आख़िरी लोकलरात के 11:52।ट्रेन छूटने ही वाली थी।अंगद दौड़ते हुए प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचा।फोन कंधे और कान के बीच दबा हुआ—“बस 2 मिनट… मैं train में हूँ… भेज दूँगा।”दरवाज़े बंद होने लगे।वो आख़िरी सेकंड में कूदकर अंदर घुसा।अंदर घुसते ही—तेज़ झटकाकिसी से टक्कर हुई।एक लड़की का हाथ उसके कंधे से टकराया…उसका balance बिगड़ा।वो सीधे दरवाज़े की तरफ गिरने लगी।Reflex में— अंगद ने उसका हाथ पकड़ लिया।ज़ोर से।दो सेकंड।बस दो सेकंड।ट्रेन speed पकड़ चुकी थी।बाहर अंधेरा दौड़ रहा था।लड़की का आधा शरीर दरवाज़े की तरफ झुका हुआ…हवा तेज़… खतरनाक।
PLATFORM - 1
Chapter 1: आख़िरी लोकलरात के 11:52।ट्रेन छूटने ही वाली थी।अंगद दौड़ते हुए प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचा।फोन कंधे और कान के दबा हुआ—“बस 2 मिनट… मैं train में हूँ… भेज दूँगा।”दरवाज़े बंद होने लगे।वो आख़िरी सेकंड में कूदकर अंदर घुसा।अंदर घुसते ही—तेज़ झटकाकिसी से टक्कर हुई।एक लड़की का हाथ उसके कंधे से टकराया…उसका balance बिगड़ा।वो सीधे दरवाज़े की तरफ गिरने लगी।Reflex में—अंगद ने उसका हाथ पकड़ लिया।ज़ोर से।दो सेकंड।बस दो सेकंड।ट्रेन speed पकड़ चुकी थी।बाहर अंधेरा दौड़ रहा था।लड़की का आधा शरीर दरवाज़े की तरफ झुका हुआ…हवा तेज़… खतरनाक।“छोड़ना मत…” उसने धीमे से कहा।आवाज़ शांत थी… पर अजीब तरह से steady।अंगद ...और पढ़े
PLATFORM - 2
Chapter 2: वही रात… फिर सेरात के 11:52।घड़ी की सुई जैसे अटक गई हो।---प्लेटफ़ॉर्म पर ट्यूब लाइट झपक रही सेकंड उजाला…अगले सेकंड हल्का अंधेरा।---अंगद खड़ा था।स्थिर।आज वो भाग नहीं रहा था।बस देख रहा था—tracktrain आने की दिशाऔर… खुद को---“कल जैसा कुछ नहीं होगा…”उसने धीरे से खुद से कहा।पर उसकी आवाज़ में भरोसा नहीं था।---दूर से हेडलाइट दिखी।ट्रेन आ रही थी।धीरे-धीरे…जैसे अंधेरे को चीरती हुई।---धड़… धड़… धड़…आवाज़ पास आती गई।---ट्रेन उसके सामने रुकी।दरवाज़े खुले।---अंगद अंदर चढ़ गया।इस बार बिना भागे।---डिब्बा आधा खाली था।कुछ लोग—एक आदमी सो रहा थाकोई खिड़की के बाहर देख रहा थाएक औरत फोन पर धीमे-धीमे बात कर ...और पढ़े
PLATFORM - 3
---Chapter 3: फँसा हुआरात के 11:51।---प्लेटफ़ॉर्म पर वही हल्की गूंज।Announcements दूर से आ रही थीं…पर साफ नहीं।जैसे कोई आवाज़ के अंदर से सुनाई दे।---अंगद खड़ा था।आज… वो भाग नहीं रहा था।---उसके जूते प्लेटफ़ॉर्म की उसी लाइन पर थे—जहाँ कल थे।---उसने नीचे देखा।फिर घड़ी।---11:51 → 11:52---“आज नहीं…”उसने होंठ भींचे।“आज कुछ नहीं होगा।”---दूर से हेडलाइट उभरी।धीरे-धीरे बड़ी होती हुई।---ट्रेन आई।रुकी।---इस बार—अंगद सबसे पहले अंदर गया---डिब्बा वही।सीट वही।हवा भी जैसे वही।---पर आज वो बैठा नहीं।---वो दरवाज़े के पास खड़ा हो गया।---हाथ ऊपर की rod पर।पकड़ इतनी tight कि उंगलियाँ सफेद पड़ गईं।---“देखते हैं…”उसने बुदबुदाया।---ट्रेन चल पड़ी।---पहला झटका।---उसका शरीर हल्का सा हिला…पर नज़र ...और पढ़े
