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अब आगे!!!
आर्या को पूरी रात नींद नहीं आती। वह करवटें बदलता रहता है। वह इतना बेचैन हो जाता है कि उसे समझ ही नहीं आ रहा था क्या सपना है और क्या हकीकत। उसे पता ही नहीं चलता कब सुबह हो जाती है।
ये सुबह हर दिन की तरह नहीं थी। वह उठता है और सबसे पहले उसकी नज़र शीशे पर जाती है। वो देखता है अब वो लाल निशान वहाँ नहीं था और ना ही वो लिपस्टिक, लेकिन उसके कान के पास वो निशान अभी तक था और उसे छूने पर ऐसा लग रहा था मानो किसी ने उसे गरम चीज़ से जलाया हो।
आर्या को समझ नहीं आ रहा था कल जो उसके साथ हुआ वो हकीकत थी या केवल एक सपना। उसका ऑफिस जाने का भी मन नहीं था। वो बेड पर बैठ जाता है और सोचने लगता है उसे क्या करना चाहिए। तभी उसे ध्यान आता है उसे अपना फोन भी ठीक कराना है। वह उठता है और कपड़े पहनके निकल जाता है फोन ठीक कराने।
वो कई दुकानों पर जाकर अपना फोन दिखाता है लेकिन सब उसको एक ही बात कहते हैं|
“आपके फोन में प्रॉब्लम क्या है? हमें समझ नहीं आ रही। ऐसे तो ये ठीक ही लग रहा है।”
आर्या को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वो लोगों की भीड़ में भी हताश और अकेला महसूस कर रहा था और उसका घर जाने का भी मन नहीं था। उसे पता ही नहीं चलता कि वो चलते-चलते कहाँ आ गया है।
वो एक गाड़ी से टकराने वाला होता है तभी कोई उसे बचा लेता है। तब आर्या को होश आता है और वो अपने आस-पास देखता है। वो अपने घर से बहुत दूर आ गया था, एक अनजान ही जगह पर।
वो देखता है कि पास में ही एक लवर्स पार्क है। वो वहाँ चला जाता है और एक बेंच पर जाकर बैठ जाता है। तभी वहाँ एक औरत आती है और आर्या से कुछ पैसों की मदद माँगने लगती है।
आर्या देखता है कि उसके पर्स में सिर्फ 200 ही हैं। वो कुछ नहीं सोचता और वही पैसे उस औरत को दे देता है। वो औरत आर्या को दुआ देने लगती है।
“बेटा, भगवान तुम्हारी सारी मनोकामना पूरी करे।”
आर्या उसे देखता है और कहता है
“अम्मा, आप भगवान से ये प्रार्थना करो कि मुझे सुकून दे दे। मुझे सुकून नहीं है। मेरा दिल बेचैन है।”
इतना कहते-कहते आर्या रोने लगता है।
वो अम्मा आर्या को बहुत ध्यान से देखती रहती है। फिर कहती है
“अरे आर्या बेटा, तुम आर्या?”
उन्हें देखता है और शॉक हो जाता है कि उन्हें उसका नाम कैसे पता।
आर्या पूछता है
“आपको मेरा नाम कैसे पता?”
वो अम्मा उसे थोड़ा परेशान होकर देखती है।
“बेटा, तुम भूल गए मुझे? और तुम्हारे साथ जो लड़की आती थी वो कहाँ है? काफी दिन से तुम यहाँ आए भी नहीं।”
आर्या को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वो बोलता है
“आप ये क्या कह रही हैं? मैं तो कुछ दिन पहले ही यहाँ आया हूँ। कौन-सी लड़की? आप किसकी बात कर रही हैं?”
तभी वहाँ एक आदमी आ जाता है और उस बुढ़िया को मारने लगता है।
“हे पागल! तो फिर यहाँ आ गई? तुझे कितनी बार मना किया है। यहाँ क्यों आती है? निकल जा यहाँ से!”
आर्या अम्मा को बचाता है।
“अरे, आप क्यों मार रहे हैं इन्हें? छोड़िए इन्हें।”
वो आदमी बोलता है|
तुम नहीं जानते, ये पागल है। यहाँ आकर सबको परेशान करती है। इसका बेटा था आर्या, वो मर गया। यहाँ अपने बेटे को ढूँढती रहती है।
वो बुढ़िया रोने लगती है।
“मुझे मत मारो। मैं पागल नहीं हूँ और मेरा बेटा ज़िंदा है। वो यहीं है। मत मारो मुझे।”
आर्या उस बुढ़िया को आदमी से बचाता है।
वो आदमी आर्या को बड़ी अजीब नज़रों से देखता है और वहाँ से चला जाता है।
आर्या बुढ़िया को देखता है।
“अम्मा, आप ठीक तो हैं? आपको पानी चाहिए?”
“नहीं बेटा, मैं ठीक हूँ। आदत है मुझे इस सबकी। तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद मुझे बचाने के लिए। लेकिन मैं पागल नहीं हूँ...
“हाँ, मैं समझ गया आप पागल नहीं हैं। लेकिन आप कौन-सी लड़की की बात कर रही थीं?
वो अम्मा आर्या को घूरती है और कहती है
“कौन-सी लड़की... क्या मैंने कुछ कहा था?
वो अम्मा अपना सिर दबाने लगती है।
“क्या मैंने कुछ कहा था...?
आर्या समझ जाता है कि वो आदमी सही कह रहा था। अम्मा का दिमाग सच में सही नहीं है।
वो बुढ़िया वहाँ से चली जाती है। आर्या वहीं बेंच पर बैठ जाता है और सोचने लगता है...
