कुत्रिम बुद्धिमता - 3 Ramesh Desai द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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कुत्रिम बुद्धिमता - 3

          

                    :  प्रकरण - 3  :

       तैयार होकर हम लोग पहले होटल में खाना खाने गये थे.

       पिताजी ने फुल थाली का ऑर्डर दिया था.

       आम का मौसम था तो आमरस देखकर मैं खुश हो गया था. मुझे वह बहुत पसंद था. पिताजी मेरी पसंद जानते थे. रात का समय था. ज्यादा खाने से हजम नहीं होगा. इस बात को दयान में रखकर पिताजी ने मुझे सलाह दी थी.

       " आमरस अच्छा हैं लेकिन ज्यादा खाना मत खाना.

        ऊन को एसिडिटी की समस्या थी. इस लिये उन्हो ने ने मुझे भी आमरस से दूर रहने की कोशिश की थी.

        थाली में हमारी पसंदीदा कई चीजे मौजुद थी.. लेकिन मैं कुछ ज्यादा खा नहीं पाया था.

        खाना खाने के बाद पिताजी हमे फिल्म देखने ले गये थे.

        फिल्म का नाम था : " झनक झनक पायल बाजे "

        यह एक क्लासिकल फिल्म थी. ऊस वक़्त वह बला क्या चीज थी? वह मुझे मालूम नहीं था. मैं उसे स्टेज ड्रामा का एक प्रकार मानता था, जो कलाकार लाईव पेश करते हैं.

       यह फिल्म नामी निर्माता निर्देशक वी शांताराम जी ने बनाई थी. यह ऊस वक़्त की सुपर डुपर फिल्म थी. जो एक ही थियेटर में दो साल से भी ज्यादा चली थी.

       इस फिल्म में तारिका संध्या ने काम किया था, जिस के साथ बाद में दोनों की शादी  हो गई थी.

      उन्हो ने एक ओर फिल्म बनाई थी : ' दो आँखे बारह हाथ.'

       यह छह कैदी की कहानी थी. ऊन की दो आंखो की शर्म से बारह हाथ सही लाईन पर आ जाते हैं.

       कैदी सुधर गये थे. उस से कुछ लोगो को समस्या हुई थी. उन्हें मारने के लिये कुछ गुंडे को तैयार किया था. उन्हें बचाने के लिये जैलर उन के साथ भीड़ जाता हैं औऱ अपनी जान से हाथ धो बैठता हैं. जैलर की यह भूमिका खुद शांताराम जी ने निभाई थी.

       फिल्म के एक गीत की कडी बडा संदेश बन गई थी.

      ' जब जुर्मो का हो सामना         तब तू हीं हमे थामना,        वह बुराई करे         हम भला हीं भरे        नहीं बदले की हो कामना

       एक फिल्म देखने के बाद मुझे फिल्मे देखने का चसका सा लग गया था.

       दुसरी फिल्म मैने ' इन्सानियत ' देखी थी. जिस में दो धुरंधर अभिनेता दिलीप कुमार और देव आनंद ने एक साथ काम किया था. उस के साथ चरित्र अभिनेता प्रेमनाथ की बीवी बिना रोय ने भी देव आनंद की बीवी भूमिका निभाई थी. फिल्म में दिलीप कुमार का एक बंदर था, जिस की मदद लेकर वह बच्चे की जान बचाते हैं, बदले में खलनायक के हाथों उन की मौत हो जाती हैं.

        ऊस की कुर्बानी देखकर मेरी आँखे गीली हो गईं थी.

        ऊस के बाद एक ओर दिग्गज निर्माता बी आर चोपडा की फिल्म ' एक हीं रास्ता 'मैने देखी थी जिस में विधवा विवाह का मुद्दा उठाया गया था.

        फिल्म का एक संवाद यादगार बन गया था.

        ' बरबादी के पहाड़ो को आंसू के दरिये में दुबोया नहीं जा सकता हैं उसे तोडना या काटना पडता हैं.'

        फिल्में देखने के अलावा मुझ में गीत गुनगुनाने का भी बड़ा शोख पैदा हुआ था. गीत के सही बोल क्या हैं, उस की परवाह ना करते हुए जो शब्द मुंह में आता था उसे जोड़कर गीत बना लेता था, जिस से खासा रमुज पैदा होता था. बिल्डिंग के सभी लडके यह बात जानते थे.. उन्हें यह अच्छा लगता था. वह लोग मुझे गीत गाने की फरमाईश करते थे.

       एक फ़िल्म आई थी. ' नाटक'. उस का टाइटल सोंग था.

       'जिंदगी एक नाटक हैं हम नाटक मे काम करते हैं       परदा उठते ही सब को मिलते ही सलाम करते हैं'

       इस गीत का मैंने गुजराती में अलग वर्शन तैयार किया था.

       जिंदगी एक पापड़ छे, जेमा कोई मसालो नथी       लोको मळे छे वातो करें छे जेमा कोई दम नथी

       यह सुनकर लोगो को अच्छा मनोरंजन मिला था.

