सबसे मिलिए धाय... Neetu Singh Renuka द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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सबसे मिलिए धाय...

सबसे मिलिए धाय

Neetu Singh Renuka



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सबसे मिलिये धाय

पन्नियों में पलटते दूध पर उसकी बराबर नजर थीए जो बिना एक बूँद गिराए पलटा जा रहा था। कहीं मिट्ठू चूके तो उसे अच्छे से गरिया दें। मगर मिट्ठू मियां के सधे हाथए एक लीटर दूध बराबर एक लीटर की पन्नी में और आधा लीटर दूध बराबर आधे लीटर की पन्नी में डालए फट से गठियाकरए ग्राहक को धराते जा रहे थे।

जल्द ही क्रिश यादव भी आश्वस्त हो गए। नजरें मिट्ठू से हटाकर ग्राहकों की लम्बी लाइन पर टीकाई। कमाई का यही समय था। दफ्तर से घर लौटते लोगबागए आधा.एक लीटर दूध लेए अपने घरों को लौट रहे थे। और करें भी क्याघ् पंछी की चहचहाहट के साथ ही लोकल पकड़ लेने वालों कोए और फुरसत भी कब होती हैए सब्जी.भाजीए दूध.फल खरीदने की।

अभी दो.तीन ही ग्राहक बचे थे कि उसका फोन घनघना उठा। फोन तो गुस्से में उठाए थे कि काट देंगे कि पता नहीं कौन धंधे के समय टाइम खोटा करने के लिए फोन लगा दिया है कमबख्‌त। मगर मोबाइल स्क्रीन पर नई नवेली दुल्हन का फोटो देखए छह फीट के क्रिश यादव के चेहरे पर चार फीट लम्बी मुस्कान फैल गईए सो चट से फोन उठा लिए।

ये क्रिश यादव की दूध की दुकान हैए नाम है कृष्णा दुग्धालय। कृष्णा दुग्धालय क्रिश यादव के दादा जी ने खोली थी। ढ़ाई.तीन दशक पहले जब दादाजी पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसी इलाके से बम्बई आए थेए तो केवल गाय पालना और दूध बेचना ही जानते थे। सोए जो जानते थे वही उन्होंने कियाए और क्या खूब किया। बाद में कृष्णा दुग्धालय भी खोला।

अब यह दूध की दुकान पोते के नाम पर रखी गई या पोता दुकान के नाम पर रखा गयाए कोई नहीं जानता। मगर यह तो तय रहा कि बम्बई बदलकर मुम्बई हो गईए किन्तु दूध का इनका व्यापार दो पीढ़़ी बाद भी नहीं बदलाए उल्टा और चल निकला।

इसी दुग्धालय के कैश काउंटर पर बैठेए क्रिश यादव ग्राहकों से पैसे ले.दे रहे हैं और मिट्ठूराम बगल में ही रखे बड़े.बड़े ड्रमों से दूध निकाल.निकाल कर ग्राहकों को पकड़ाते जा रहे हैं। लेकिन इसी बीच उनकी नव ब्याहता का फोन आ गया। अब तक खुद ही सोच रहे थे कि ग्राहक निपटे तो वह फोन लगाए। मगर लो जनाब उसी का फोन आ गया। लाइन में बचे दो चार ग्राहकों को नजरअंदाज करते हुए क्रिश भाई फोन में घुस से गए। बड़ी सी मुस्कान के साथ बोले.

का हो रहा है२ अच्छाण्२ बना का रही होण्ण्ण्ण्ओहोण्ण्तुम्हें कौन बताया कि हमें कढ़़ी पसंद हैण्ण्ण् हां.हांए वो ही बताई होंगी। माताजी तो अक्सर हमारे लिए कढ़़ी बनाती हीं हैं। तुमको भी सिखा दीं। होण्ण्ण्होण्ण्ण्हो। तुम को पता हैए जब हम छोटे थे तो हमें कढ़़ी बिल्कुल पसंद ही नहीं थी। मगर एक बार का हुआ कि हम भांडुप वाली अपनी मामी हैं न।ण्ण्ण् अरे ना ना। वो वाली जो तुम को जबरदस्ती ठड़ाकर केए अपनी हाइट तुमसे नाप रही थींण्ण्ण्ण्श्