कहते हैं ना, समय किसी के लिए नहीं रुकता। आर्या को पार्क में बैठे-बैठे पूरा दिन निकल जाता है लेकिन अभी भी उसका मन घर जाने का नहीं था।
तभी वहाँ गार्ड आकर आर्या को बताता है अब उसे वहाँ से जाना होगा। लेकिन आर्या कैसे कहे कि उसे अपने घर नहीं जाना है। वो चुपचाप बेंच से उठता है और सड़क पर निकल जाता है।
आस-पास गाड़ियाँ, लोगों की भीड़, खाने की खुशबू से सारा माहौल खुशनुमा हो रहा था और आर्या के पेट से आई हुई आवाज़ से ये साफ पता चल रहा था कि उसे कितनी भूख लगी है क्योंकि उसने सुबह से कुछ खाया भी नहीं है।
वो सोचता है कि आज रात वो अपने दोस्त राहुल के घर चला जाए लेकिन उसके पास फोन भी नहीं था जिससे वो अपने दोस्त को बता सके। तो वो सीधा ही अपने दोस्त के घर चला जाता है।
राहुल का घर...
राहुल— “अरे आर्या, तू यहाँ इतनी रात को? सब ठीक तो है ना?”
आर्या— “हाँ, सब ठीक है। बस यार, थोड़ा मन नहीं लग रहा था घर पे तो सोचा तेरे पास आ जाऊँ।
राहुल— “अरे कोई बात नहीं। अच्छा किया तू आ गया। चल, आज दोनों भाई पार्टी करेंगे।
राहुल आर्या को अपने साथ घर के अंदर ले जाता है। वो दोनों खाना खाते हैं, थोड़ा ड्रिंक करते हैं और थकावट से पता ही नहीं चलता आर्या कब गहरी नींद में सो जाता है।
आर्या की गहरी नींद तब टूटती है जब घड़ी में ठीक 12 बजते हैं।
आर्या को फोन की रिंग सुनाई देती है। वो चौंक कर उठ जाता है और अपने आस-पास देखता है तो वो अपने घर में होता है, अपने बेड पर।
आर्या डर के उठ जाता है और दरवाज़े की तरफ भागता है। वो जैसे ही दरवाज़ा खोलता है, सामने उसका ही बेडरूम होता है और टेबल पर एक फोन रखा होता है जो रिंग कर रहा होता है।
ये आर्या का वही टूटा हुआ फोन था।
आर्या डरते हुए उस फोन की तरफ बढ़ता है और देखता है तो फोन से केवल लाल रोशनी ही बाहर आ रही थी।
आर्या इधर-उधर देखता है। ये उसका ही घर था लेकिन बहुत खाली और बंजर।
फोन की रिंग और तेज होती जाती है। आर्या का सिर ऐसा लग रहा था मानो दर्द से फट रहा हो।
आर्या अपना सिर पकड़ता है और अपने कानों को हाथों से ढक लेता है और अपनी आँखें बंद करके ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता है
“नहीं! नहीं! बंद करो इसे! मुझे बात नहीं करनी! नहींऽऽऽ!”
तभी उसे उसकी दोस्त की आवाज़ आती है
“आर्या... आर्या... उठ आर्या! क्या हो गया तुझे? उठ आर्या!”
आँख खोलता है तो देखता है सामने उसका दोस्त राहुल है, जो बेचैन नज़रों से उसे देख रहा है।
“आर्या, क्या हो गया तुझे? तू नींद में चीख क्यों रहा था?
आर्या इधर-उधर देखता है तो वो अपने दोस्त के घर में ही था।
वो उठ जाता है और देखता है वो पसीने से पूरा तर है। उसका सिर दर्द से फटा जा रहा है।
राहुल उसके लिए पानी लेकर आता है।
राहुल— “ले पानी पी।”
आर्या एक साँस में ही पानी पी जाता है फिर भी उसका गला रेगिस्तान की बंजर भूमि समान लग रहा था।
राहुल— “तुझे हो क्या गया था? तू चीख क्यों रहा था?”
“वो मैं...”
आर्या कुछ कह पाता तभी फोन की रिंग बजती है।
आर्या चौंक उठता है।
“ये... ये फोन कहाँ बज रहा है? ये कहाँ से आवाज़ आ रही है?”
राहुल— “अरे, मेरा फोन रिंग कर रहा है। लेकिन तू इतना डर क्यों रहा है? ले, तेरे ही घर से फोन है। बात कर।
आर्या राहुल से फोन लेता है और कान पर लगाता है। उसके हाथ अभी भी डर से काँप रहे थे।
दूसरी तरफ से खुरचने की आवाज़ आ रही थी जैसे कोई कुछ कहना चाह रहा है।
आर्या बोलता है-
आपकी आवाज़ नहीं आ रही है? क्या हो रहा है?
तभी एक धीमी-सी लड़की की आवाज़ आती है
मुझे क्यों मारा?
आर्या फोन को कान से हटा देता है और जैसे ही अपने दोस्त की तरफ देखता है, उसका दोस्त उसे एक स्माइल देता है और कहता है
“तुमने मुझे क्यों मारा? क्यों मारा? क्यों मारा?”
एक ही सवाल दोहराता है। उसके गले से खून बहने लगता है।
आर्या अपनी आँखों को दोनों हाथ से दबाने लगता है। उसकी आँखों में और सिर में बहुत तेज़ दर्द होने लगता है। इतना दर्द मानो आर्या का सिर अभी फट जाएगा।
उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है और वो बेहोश हो जाता है....
आपको क्या लगता है? आर्य के साथ अब क्या होगा? आख़िर क्या है इस कॉल का सच?Kon hai isb ke piche?