        उस के बाद मेरा  अनन्या से बार बार मिलना हुआ था. हम लोग एक दूसरे से बाते करते थे, घर मे भी आते जाते थे. साथ मे पढ़ाई करते थे. साथ में ही स्कुल जाने के लिये घर से निकलते थे. हम दोनों के स्कुल के समय बीच  आधा घंटे का फर्क था. फिर भी अनन्या की फरमाईश पर मैं उस के साथ जल्दी घर से निकल जाता था.

        गीता बहन  यह बात जानते थे. उन्हों ने उस के बारे में कोई एतराज नहीं दर्शाया था.

        अनन्या ने तो कभी बताया नहीं था. लेकिन मुझे सच्चाई का पत्ता लग गया था. एक लड़का था, जो उस की बिरादरी का था. वह उस के पीछे पड़ गया था. उस के डर की वजह से उस ने मुझे अपना एस्कॉर्ट बनाया था.

         उसे मेरी ताकत का परचा मिल गया था.

         मैंने उसी के सामने एक लडके की धुलाई की थी, जों बिल्डिंग के लड़को ने मेरे लिये तैयार किया था.

        उस के अलावा इम्तिहान के दिन हम एक दुसरो को जल्दी उठाने मदद करते थे.. उस के घर में मा थी. एक पैइंग गेस्ट बाई भी रहती थी. फिर भी वह मुझे ही जगाने के लिये आग्रह करती थी.

         उस के घर में एक लड़का अक्सर आता जाता रहता था. उस का नाम अपूर्व था. वह बाजू के बिल्डिंग में रहता था. उस की भी मा गुजर गईं थी.

        बिल्डिंग में एक मंडल की स्थापना हुई थी. और बिल्डिंग के सभी लडके लड़कियां उस के सदस्य थे.. उसे एक तलाक सुदा चालीस वर्षीय व्यक्तिने शुरू किया था.

        मैं, अनन्या और अपूर्व भी इस मंडल के सदस्य थे.

         हप्ते में एकाद मीटिंग होती थी. सब लोग जमा होते थे.. अपूर्व बाहर का था लेकिन अध्यक्ष श्रीधर का खास दोस्त होने के नाते उसे भी मंडल में शामिल किया गया था.

        अनन्या अपूर्व को अपना भाई मानती थी. इस बात को समर्थन देते हुए उस की मा ने  मेरे सामने अपूर्व को कहां था.

        " तुम्हारी कोई बहन नहीं और अनन्या को कोई भाई.. तुम आज के रक्षा बंधन के त्यौहार पर अपनी कलाई पर राखी बंधवाकर उस का बहन के रूप में स्वीकार कर लो. "

         रक्षा बंधन की रस्म निभाते हुए अपूर्व को टिका लगाया था. और उस की कलाई पर अनन्या ने राखी बांधी थी बदले में अपूर्व ने विरपसली की रस्म निभाते हुए नगद  राशि अनन्या के हाथो में थमा दी थी.

         यह देखकर मुझे भी राखी बंधवाने का मन हुआ था. लेकिन मैं अनन्या के सामने अपनी जुबान खोल नहीं पाया  था.

         उस वक़्त भाविका मुझ से कोसो दूर रहती थी.

         मैं एक ही रिश्ते को  जानता था..

         वह था.. भाई बहन का..!!

         मैं उसे बहन मानता था. मेरे कांडे पर राखी बंधवाना चाहता था, लेकिन कुछ बोल नहीं पाया था.

         वह दोनों रोजाना अनन्या के घर में मिलते थे.

         लेकिन दोनों अजब सी हरकते  करते थे.

         मेरे लिये वह भाई बहन ही थे. लेकिन उन का व्यवहार संदेह जगाता था. उन्हें देखकर मुझे फिल्मो में हिरो हिरोइन की हरकतों की याद आती थी. जिस ने मुझे दाल में काला होने का  संकेत दिया था. साथ में मुझे गलत सोचने पर विवश किया था.

         भाई बहन भी वैसा कर सकते हैं.

          लेकिन यह गलत था. दोनों ने मुझे गलत सबक सिखाया था.

           मेरे सुप्त मानस में इस वजह से खलबली  मची रहती थी. अपूर्व का व्यवहार मुझे अनन्या को स्पर्श करने के लिये उकसाता था. मैं उसे छूता भी था, उस ने कभी नाराजगी व्यक्त नहीं की थी.

          जिस ने मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी थी.

          एक बार मैं उस की उंगली पकडकर 20-25 मिनिट साथ चलकर घर आया था. उस के बारे में भी उस ने मुझे एक शब्द भी नहीं कहां  था.

         वह फिल्मो में दो प्रेमी जैसा व्यवहार करते थे, वैसा ही व्यवहार करते थे. इस वजह से बिल्डिंग में तरह तरह की बाते होती रहती थी.

         उस वक़्त पड़ोस में रहने वाली एक बाई ने अनन्या की मा की प्रशंसा करते हुए कहां था.

        " आप तो बड़े नसीब वाले हैं. आप को अच्छा दामाद मिल गया. "

         अब वह कौन था? मुझे पता नहीं था. अपूर्व रोजाना उस के घर आता था. ऐसा ख्याल भी किस तरह आ सकता था? वही उन का दामाद था!!

                   000000000000 ( क्रमशः )