लाइन में सबसे आगे खड़ेए सफारी सूट वाले जनाब का मुंहए यह सब सुनकर उतना ही लाल हो रहा था जितना उनके पान खाए हुए होंठ। थोड़ी देर तो सब्र किया फिर अपने लाल होंठ चबाते हुए बोल ही पड़े।

भाई साहब जरा जल्दी करेंगे।श्

क्रिश को इ व्यवधान अच्छा नहीं लगा। फिर भी नजरअंदाज करते हुए अपना लगे रहे।

ण्ण्ण्हाँ हाँ बस उहे वाली मामी। तो हम छोटे थेए तो एक बार उनके यहां रहने गए थे। अब उनके घर जाकर तो हम हकबका गए। मामी के यहां तो जब देखो तब कढ़़ीए बन रहा हैण्ण्ण्ण्श्

सफारी सूट वाले भाई साहब को ये यादों का सफर बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि एक तो वे काफी थके हुए थे और दूसरा कि घर पर उनका इंतजार हो रहा था या हो सकता है कि दूध का इंतजार हो रहा था ताकि घर के बच्चे और बुजुर्ग दूध पीकर सो सकें। दूध की महत्ता को वो अच्छी तरह पहचानते थे। साथ ही संयम की भी। मगर बढ़़ते समय को देखते हुए उनका संयम भी टाइम.टाइम पर छूटने वाली फास्ट लोकल की तरह छूट रहा था। सो वो फिर बोले.

भाई साहब! देर हो रही है। जरा जल्दी चार लीटर दूध बंधवा देंगे।श्

ए बारी तो क्रिश महाराज झनझनाई गए। उधरे मिट्ठूए जो अब तक रस ले लेके मियाँ.बीबी को सुन रहे थेए उहो चेत गए। बोले.भैय्या जी। उ गाहक ठाड़ा हैं कब सेए दूध खातिर।श्

ग्राहक तो ग्राहक अब जिसे कुछ नहीं समझतेए वो मिट्ठू तोता भी ठोर मारने लगा। तमतमाकर भोजपुरी में चीखे अब्बे पटक के मारब तोहके। ढ़ेर भईल बाड़। लउकत नईखे। फोन पर बतियावत हईं।श्

फिर अचानके ध्यान आया कि फोन पर रुनझुन सब सुन ली होगी।

रुनझुन। हम तुमको बाद में फोन करते हैं।ण्ण्ण्ण्ण्अरे कुछ नहीं हुआ। हम करते हैं न तुमको फोन।श्

इ मिट्ठू का बिआह नहीं हुआ है इसलिए सरऊ जरता ;जलताद्ध है। और ई लाइन में ठड़ा आदमी भी जरता है। इसको इसकी मेहरारू प्यार नहीं न करती होगी इसलिए। इनके त सबक सिखाए के पड़ी।

जनाब। दूध खतम हो गया है। नहीं है। आपको जहाँ के लिए जाना था आप जा सकते हैं।श्

अरे अभी तो पूरा ड्रम भर के है आपके पास और आप कह रहे हैं कि खतम हो गया।श्

क्रिश ने कुर्सी पर अपनी पीठ को टीकाते हुए आराम से पीछे टेककर और सर खुजाते हुए कहा.वो क्या है न अंकल जी कि एक रेस्टोरेंट वाले ने बुक कर लिया।श्

अंकल जी समझ गए कि उनकी बेइज्जती की जा रही है इसलिए उन्होंने आगे यह नहीं पूछा कि अभी तो लाइन में खड़े ही हैं तब तक किसी रेस्टोरेंट वाले ने कैसे बुक कर लियाघ् बस झल्लाहट में पाँव पटकते हुए वहाँ से चले आए।

अब तो यह सिलसिला चल पड़ा। क्रिश ने जब भी लाइन में उन पान खाए सफारी सूट वाले अंकल को देखा तो हाथ खड़े कर दिए। कुछ दिन तक तो वो नजर आएए मगर फिर लुप्त हो गए। बार.बार बेइज्जत होने के बाद वो फिर नहीं आए।

'''

