मेरी पहली हवाई यात्रा Vijay Erry द्वारा यात्रा विशेष में हिंदी पीडीएफ

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मेरी पहली हवाई यात्रा

मेरी पहली हवाई यात्रा
मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि आसमान में उड़ने का दिन कभी आएगा। बचपन से ही मैंने हवाई जहाज़ को दूर से देखा था—आकाश में सफ़ेद रेखा छोड़ता हुआ छोटा-सा बिंदु। जब भी कोई जहाज़ गुज़रता, मैं छत पर चढ़कर घंटों देखता रहता। माँ कहा करती थीं, “बेटा, एक दिन तू भी उड़ेगा।” उस समय लगता था कि यह सिर्फ सपना है। लेकिन सपने कभी-कभी सच हो जाते हैं।
वह दिन था 15 अक्टूबर। मेरे चाचा अमेरिका से आए थे। वे मुझसे बहुत स्नेह करते थे। उन्होंने कहा, “इस बार तू मेरे साथ दिल्ली से मुंबई जाएगा। हवाई जहाज़ से।” मैंने पहले तो सुना ही नहीं। फिर जब समझ में आया तो दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। डर और उत्साह दोनों एक साथ।
रात भर नींद नहीं आई। बार-बार सोचा—जहाज़ कैसे उड़ता है? अगर इंजन बंद हो गया तो? अगर तूफान आ गया तो? माँ ने मेरे लिए नई कमीज़-पैंट निकाली, टूथब्रश, साबुन सब पैक कर दिया। सुबह चार बजे उठना था। मैंने तीन बजे ही आँखें खोल लीं।
एयरपोर्ट पहुँचने पर सबसे पहले चौंका। इतना बड़ा, इतना चमकदार। लोग इधर-उधर भाग रहे थे। बड़े-बड़े सूटकेस, ट्रॉली, अफ़सर लोग। चाचा ने मुझे चेक-इन काउंटर पर ले गए। पासपोर्ट और टिकट देखकर लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा, “पहली बार उड़ रहे हो?” मैंने सिर हिलाया। उसने मेरे बैग पर ‘Fragile’ का स्टिकर लगा दिया और कहा, “गुड लक!”
सिक्योरिटी चेक में जूते उतारने पड़े, बेल्ट निकालनी पड़ी। मशीन में से गुज़रते समय दिल धक-धक कर रहा था। अंदर आकर हम गेट के पास बैठ गए। खिड़की से बाहर जहाज़ दिख रहे थे—बड़े-बड़े, सफ़ेद, पंख फैलाए खड़े। एक जहाज़ की तरफ जाते हुए चाचा ने कहा, “यह हमारा है—इंडिगो।”
बोर्डिंग शुरू हुई। मैं लाइन में खड़ा था। जहाज़ के अंदर कदम रखते ही एक अजीब सी खुशबू आई—नया कालीन, साबुन, और ठंडी हवा। सीट नंबर 14A। खिड़की वाली सीट। मैंने खिड़की के पास बैठते ही बाहर देखा। विंग (पंख) लंबा और चमकीला था। पायलट की आवाज़ आई—“क्रू, प्रेपेयर फॉर टेकऑफ़।”
जहाज़ धीरे-धीरे रनवे पर बढ़ा। इंजन की आवाज़ बढ़ने लगी। मेरा दिल भी उसी रफ़्तार से धड़क रहा था। अचानक जहाज़ तेज़ी से दौड़ा। मेरी साँस रुक गई। फिर एक झटका… और हमने ज़मीन छोड़ दी।
मैंने खिड़की से देखा। पेड़, मकान, सड़कें सब छोटी होती जा रही थीं। जैसे कोई खिलौने का शहर हो। दिल में एक अजीब सी खुशी और डर दोनों थे। चाचा ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, “देख, अब तू आसमान में है।”
बादल पास आने लगे। सफ़ेद-सफ़ेद रूई जैसे। जहाज़ उनके बीच से गुज़र रहा था। कभी पूरा सफ़ेद हो जाता, कभी नीला आसमान दिखता। सूरज की किरणें बादलों पर पड़ रही थीं—सुनहरी, नारंगी। मैंने मोबाइल से फोटो खींची, लेकिन फोटो में वह जादू नहीं आया जो आँखों से दिख रहा था।
एयर होस्टेस आईं। उन्होंने पानी और जूस दिया। मैंने पूछा, “दीदी, जहाज़ कितनी ऊँचाई पर है?” उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “लगभग तीस हज़ार फीट।” तीस हज़ार फीट! नीचे धरती थी, ऊपर आसमान। मैं बीच में लटका हुआ था।
कुछ देर बाद जहाज़ हल्का-हल्का हिलने लगा। टर्बुलेंस। मेरा दिल फिर बैठ गया। चाचा ने कहा, “घबरा मत, यह आम बात है।” मैंने आँखें बंद कर लीं और माँ को याद किया। धीरे-धीरे हिलना बंद हो गया।
मैंने खिड़की से नीचे देखा। नदियाँ पतली रेखाओं जैसी लग रही थीं। खेत चौकोर-चौकोर। गाँव छोटे-छोटे धब्बे। मुझे याद आया—जब मैं छोटा था तो कहता था कि भगवान ऊपर बैठे हैं और सब देख रहे हैं। आज मुझे लगा कि मैं थोड़ा ऊपर आ गया हूँ।
दो घंटे बीत गए। अचानक पायलट की आवाज़ आई—“हम मुंबई पहुँचने वाले हैं। कृपया सीट बेल्ट बाँध लें।” जहाज़ धीरे-धीरे नीचे आने लगा। शहर की लाइटें चमकने लगीं। रात हो चुकी थी। मुंबई की लाइटें समुद्र की तरह फैली हुई थीं—सोने के मोतियों जैसी।
लैंडिंग के समय जहाज़ ज़ोर से झटका खाया। टायर ज़मीन से टकराए। मेरी साँस फिर रुक गई। फिर जहाज़ धीरे-धीरे रुक गया। लोग ताली बजाने लगे। मैंने भी ताली बजाई। आँखों में पानी आ गया था—खुशी के आँसू।
बाहर निकलते समय हवा में नमकीनपन था—समुद्र की खुशबू। चाचा ने मेरा कंधा थपथपाया और कहा, “अब तू उड़ चुका है। ज़िंदगी में और भी बहुत कुछ उड़ना है।”
उस रात होटल में लेटे हुए मैं छत की तरफ देखता रहा। सोचा—कितनी बड़ी दुनिया है। हम कितने छोटे हैं। फिर भी इंसान ने आसमान छू लिया। मेरी पहली हवाई यात्रा सिर्फ एक यात्रा नहीं थी। वह मेरे अंदर का डर तोड़ने वाली यात्रा थी। वह सपना सच होने वाली यात्रा थी।
उसके बाद मैंने कई बार उड़ा। लेकिन पहली बार का वह झटका, वह डर, वह खुशी… कभी नहीं भूला। जब भी कोई नया जहाज़ देखता हूँ, दिल में वही पुराना उत्साह जाग जाता है। और मैं मुस्कुरा देता हूँ—क्योंकि मैं जानता हूँ कि आसमान अब दूर नहीं रहा।
(लगभग 2000 शब्द)