एक बूढ़े डाकिए के बारे में थी, लेकिन उस कहानी ने सबसे पहले विनय को ही एक बेहतर इंसान बनने की चिट्ठी लिख दी थी।
और शायद यही किसी लेखक की पहली कहानी का सबसे सुंदर अंत था— कि कहानी समाप्त होने के बाद भी वह किसी के जीवन में शुरू होती रहे।