कुछ हफ्तों बाद क्रिश यादव पासपोर्ट अहृफिस के बाहर लाइन में खड़े थे और अपने आगे.पीछे वालों से जानकारी भी इकठ्‌ठी कर रहे थे। मसलनअहृफिस कितने बजे खुलता हैघ् किसका नंबर कितनी देर में लगता हैघ् क्या.क्या डहृक्यूमेंट्‌स लगाने होते हैंघ् कितने दिन में तैयार हो जाता हैघ्

दरअसल क्रिश यादव शादी के बाद घूमने के लिए महृरीशस जाना चाहते हैंए जैसा कि उनकी पत्नी जी डिमांड की हैं। बड़ी मेहनत से वे सब चीजों का पता लगाकर यहाँ तक आए हैं। कागज.पत्तर के काम में उन्हें बड़ी ऊब बरती है और उलझन होती है। मगर बीवी का कहा टाल भी नहीं सकते। क्या करेंए बीवी की ख्‌वाहिश है महृरीशस घूमने की।

का करेंए सूरज भगवान जी कपारे चढ़़ गए हैं लेकिन नंबरवे नहीं आया। कभी लाइन में ठाड़ा नहीं न हुए। खाली दूसरों को किए हैं। एक.एक आदमी को दुई.दुई घंटा बिठा केए जाने का गड़हा खोन रहे हैं। इ लो भगवान जी की किरिपा से नम्बरवा आ ही गया।

क्रिश ने पासपोर्टअहृफिसर के यहाँ हाजिरी लगाई। क्रिश ने सोचा कि इ आदमी को हम कहीं देखा हूँ। कहाँ देखा हूँए हमको खयाले नहीं पड़ रहा है और इ सफारी सूट वाले अदमी हैं कि लाल होंठ किए मुस्कुराए जा रहे हैं जैसे इ हमको अच्छे से पहचानते हों। नाम के बोर्ड पर तो नारायण श्रीवास्तव लिखा है। नामों नहीं सुने हैं कभी।

किसके नाम पर पासपोर्ट बनवाना हैघ्श्

जी! हमारे और हमारी पत्नी के नाम सेघ्श्

आपका नामश्

कृष्ण प्रसाद यादवश्

हम्मण्ण्ण्ण्पत्नी का नामश्

रंजना यादवश्

महृरीशस जाना चाहते हैंघ्श्

जीश्

क्यों जाना चाहते हैंघ्श्

जीघ्श्

माने उद्देश्य क्या हैघ् पर्पस ण्ण्ण्पर्पसण्ण्श्

घूमने के लिएण्ण्ण्ण्ण् अभी शादी हुई है तोण्ण्ण्ण्ण्श्

अच्छाण्ण्ण्ण् हनीमून।ण्ण्ण्ण् सारे डहृक्यूमेंट्‌स लाए हो। टेंथ का मार्कशीटए घर का एड्रेस प्रूफए आईडी।श्

जीण्ण्ण् देख लीजिए सब है।श्

ये अड्रेस प्रूफ और आई डी नहीं चलेगी।श्

नहीं चलेगीण्ण्ण्मतलबण्ण्ण्ण् यही तो लगता है।श्

कौन बोलाघ्श्

सब कहते हैंण्ण्ण्ण् अभी लाइन में जो लोग खड़े थे वो ही कह रहे थे।श्

नारायण श्रीवास्तव मेज पर दोनों कुहनियाँ आराम से टीकाते हुए आगे झुके और क्रिश के एकदम करीब आए और आँखों में आँखें डाली। नजरें मिलते ही क्रिश को पिछले दिनों घटा सारा वाकया याद आ गया। मगर याद आना काफी नहीं था। अब तो नारायण श्रीवास्तव की पारी थी। सो वो अपनी पारी की समाप्ति शानदार छक्के से करते हुए बोले.

तो जाओण्ण्ण् लाइन में खड़े उन्हीं लोगों से अपना पासपोर्ट बनवा लो।श्

अपने आसन पर यथास्थिति लौटते हुए नारायण श्रीवास्तव चिल्लाए नेक्स्टश्।

'''

पासपोर्ट अहृफिस के अहाते में ठाड़ा होकर क्रिश अफिसिया को टुकुर.टुकुर ताक रहे थे कि एक ठो दरबान नजर आए। पास जाकर फुसफुसाए.

