बुकनी Deepak sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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बुकनी

 

              “कुछ चाहिए क्या?” अपने पति बलवान के पाश्र्व घाट पर बुकनी हर रात टपक लेती है….

              “नहीं,” वही शब्द बलवान को अब दहला देते हैं, “कुछ नहीं चाहिए…कुछ नहीं चाहिए…”

 

              “कुछ चाहिए क्या?” उस रात भी बुकनी ने यही पूछा था।

              “भूतनी,” बलराम चीख पड़ा था, “तुझे नींद नहीं आती क्या? मौत नहीं आती?”

               “ना,” बुकनी ने सिर हिलाया था, “तू बता तुझे क्या चाहिए?”

               “मुझे सुमित्रा चाहिए,” बलवान आवेश में आ गया था।

               “बेटी पर रहम कर,” जिस खटके के कारण बुकनी को रात भर सोने की नौबत न आया करती, वही अब मुंह बाए सामने खड़ा था, “बारहा मुश्किलें झेल कर मैं ने उसे दसवीं क्लास तक ला पहुंचाया है। उसे पढ़ लेने दे। उस की जून न बिगाड़…”

              “बेटी क्या तेरी अकेली की है? तेरी मां छोड़ गई थी उसे? तेरे लिए?”

              “क्या बात है, बप्पा?” बिजली की मानिंद सुमित्रा अपनी चारपाई से कौंधी थी, “आप अम्मा को क्यों कोस रहे हो?”

               “तुम्हारी अम्मा मुझे अच्छी नहीं लगती,” पुराने ढंग का बलवान सीधे से सुमित्रा का सामना करने से घबराता था, “कभी अच्छी नहीं लगी। अब और भी अच्छी नहीं लगती…”

              अपने पिता के जिस घिनावने ज़ुल्म की बुकनी पैदावार रही उस में उस का ज़िंदा बचे रहना ही किसी अचरज से कम न था। उस का पिता उस की मां का सगा बाप था और अपने महापाप को ढकने के लिए उस ने बुकनी को गर्भ ही में मार डालना चाहा था।उस की मां को कभी नागफ़नी खिला कर तो कभी सेहुंड़ और कुकुरमुत्ता।

               “अम्मा अच्छी नहीं लगतीं?” सुमित्रा ने लपक कर बुकनी को अपने अंक में भर लिया था, “जो दिन भर हमारी खातिर बंगले में पिसती है?”

               बुकनी को छिपाने के ख्याल से उस की मां को उस का पिता फिर इस बंगले के सर्वेंट क्वार्टर में छोड़ गया था। इकतीस साल पहले। क्वार्टर के बदले में बुकनी की मां बंगले के मालिक लोगों की पहली बच्ची की देखभाल करती रही थी। बतौर आया। आगामी दस सालों में मालकिन ने पांच और बच्चियों को जन्म दिया था लेकिन उन में बुकनी की मां चार ही को संभाल पाई थी। पांचवी बच्ची का चेचक उसे लील गया था। आखिरी लड़की को फिर बुकनी ही ने पाला था। अपनी अपांगता के रहते।अपने लोभ के निमित्त। सुमित्रा जब तक पैदा हो चुकी थी और बुकनी सुमित्रा को उसी स्कूल में पढ़ाना चाहती थी जहां मालकिन की लड़कियां पढ़ती थीं। बेशक सुमित्रा की यूनिफ़ार्म और किताबें बंगले से मिल जातीं थीं लेकिन उस के स्कूल की फ़ीस तो आखिर बुकनी ही को भरनी थी।

             “भूतनी तेरी खातिर पिसती होगी,” बलवान बड़बड़ाया था, “या फिर अपनी खातिर। मेरी खातिर तो बिल्कुल भी नहीं।मैं अपना कमाता हूं। अपना खाता हूं…”