PLATFORM - 4
अध्याय 4: समय के खिलाफअंगद की आँखें खुली थीं।लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।डिब्बे की पीली रोशनी थी, लोग अपनी जगह बैठे थे, ट्रेन अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी—फिर भी उसे लग रहा था जैसे सब कुछ किसी मोटे शीशे के पीछे हो।उसने अपनी हथेलियाँ देखीं।काँप रही थीं।उसने मुट्ठी बाँधी।फिर खोली।फिर बाँधी।“शांत हो जा…”उसने खुद से कहा।लेकिन दिमाग में सिर्फ एक ही दृश्य घूम रहा था—दरवाज़ा।हवा।एक लड़की।और उसकी उंगलियों से बस एक सेकंड की दूरी पर छूटती हुई कलाई।अंगद ने आँखें बंद कर लीं।तभी ट्रेन की रफ्तार कम होने लगी।घोषणा हुई।अगला स्टेशन।अंगद ने तुरंत आँखें खोलीं।उसने ...और पढ़े
PLATFORM - 5
अध्याय 5: दस साल पुरानी रातकागज़ अब भी अंगद की उँगलियों के बीच था।16 अगस्त 2016।वही तारीख।दस साल पुरानी।उसने को पलटा।पीछे कुछ नहीं था।सिर्फ हल्की-सी नमी।जैसे कागज़ अभी-अभी किसी गीली जगह से निकाला गया हो।अंगद ने उसे अपनी हथेली में दबा लिया।उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।“दस साल…”शब्द उसके मुँह से अपने आप निकले।तभी—धड़ाम!ट्रेन अचानक झटके से रुकी।डिब्बे की लाइट एक बार झपकी।फिर वापस जल गई।अंगद ने सामने देखा।लोग अपनी सीटों पर थे।वही आदमी खिड़की के पास सो रहा था।वही महिला फोन पर बात कर रही थी।वही बच्चा अपनी माँ के कंधे पर सिर रखकर सो रहा था।सब ...और पढ़े
PLATFORM - 6
अध्याय 6: वह रातउस रात अंगद घर नहीं गया।वह स्टेशन के बाहर लगी एक लोहे की बेंच पर बैठा शुरू हो चुकी थी।हल्की-हल्की बूँदें प्लेटफ़ॉर्म की सीढ़ियों पर गिर रही थीं और पीली रोशनी में चमक रही थीं।उसकी हथेली अब भी बंद थी।अंदर वही चाँदी की अंगूठी थी।एम.उसने उसे फिर खोला।फिर देखा।फिर मुट्ठी बंद कर ली।दिमाग में मीरा की आखिरी बात गूँज रही थी—“याद करो।”लेकिन याद करे क्या?उसे अपनी ज़िंदगी याद थी।कम से कम उसे ऐसा लगता था।कॉलेज।पहली नौकरी।पहला बड़ा प्रोजेक्ट।अपने पिता से हुई आखिरी बहस।अपनी महत्वाकांक्षा।अपने सपने।सब कुछ।लेकिन जब भी वह 16 अगस्त 2016 के बारे में सोचता…उसके ...और पढ़े
PLATFORM - 7
अध्याय 7: दस साल की नींदट्रेन चल रही थी।लेकिन अंगद के लिए समय रुक चुका था।वह अपनी सीट पर था और सामने की खाली सीट को घूर रहा था।कुछ मिनट पहले वहाँ मीरा बैठी थी।अब वहाँ सिर्फ उसकी परछाईं जैसी एक हल्की-सी नमी थी।अंगद ने अपनी हथेली खोली।वही चाँदी की अंगूठी।एम।उसने अंगूठी को मुट्ठी में कस लिया।उसके दिमाग में एक ही बात घूम रही थी—“मैं अभी भी वहीं हूँ, अंगद।”उसने आँखें बंद कीं।फिर वही आवाज़—बीप…बीप…बीप…उसने अचानक आँखें खोल दीं।सामने ट्रेन थी।लेकिन मशीन की आवाज़ अब भी सुनाई दे रही थी।बहुत धीमी।जैसे कहीं बहुत दूर से आ रही हो।अंगद ने ...और पढ़े