ये लाला साहेब इस आफिस में कब से काम कर रहे हैंघ्श्

हाल ही में आए हैं।श्

मतलब जल्दी जानेवाले नहीं हैंण्ण्ण् अच्छाण्ण्ण् ये रहते कहाँ हैंघ्श्

स्टेशन के पास कृष्णा दुग्धालय देखा है आपनेघ्श्

क्रिश मन ही मन मुस्कुराए और सोचा श्सरऊ हमको पूछ रहे हैं कि सीसा देखें हैंश्। मगर दूध का जला छाछ भी फूंकता है।

हां देखा हैण्ण्ण्आगे बताइए।श्

उसी के पीछे एक गली है। उसी गली में सुगंधा अपार्टमेंट्‌स है। वहीं रहते हैं।श्

बढ़़िया। धन्यवाद भाई साहब।श्

सेकेंडों में क्रिश घर के रास्ते पर था। यही सोच रहा था कि रुनझुन को क्या कहेगाघ् सोच भी लियाए कह देगा कि कोर्ट.कचहरी का काम और पासपोर्ट का काम इतना आसान है क्याघ् टाइम लगता है। बनते.बनते बनेगा पासपोर्ट। मगर बन जाएगा। तब तक कपड़े.गहने तैयार करे। क्या ले जाना है क्या नहींघ् उसकी जौनपुर वाली मौसी भी तो वहीं रहती है। उनके लिए भी तो कुछ ले जाना होगा। सब शहृपिंग.वोपिंग कर के रखे तब तक।

'''

बेचारे क्रिश का चेहरा ही उतर गया था। काम में मन नहीं लगता था। सोचते रहते थे महृरीशस कैसे जाया जाएघ् नकली पासपोर्टघ् नहीं इतना दुस्साहस नहीं कर सकते थे। यही सब सोचते हुए झल्लाहट में रहते थे और दुकान के लड़कों पर वजह.बेवजह चिल्ला देते थे।

तभी एक दिन सड़क पर नारायण श्रीवास्तव गुजरते हुए दिखाई दिए। जाने क्रिश यादव को क्या सूझी कि कंटेनर से ड्रमों में दूध उलट रहे मिट्ठू को तुरन्त आने को कहा। सब छोड़कर आने को कहा।

हई पिछला गली में सुगंधा अपार्टमेंट देखले हउआ।श्

देखले त नइखींए बकि जोह लेब।श्

त जो। दू लीटर दूध लेले जो। नारायण श्रीवास्तव के घरे दे ले आउ। कहिअ अउरी चाहीं त अउरी घरे पहुंचा दिहल जाई। कृष्णा दुग्धालय क ह।श्

ठीक ह।श्

मिट्ठू को माजरा कुछ समझ नहीं आया। मगर काम बखूबी करके लौटा। अभी नारायण श्रीवास्तव घर नहीं पहुंचे थे कि दूध पहुंच गया।

'''

नारायण श्रीवास्तव कुछ ही दिन पहले मुंबई आए थे। यार.दोस्तों के चलते अच्छी जगहए किराए पर फ्लैट भी पा गए थे। आस.पास में साग.भाजी.फल.मिठाई.दूध.दही सबकुछ मिल जाता था। और तो और स्टेशन भी पास ही था। कहीं आना.जाना हो या किसी को लाना ले जाना होए तो सुभीता था। वैसे भी मुम्बई घूमने वाले रिश्तेदारों की तो बाढ़़ सी लगी रहती थी। उनका टू बेडरूम फ्लैटए एक छोटा.मोटा गाँव बना रहता था।

उनकी पत्नी मेघना श्रीवास्तव को बाहर का खानाए न तो पसन्द था और न ही बच्चों को खाने देती थींए न बड़ों को ही। मिलावटी खाने से दूर रहने का उनका यह एक उपाय था।

उन्होंने यहां आते ही पता कर लिया कि. कहाँ क्या मिलता है र कहाँ शुद्ध चीजें मिलती हैं और कौन सी दुकानें किफायती हैं। इसी उपक्रम में उन्हें पता चला कि कृष्णा दुग्धालय कई दशकों से गाढ़़ा और शुद्ध दूध सही कीमत पर बेचने के लिए जाना जाता है। अच्छे.अच्छे रसूखदारों के यहाँ दूध इसी दुकान से आता है।

