पहली मुलाक़ात** सुबह के ठीक 7:15 बजे शहर के एक शांत मोहल्ले में एक छोटी-सी आवाज़ गूँज उठी। “दीदी… उठ जाइए ना… कॉलेज नहीं जाना क्या?” दरवाज़े पर हल्के-हल्के लेकिन लगातार ठक-ठक हो रही थी। अंदर कमरे में बिस्तर पर कोई चादर ओढ़े लेटा था। कमरे में हल्की रोशनी थी। खिड़की से सुबह की पहली किरणें अंदर घुस रही थीं और दीवार पर टंगी बाइक की फोटो को छू रही थीं। “दीदी… पाँच मिनट बोलते-बोलते आधा घंटा हो गया…”

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हीरो...! - 1

** हीरो...!****भाग 1 : पहली मुलाक़ात**सुबह के ठीक 7:15 बजे शहर के एक शांत मोहल्ले में एक छोटी-सी आवाज़ उठी।“दीदी… उठ जाइए ना… कॉलेज नहीं जाना क्या?”दरवाज़े पर हल्के-हल्के लेकिन लगातार ठक-ठक हो रही थी। अंदर कमरे में बिस्तर पर कोई चादर ओढ़े लेटा था। कमरे में हल्की रोशनी थी। खिड़की से सुबह की पहली किरणें अंदर घुस रही थीं और दीवार पर टंगी बाइक की फोटो को छू रही थीं।“दीदी… पाँच मिनट बोलते-बोलते आधा घंटा हो गया…”आवाज़ और तेज़ हो गई। छोटी लड़की अब दरवाज़ा पीटने के साथ-साथ पैर भी पटक रही थी।अचानक चादर हटी। छोटे-छोटे काले बाल ...और पढ़े

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** हीरो...!****भाग 2 : पहली मुस्कान, पहली मदद**घंटी बजने के बाद कॉलेज की इमारत अचानक जीवंत हो उठी। गलियारों छात्रों की भीड़ उमड़ पड़ी। कोई क्लास ढूँढ रहा था, कोई दोस्तों के साथ हँस रहा था, कोई मोबाइल पर वीडियो बना रहा था। हवा में नएपन की खुशबू घुली हुई थी—नए बैग, नई किताबें, नए चेहरे।आर्या अपनी क्लास में घुसी। उसने खिड़की के पास वाली सीट चुन ली। बाहर गार्डन दिख रहा था। वही गार्डन जहाँ थोड़ी देर पहले एक छोटी-सी लड़की तितली के पीछे भाग रही थी। आर्या ने बैग नीचे रखा और नोटबुक निकाली। उसके आसपास कुछ ...और पढ़े

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हीरो...! - 3

हीरो...!भाग 3 : छोटी-छोटी इच्छाएँअगली सुबह आर्या की आँखें平时 से थोड़ी जल्दी खुल गईं। खिड़की से हल्की धूप आ थी। बारिश रात भर चली थी, लेकिन अब आसमान साफ था। उसने बिस्तर पर बैठकर एक पल आँखें बंद कीं। दिमाग में बार-बार वही गोल-गोल आँखें और चॉकलेट केक वाली मुस्कान घूम रही थी।“आज भी केक माँग लेगी क्या?” उसने खुद से पूछा और हँस पड़ी। फिर उठकर तैयार हो गई—काली शर्ट, डार्क जीन्स, स्नीकर्स। बैग कंधे पर डाला और नीचे उतर आई।माँ ने नाश्ता देते हुए कहा—“आज चेहरा थोड़ा अलग लग रहा है।”आर्या ने पराठा तोड़ते हुए पूछा—“कैसे?”“जैसे ...और पढ़े

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हीरो...! - 4

** हीरो...!****भाग 4 : हीरो और सनशाइन**सुबह की पहली किरणों के साथ आर्या की आँखें खुल गईं। खिड़की से हवा आ रही थी। रात की बारिश की नमी अभी भी हवा में बाकी थी। उसने बिस्तर पर बैठकर एक पल आँखें बंद कीं। दिमाग में बार-बार वही आवाज़ घूम रही थी—“काश…” और फिर वह छोटी-सी मुस्कान जब इच्छा पूरी हो जाती थी।आर्या ने सिर हिलाया और उठ खड़ी हुई। आज की शर्ट गहरे नीले रंग की थी। जीन्स और सफेद स्नीकर्स। बैग कंधे पर डाला और नीचे उतर आई। माँ रसोई में थीं।“आज भी जल्दी?” माँ ने मुस्कुराते हुए ...और पढ़े

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