              बुकनी की मां के मरने पर मालिक लोग ने उसे बलवान के संग ब्याह के लिए बाध्य किया था। मालिक लोग के पास एक ही सर्वेंट क्वार्टर था और उसे अब वे बुकनी के साथ-साथ बलवान को देना चाहते थे। उधर बुकनी का पिता बरसों से लापता था और इस क्वार्टर को छोड़ना बुकनी के लिए नामुमकिन था। बलवान मालिक लोगों के ड्राइवर का भाई था और मालिक लोग उसे रिक्शा खरीद कर देने का इरादा रखते थे जिस में उन की लड़कियों को स्कूल और कालेज पहुंचाया और लौटाया जा सके। लगातार महंगे हो रहे पेट्रोल की खपत कम करने हेतु। और इस तरह अपने सत्रहवें ही साल में बुकनी बलवान की पत्नी बना दी गई थी। स्कूल में लड़कियों को सुबह छोड़ने के बाद बलवान क्वार्टर में पहले अपनी नींद पूरी किया करता और फिर दोपहर में उन्हें स्कूल से लिवा कर दूसरी सवारियों के लिए निकल लेता था। क्वार्टर पर वह सिर्फ़ सुबह और दोपहर ही में खाता था। दोपहर बाद उसे जैसी सवारी मिलती,जैसा भाड़ा मिलता, उसी के हिसाब से अपना खरीदता, पीता और खाता था। हां, जिस किसी दिन मंदी रहती या फिर उस की तबीयत में सुस्ती,उस दिन का उस का खाना ज़रूर क्वार्टर की रसोई ही में पकाया और परोसा जाता था।

             “हमें अब सो जाना चाहिए,” सुमित्रा बातचीत की जादूगरनी थी, “सुबह सभी को जल्दी जागना है। अम्मा,चलो उठो। मेरी चारपाई पर चलो…”

             चारपाई पर लेटते ही सुमित्रा बुकनी के कान में फुसफुसायी थी,“बप्पा की नीयत ठीक नहीं। जब भी मौका मिलता है, मुझे कहीं भी छूने लगता है…”

              “कल से तू उधर बंगले में छोटी लड़कियों के पास सोएगी। इधर क्वार्टर में नहीं,” बुकनी ने फ़ैसला ले लिया था।

              बुकनी नहीं जानती थी वह उस की ज़िंदगी की आखिरी रात थी।

 

              अगली सुबह बलवान जैसे ही स्कूल में लड़कियों को पहुंचा कर क्वार्टर लौटा था तो बुकनी को घेर बैठा था।

             “चल भूतनी। रिक्शे में बैठ। तुझ से मेल- मिलाप करना है…”

             मालिक लोग के डर से बलवान जब भी बुकनी को पीटता बंगले से बाहर ले जाकर पीटता। जगहें बदल-बदल कर। कभी किसे खुले, खाली वीराने में तो कभी किसी अंधेरी,अकेली गली में।

             “मैं कहीं न जाऊंगी,” वह सहनशक्ति जिस की परास साल- दर- साल बुकनी अपने अंदर बढ़ाती रही थी, उस समय उस से अलग हो ली थी।

             “कैसे नहीं जाएगी, भूतनी?” बलवान बुकनी को उस के बालों से घसीटने लगा था।

             “ज़िद न कर,” बुकनी सीधी- सीधी मुकाबले पर उतर आयी थी, “वरना अभी अंदर मालकिन से वह सब उगल दूंगी जो तू उसकी बेटियों के बारे में बकता है या फिर यह भी कि तू अपनी बेटी की बरबादी का कैसा रास्ता तैयार करना चाहता है…”

             शुरू ही से बलवान मालिक लोग की लड़कियों के नाम ले-लेकर  छिछोरा अनाप- शनाप मुंह से निकालता रहा था। बेशक उनमें से दो अब ब्याही जा चुकीं थीं और दो देहली के किसी बड़े कालेज में पढ़ने के वास्ते बंगले से बाहर भेजी जा चुकीं थीं…

            “भूतनी,” बलवान बुकनी पर टूट पड़ा था, “आज तू जान से जाएगी…”

             मौत की टोह लगते ही उम्र भर की दबी बुकनी की आह उस के दिल की धमनियां लांघकर बाहर उछल ली थी…

            अपनी सुमित्रा के चित्त का इरादा बनने…

             उस की मेहनत में जोड़ लगाने…

             लड़कियों के ठाठदार डबल बेड की बगल के फ़र्श पर सुमित्रा जो अपने सोने के लिए चटाई बिछाती है तो उस के बदले में मालकिन उस से घर भर के कपड़े धुलाना और प्रैस कराना चाहती है…

 

              यकीन मानिए, नल छोड़ कर कपड़ों के ढेर के पास सुमित्रा बैठती ज़रूर है लेकिन वे कपड़े बुकनी ही धोती है…

              प्रैस का स्विच सुमित्रा औन ज़रूर करती है लेकिन कपड़ों पर लोहा बुकनी ही लगाती हूं…

             बुकनी को पुनर्जन्म नहीं चाहिए…

             न ही किसी तरह का जन्मांतर…

             चेतन में उस के सिर्फ़ सुमित्रा को आगे पढ़ाने की चाह है…