खोटा सिक्काफागुन का महीना था।आम के वृक्षों पर बौर आ चुके थे। पलाश के फूलों से पूरा गाँव मानो अग्नि की लालिमा से रंग उठा था। बेला की सुगंध हवा में घुलकर वातावरण को मधुर बना रही थी। खेतों में सरसों की अंतिम पीली छटा झिलमिला रही थी और कोयल की पहली कूक वसंत के आगमन की घोषणा कर रही थी।उसी गाँव में पंडित रामशंकर झा का बड़ा नाम था।संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान, महाविद्यालय के प्राध्यापक, सौ एकड़ उपजाऊ भूमि के स्वामी और समाज के सम्मानित व्यक्ति। विशाल हवेली, आम और लीची के बाग, नौकर-चाकर, धन-दौलत—किसी वस्तु की कमी नहीं
खोटा सिक्का - 1
खोटा सिक्काफागुन का महीना था।आम के वृक्षों पर बौर आ चुके थे। पलाश के फूलों से पूरा गाँव मानो की लालिमा से रंग उठा था। बेला की सुगंध हवा में घुलकर वातावरण को मधुर बना रही थी। खेतों में सरसों की अंतिम पीली छटा झिलमिला रही थी और कोयल की पहली कूक वसंत के आगमन की घोषणा कर रही थी।उसी गाँव में पंडित रामशंकर झा का बड़ा नाम था।संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान, महाविद्यालय के प्राध्यापक, सौ एकड़ उपजाऊ भूमि के स्वामी और समाज के सम्मानित व्यक्ति। विशाल हवेली, आम और लीची के बाग, नौकर-चाकर, धन-दौलत—किसी वस्तु की कमी नहीं ...और पढ़े
खोटा सिक्का - 2
चंद रुपयों से न तो पेट भर भोजन मिल सकता था और न ही रेल की टिकट खरीदी जा थी। भूख, अपमान और अनिश्चित भविष्य की चिंता उसके साथ-साथ चल रही थी। किंतु भीतर कहीं एक सूक्ष्म स्वर उसे पुकार रहा था। न जाने क्यों उसके कदम काशी की ओर मुड़ गए।उसने दूर आकाश की ओर देखा, मन ही मन माता-पिता को प्रणाम किया और बनारस जाने वाली ट्रेन में चढ़ गया।कई दिनों की भूख और थकान ने उसके चेहरे की चमक छीन ली थी। आँखें धँस गई थीं और शरीर दुर्बल हो चुका था। टिकट न होने के ...और पढ़े
खोटा सिक्का - 3
खोटा सिक्का – भाग 03संध्या का समय था। गौशाला में गायों को चारा दिया जा चुका था। पश्चिम दिशा डूबते सूर्य की लालिमा पूरे आकाश में फैल गई थी। शिबू गौशाला के बाहर एक पुराने नीम के पेड़ के नीचे बैठा था। उसके मन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे।तभी चौधरी चाचा वहाँ आए और उसके पास बैठ गए।कुछ क्षण मौन रहने के बाद वे बोले—"बेटा, शिक्षा के बिना मनुष्य अंधा होता है और विद्या के बिना जीवन में प्रकाश नहीं मिलता। ज्ञान का प्रकाश अनेक बार आँखों का कार्य करता है।"शिबू ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुनने लगा।चौधरी चाचा ने ...और पढ़े
खोटा सिक्का - 4
भोर की प्रार्थना समाप्त होते ही शिबू बिना किसी को कुछ बताए मठ से निकल पड़ा। पूर्व दिशा में सूर्य की सुनहरी किरणें धरती पर बिखर रही थीं। पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को पवित्र बना रहा था।चलते-चलते वह पास के एक बड़े गाँव में पहुँच गया। सड़क पर बच्चों से भरी निजी विद्यालयों की बसें दौड़ रही थीं। मंदिरों के लाउडस्पीकरों से भक्ति के नाम पर फिल्मी धुनों पर आधारित गीत गूँज रहे थे। शिबू कुछ क्षण रुक गया। उसके चेहरे पर आश्चर्य और चिंता दोनों के भाव थे।वह चौराहे की एक चाय की दुकान पर बैठ गया।चाय ...और पढ़े
खोटा सिक्का - 5
खोटा सिक्काशिबू धीरे-धीरे अपने आसन से उठा। उसने एक बार चारों ओर बैठे लोगों पर दृष्टि डाली। सामने चौधरी सतीश ओझा, कमरुद्दीन मियाँ, सपन मिश्रा, सुनील झा और गाँव के अन्य बुज़ुर्ग बैठे थे। थोड़ी दूरी पर युवक पंक्तिबद्ध बैठे थे, जबकि बरगद की छाया से कुछ हटकर माताएँ और बहनें उत्सुकता से सभा की ओर निहार रही थीं। वातावरण में ऐसा सन्नाटा था मानो पूरा गाँव किसी सत्य की प्रतीक्षा कर रहा हो।शिबू ने दोनों हाथ जोड़कर सबको प्रणाम किया और शांत किंतु दृढ़ स्वर में बोला—"मेरे पितृतुल्य ग्राम के वरिष्ठजन, मेरी माताओं, बहनों, भाइयों और प्रिय मित्रों!मैं ...और पढ़े