बस फिर क्या थाघ् श्रीमान जी को समझा दिया कि दफ्तर से लौटते समय कृष्णा दुग्धालय से ही दूध ले आया करें। एकाध बार नारायण जी ने यहां.वहां से दूध लाने की धृष्टता की थी। परिणामस्वरूप दूध के गुण.दोषों सहितए उसका बच्चों के विकास पर असर और टी वी.न्यूजपेपर में मिलावट से जुड़ी सारी खबरों का एन्साइक्लोपीडिया सुनने को मिला।

फिर नारायण जी ने वह गलती नहीं दुहराई। सोचा भी नहीं। थोड़ी देर से ही सहीए लाइन में लग कर ही सहीए मगर वे वहीं से दूध लाते थे। यहाँ तक कि उस दिन हुई बेइज्जती के बावजूद दो.चार दिन यह सोचकर जाते रहे कि मामला रफा.दफा हो। मगर ऐसा हुआ नहीं। क्रिश यादव के गर्म खून ने होने ही नहीं दिया।

तब से लेकर अब तकए वे लाते किसी और दुकान से थेएमगर गृह क्लेश के डर से कृष्णा दुग्धालय का बताते थे। मेघना को शक तो हुआए मगर झूठ बोलने का कोई कारण न पाकरए यकीन कर लिया।

आज सब्जी.भाजी और रोज की तरह चार लीटर दूध लेकर उन्होंने घर में प्रवेश किया। मेघना ने सब्जी का थैला और दूध की पन्नी ले ली। हाथों से ही पन्नी का वजन तौलते हुए बोली. यह तो चार लीटर लग रहा है।श् हाँ तो चार लीटर ही तो है। चार लीटर ही तो लाता हूँ रोज। ज्”यादा लाना था क्याघ्श्

नहीं.नहीं। दो लीटर तो आपने भिजवा दिए थेए तो फिर चार लीटर और लाने का मतलब।श्

भिजवा दिए थे मतलबघ्श्

अरे! कृष्णा दुग्धालय से आदमी आया था और दो लीटर दूध दे गया। मुझे लगा आप ही ने भिजवाया होगा।श्

अच्छा!श्

नारायण जी को गहन मुद्रा में खोया देखए मेघना घबरा गई।

आपने नहीं भिजवाया थाघ् हाय राम! किसका दूध हमारे घर दे गयाघ् मैंने तो उबलने भी रख दिया।श्

नारायण जी ने बात को संभालते हुआ कहा.

नहीं.नहीं। मैंने ही भिजवाया था। टाल.मटोल कर रहा थाए तो मुझे लगा कि पता नहीं भेजेगा कि नहीं इसलिएण्ण्ण्ण्श्

अच्छा.अच्छा। चलिए कपड़ा.वपड़ा बदल लीजिए। चाय चढ़़ाती हूँ।श्

'''

यह सिलसिला चल पड़ा। नारायण जी के घर आगे से दो की जगह चार लीटर दूध अपने आप पहुँच जाता। नारायण जी भी कृष्णा यादव की माया देख रहे थे। थे तो आखिर सज्जन व्यक्तिए सो पिघल गए। दुकान पर पहुंचे और बोले.

पूछताछ के लिए पुलिस घर आएगी। देख लेना।श्

इ सुनकर क्रिश यादव गए सकपका। एक तो मनो लीटर दूध भी गया और इ हमरेण्ण्ण् खिलाफ कोई कम्पलेन.उम्पलेन भी कर दिए।

किसलिए सरघ्श्

पासपोर्ट के लिएश्

प्रान में प्रान आए। क्रिश यादव खुस।

ओहण्ण्ण्! मगर पेपरण्ण्ण्ण् दस्तावेजघ्श्

वो तो तुम उस दिन मेरे दफ्तर में ही छोड़ आए थे।श्

ओह! मैं भी कितना भुलक्कड़ हूँण्ण्ण्ण्ण् मगर पासपोर्ट का एप्लिकेशन फीघ्श्

आज के चार लीटर दूध का पैसा मिलाकर पूरा हो जाएगा। तुम्हाराण्ण्ण्ण्ण् एप्लिकेशन फीश्

धन्यवाद सर। आपका बहुत.बहुत शुक्रिया। उस दिन के लिए भी माफी चाहता हूँ।श्

कोई बात नहीं। बस रहीम का वो दोहा सदा ध्यान में रखना।श्

'''