“मलकिन आप को उधर बुला रही हैं,” किशोरीलाल मेरे कमरे में आन खड़ा हुआ।
“रुक जाओ,” मैं खीझा। अपने नए सहपाठी,कुणाल,के साथ उस समय मैं स्क्रैबल खेल रहा था।
“रुक कैसे जांए?” किशोरीलाल को मेरे पिता ने सिर पर चढ़ा रखा था और वह जब- तब मां और मुझ से बदतमीज़ी पर उतर आया करता, “उधर रसोई में हमें सैंकड़ों काम नहीं हैं क्या?”
“इधर आओ,” मुझे देखते ही मां रोने लगीं, “अगर मैं कहूं मैं घर छोड़ कर जा रही हूं तो तुम क्या करोगे?”
मेरे पिता लगभग रोज़ ही मां को घर छोड़ने की ताकीद किया करते थे और मां अपनी भरी आंखों से जब उन्हें पूछती, ‘मैं कहां जाऊंगी?’ तो उन्हें मेरे पिता से एक ही उत्तर मिला करता, ‘नहीं कहीं जाने का, तो मर जा।’
जाने के लिए मां के पास दूसरी जगह थी भी नहीं।
दो साल पहले हुई एक रेल-दुर्घटना में मेरे नाना और नानी एक साथ विदा हो लिए थे और उसी दुर्घटना की एवज़ में मिली रकम से मेरे छोटे मामा उस अमरीकन यूनिवर्सिटी में दाखिला पा गए थे जहां उन का मनपसंद कोर्स पढ़ाया जाता था। बड़े मामा पहले ही से आस्ट्रेलिया में छात्रवृति पर पढ़ रहे थे और साझे किराए पर लिए गए एक ही कमरे में अपने मित्र के साथ रहते थे।
‘हां,’ अपनी हिचकियों- सिसकियों के बीच मां उत्तर देतीं, ‘अब मर ही जाऊंगी। सोचती हूं बहुत जी लिया। बेइज्ज़ती के साथ। बेलिहाज़ी के साथ। अब नहीं जिया जा रहा।’
“मालूम है,मां? मैं अभी- अभी अपने इस नए सहपाठी को स्क्रैबल में हरा कर आ रहा हूं,” मां का हाथ मैं ने अपने हाथ में ले लिया। मां का ध्यान बंटाने की खातिर।
मां और मैं एक- दूसरे के साथ अक्सर ऐसा किया करते। उलझन के समय दूसरे को नितांत अजनबी डगर पर बहका ले जाते।
“मूर्ख एकदम जड़मति है। शब्दों में ‘कैट’ और ‘पैट’ के आगे कुछ नहीं बना पाता।जब मैं ने आप वाला ‘रनअबाउट’ बना डाला तो बोला, और नहीं खेलेंगे….”
“उसे यहां ले कर आओ,” मां बहक लीं। अजनबियों से मिलने का मां बहुत चाव था, “मैं उसे मिलूंगी….”
“तुम कांप क्यों रहे हो?” कुणाल के सामने पड़ते ही मां ने उस से पूछा।
“मेरे मोज़े गीले हैं,” कुणाल ने कहा, “ममा ने देर रात में धोए। वह चीज़ों का ध्यान नहीं रखतीं। बहुत लापरवाह है….”
“ये मोज़े तुम उतार दो। तुम्हें दूसरे सूखे मोज़े दे रही हूं….”
मां मेरी आलमारी से मेरे सूखे मोज़े निकाल लायी।
“लो,” मां कुणाल के जूतों पर झुकीं, “तुम्हारे मोज़े मैं तुम्हें बदल देती हूं….”
सात साल की मेरी उस उम्र में स्कूल के लिए मां ही मुझे तैयार करती थीं। टाई से ले कर जूतों तक।
“मेरी ममा मुझे कभी मोज़े नहीं पहनाती।”
“तुम्हें अपनी ममा अच्छी नहीं लगतीं?”
“न,” कुणाल ने सिर हिलाया, “मुझे पीटती हैं….”
“कैसे?” मां उत्सुक हो लीं।
“कभी चिकोटी से तो कभी हथेली की उल्टी तरफ़ से। कभी फ़ुट रूल से तो कभी अपनी ऊंची ऐड़ी की सैंडल से….”
“आज चिकोटी काटी क्या?” कुणाल की एक गाल बहुत लाल थी।
“हां।”
“और तुम्हारे पापा ? वह भी तुम्हें पीटते हैं?”
“वह ममा को पीटते हैं। मुझे नहीं।”
“किस बात पर?” कुणाल को सूखे मोज़े पहना रहे मां के हाथ रुक लिए।
“हर बात पर….”
“वह खुद क्या करते हैं?”
“कुछ भी नहीं….”
“मतलब वह काम पर कहीं नहीं जाते?”
“नहीं जाते। कहते हैं,उन्हें काम करने की कोई ज़रूरत नहीं। बैंक में उन के नाम हर महीने उन की बिल्डिंग का किराया जो जमा होता है….”
“और घर के दूसरे लोग? वह क्या करते हैं?”
“घर में और कोई नहीं है….”
“नौकर लोग भी नहीं?”
“नहीं। घर का सारा काम ममा ही करती हैं।”
“तुम हाथ नहीं बंटाते?”
“ममा को मेरा काम पसंद नहीं आता और वह बिगड़ जाती हैं….”
“वह खुद कैसा काम करती हैं?”
“खराब। बहुत खराब। पापा कहते हैं ममा को झगड़ने के इलावा कुछ नहीं आता….”
मैं हंस पड़ा, “मेरे पापा भी मेरी मां के बारे में ऐसा ही बोला करते हैं….”
“चलो,चुप करो,” मां ने तुरंत मुझ पर लगाम लगा दी, “अपने माता- पिता के बारे में ऐसा नहीं बोलना चाहिए। ऐसा नहीं सोचना चाहिए। अभी तुम बहुत छोटे हो। सात साल की अपनी इस उम्र में तुम अभी जानते ही क्या हो?”
मां की आत्महत्या इस बार फिर टल गई।