पता बताते दिन:
नैनीताल को देखकर एक अद्भुत अनुभूति मन में उत्पन होती है।एक विदेशी ने हाल में ही कहा है," मैंने इतनी सुन्दर जगह और नहीं देखी है यदि यहाँ की कचरे पर ध्यान न दिया जाय।" वैसे भी हम भारतीय गन्दगी फैलाने में कम नहीं। जहाँ-तहाँ थूक देंगे या कूड़ा फेंक देंगे।नैनीताल को जैसे ही छूता हूँ, एक सिहरन सी दौड़ने लगती है, शरीर में।आँखों में चमक।वाल्मीकि रामायण में वाल्मीकि ने रामचन्द्र जी से युद्व कांड में कहलाया है," जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।" युद्ध के बाद लक्ष्मण जब राम जी से कहते हैं ," लंका अति सौन्दर्यमय और रमणीय स्थान है कुछ दिन और रुक जाते हैं यहाँ।" तो रामचन्द्र जी कहते हैं," जननी और जन्म भूमि स्वर्ग से भी अधिक महान हैं।" वह आन्दोलनों का दौर।गति देता अतीत।अक्टूबर-नवंबर 1977 में वनों की नीलामी रोकने वाला आन्दोलन।उत्तराखंड के "चिपको" आन्दोलन की एक कड़ी का एक रूप।पर्यावरण को बचाने का प्रयास। मल्लीताल की सड़कों को लकड़ी की वल्लियों से अवरुद्ध कर दिया था।तब बेरोजगार था, एम.एसी. करने के बाद।कोई राह सूझती नहीं थी। घूमते रहते थे और कैफे में चाय पीने में सुकून मिलता था। वनों की नीलामी के दिन अपने साथी के यहाँ गया था।उसने भौतिक विज्ञान से एम. एसी. किया था।तब वह भी बेरोजगार था। बाद में हमने साथ ही ओ.एन.जी.सी. ज्याइन की थी।नीलामी के दिन, जब नैनीताल क्लब के ऐतिहासिक भवन में आग लगी थी तब उसी के यहाँ बैठा था।अच्छा नहीं लगा था राजकीय सम्पत्ति के नुकसान को देखकर।मल्लीताल का बुक डिपो और उसके नजदीक दोमजले में जहाँ हमने एम.एसी. का परिचय फंक्शन किया था, मन को खींचते हैं।मल्लीताल के बुक डिपो ने सरला बहिन(सरला देवी, बिट्रिश महिला जो भारतीय हो गयी थी, गाँधी जी के सम्पर्क में आने पर) की पर्यावरण सम्बन्धी एक किताब का प्रकाशन भी किया था।हर बात को छू नहीं पाता पर जितना छूता हूँ, वह भी कम नहीं है।अनजाने में की गयी बातें भी अन्दर तक कुरेद जाती हैं और उष्णता देती हैं। पढ़ा,प्यार किया,पगडण्डियां नापी। चिट्टियां जो लिखीं, वे कोट की जेब में पड़ी-पड़ी मुरझा गयीं।कहीं अनायास पहुँच जाते हैं। मनुष्य संघर्षों से बनता है और वैसे ही चुक भी जाता है।बहुत सी घटनाएं होती हैं इसलिये कि हम हैं और बहुत सी प्रायोजित होती हैं।कभी जब हम किसी का हित करते हैं तो उसमें किसी का अहित जुड़ जाता है। एक दिन मैं अपने रसायन विभाग में आता हूँ। मुझे पता चलता है फिजिकल कैमिस्ट्री का प्रवक्ता पद आर्गेनिक कैमिस्ट्री को दे दिया है। मैं क्योंकि कोई काम नहीं कर रहा था,काम की खोज में था। और फिजिकल कैमिस्ट्री की पोस्ट होने पर एक उम्मीदवार मैं भी हो सकता था, शायद तब सशक्त। तब उर्जा संघर्ष की होती है ,अन्दर। मैं कुलपति खन्ना जी से मिला। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे इस संबंध में रसायन विज्ञान के विभागाध्यक्ष से बात करेंगे। विभागाध्यक्ष से एक दिन बात हुई तो वे बहुत नाराज लग रहे थे मुझसे। बोले ," तुमने कुलपति से मेरी शिकायत की है। मेरे किसी विद्यार्थी ने ऐसा नहीं किया।" मैंने कहा," सर जिसको आपने यह पद दिया है वह और मैं दोनों आपके विद्यार्थी रहे हैं। आपको निष्पक्ष रहना चाहिए था। पद फिजिकल कैमिस्ट्री का है, उसका आर्गेनिक कैमिस्ट्री में जाने से, फिजिकल कैमिस्ट्री के उम्मीदवारों को नुकसान है।" वे अपनी गलती मानने को तैयार नहीं थे। "समरथ को नहिं दोष गोसाईं, रबि पावक सुरसरि की नाईं- गोस्वामी तुलसीदास।"हम जितने सत्य हैँ उतने ही सत्य हमारे शब्द भी होते हैं।"शब्द" पर लिखी रचना पढ़ता हूँ-शब्द:"शब्दों के भीतर मैं भी हूँशब्दों के भीतर तुम भी हो,कह के देखो,संगीत बनेगासुन कर देखो, गीत लगेगा।होठों तक उनको आने दोस्नेह-प्यार का हो जाने दो।चिट्ठी में बंद, वे रहते हैं दूर देश तक हो आते हैंहमें ढूंढते, जब-तब आते ह्रदय खगालने रुक जाते हैं।हिमगिरि से ऊँचे कभी लगेंगेगंगा से शीतल हो जायेंगेभारत की अस्मिता खोजेंगेदुनिया को परिवार कह देंगे।कहीं गुरु हो जायेंगेकभी शिष्य में ढल जायेंगे,कहीं विद्यालय की शिक्षा मेंकभी जिजीविषा में उग आयेंगे।कभी प्रकृति में मंडरायेंगेकहीं थिरकन में समा जायेंगे,जब भी अपने पास दिखेंगेकुछ कहते-सुनते नमन करेंगे।शब्दों के भीतर ईश्वर हैशब्दों के भीतर प्रलय हैशब्दों के भीतर हम-तुम हैं,शब्दों के भीतर अनन्त छुपा है।" इतना लिखने-पढ़ने के बाद अचानक एक गिलहरी मेरे पैर को खरोंचती है।मैं घबरा कर दूसरे पैर से उसे भगाता हूँ। क्षणभर में यह सब कुछ हो जाता है।पैर को देखता हूँ तीन हल्की खरोंचें दिखती हैं। शायद गिलहरी कह रही हो इतना ही लिखो-पढ़ो। बचपन में पढ़ी गिलहरी की कहानी एकाएक याद आने लगी। कहानी शुरु होती थी ," एक थी गिलहरी....।
**महेश रौतेला