यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

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उस वक़्त मैं तीन साल का था, मेरा बड़ा भाई सुखेश पांच साल का था औऱ मेरी छोटी बहन भाविका केवल छह महिने की थी. उस वक़्त मेरी मा असाध्य बीमारी का शिकार हो गई थी. उन्हें कांदिवली स्टेशन के बाहर एक सेनेटोरियम में रखा गया था. मेरे पिताजी रोज सुबह 9 बजे की लोकल ट्रैन पकडकर मुंबई जाते थे. स्टेशन एकदम बाजू में था इस लिये ट्रैन आने की आवाज सुनकर ही वह बाहर निकलते थे औऱ टी सी की केबिन में चढ़ जाते थे. औऱ हम दोनों भाई उस वक़्त बाहर पैसेज में बैंच पर बैठकर खेलते हुए पिताजी को जाते हुए देखते थे.

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (1)

यादों की सहेलगाह- प्रकरण 1 उस वक़्त मैं तीन साल का था, मेरा बड़ा भाई सुखेश पांच साल का औऱ मेरी छोटी बहन भाविका केवल छह महिने की थी. उस वक़्त मेरी मा असाध्य बीमारी का शिकार हो गई थी. उन्हें कांदिवली स्टेशन के बाहर एक सेनेटोरियम में रखा गया था. मेरे पिताजी रोज सुबह 9 बजे की लोकल ट्रैन पकडकर मुंबई जाते थे. स्टेशन एकदम बाजू में था इस लिये ट्रैन आने की आवाज सुनकर ही वह बाहर निकलते थे औऱ टी सी की केबिन में चढ़ जाते थे.औऱ हम दोनों भाई ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (2)

:: प्रकरण :: 2 एक बार नानी मा की मार खाकर मैं तो ठिकाने आ गया था, मेरा बड़ा भाई ने दोबारा स्कूल ना जाते हुए बाहर भटकना शुरू कर दिया. यह जानकर नानी मा ने उसे ढोर मार मारा था. और पडोशी के बंध, अंधेरे कमरे में उसे कैद कर दिया. उसे खाना पीना कुछ नहीं दिया. और वह बीमार पड़ गया. उस के कई उपचार किये लेकिन उस की हालत में कोई सुधार नहीं आया. एक दिन मैं स्कूल जाने के ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (3)

:: प्रकरण :: 3 खाना खाने के बाद हम लोग फ़िल्म' झनक झनक पायल बाजे ' देखने थे. वह उस दौर की क्लासिकल फ़िल्म थी. जो एक ही थियेटर में दो साल से अधिक चली थी जिस ने भारतीय नृत्यो का परिचय करवाया था. यह फ़िल्म वी शांताराम ने बनाई थी. जिस में गोपी कृष्ण और संध्या ने काम किया था. उस समय मुझे फ़िल्म और नाटक का भेद नहीं मालूम था. मुझे ऐसा लगा था. मानो दो जिवंत ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (4)

: : प्रकरण : : 4 सर्वेश ने दूसरे दिन दोपहर को मेरा आंनद छिन लिया. " कल तुमने अनन्या के साथ क्या किया था? " मैंने केवल उस का दयान मेरी ओर खींचने के लिये ऐसा किया था. लेकिन उस ने क्या सोच लिया था? मैंने उसे सवाल किया था. " उस से तुम्हे क्या मतलब हैं? " " तुम्हारा यहीं सवाल तुम्हारी बूरी नियत का प्रमाण पत्र हैं!! " ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (5)

: : प्रकरण : : 5 भरुच से वापस मैं नोर्मल महसूस कर रहा था. भी खतम हो गई थी. और एस एस सी का पहला सत्र शुरू हो गया था. मैं पढ़ाई में दयान देने की कोशिश करता था. अनन्या की बातें कदम कदम पर मुझे याद आती थी. मेरे पिताजी ने मुझे कुछ सिखाया नहीं था. जो कुछ सिखा था. वह अनन्या से सीखा था. यह बात मैंने उसे बताई थी. " तुम्ही मेरी शिक्षिका हो. तुम ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (6)

: : प्रकरण : : 6 उस के बाद मुझे सुनीता में अपनी जीवन साथी की छबि आई थी. वह मेरी पिछ्ली बेंच पर बैठती थी. मेरा रोल नंबर 27 था और उस का 28. हमारे बीच कोई बात चीत नहीं हुई थी. केवल इम्तिहान में मैंने उसे कुछ लिखने की मदद की थी. कोलेज छूटने के बाद हम एक ही रास्ते पर रोजाना आगे पीछे होते थे.. लेकिन दोनों में से किसीने भी एक दूसरे से बात करने का प्रयास नहीं ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (7)

: : प्रकरण : : 7 गरिमा देसाई मेरी बिरादरी से थी. वह मेरे लिये फायदे मंद उस के आने से मेरी जिंदगी में चमत्कारिक बदलाव आया था. मैं रातोरात सकारात्मक बन गया था. मुझ में सारी दुनिया की समझ आ गई थी. मैं ताकतवर बन गया था. उन दिनों मैंने फ़िल्म ' अनुपमा ' देखी थी. गायक हेमंत कुमार के गीत ने मुझे काफ़ी मदद की थी. या दिल की सुनो दुनिया वालों या मुझ को अभी चुप ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (8)

: : प्रकरण : : 8 मेरी हालत काफ़ी नाजुक थी. इस स्थिति में मेरे पिताजी मनोचिकित्सक के पास ले गये थे. मुझे अस्पताल में दाखिल किया गया था. मुझे बिजली के झटके देने पड़ते थे. उस हालात में मुझे हवा बदली के लिये हिल स्टेशन ले जाने की डोक्टर ने सलाह दी थी. और मेरी हालत ओर बिगड गई थी. ईश्वर भी मेरी कौन सी भूल की इतनी बड़ी सजा दे रहा था. ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (9)

: : प्रकरण : : 9 होली का त्यौहार था. सब लोग होली खेल रहे थे. अनिश सुहानी भी उस में शामिल थे. भाविका भी होली खेल रही थी. और मैं सब को देख रहा था. मैं होली नहीं खेलता था. मैं दूर खड़ा था. दूर कहीं ग्रामोफोन पर होली का गीत बज रहा था. तन रंग लो मन रंग लो.. उस वक़्त सुहानी आकर मुझे रंग लगा गई थी, मेरे रोकने पर भी. ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (10)

: : प्रकरण : : 10 मैं शुरुआत में आरती को हैंगिंग गार्डन ले गया था.. पत्थर आड़ में हम लोग बैठे थे. पहली बार मैंने उसे छुआ था. उस के होठों को कसकर चुम लिया था. फिर मैं उस की गोद में सिर रखकर सो गया था.. उस वक़्त एक अनजान आदमी हमारे पास आया था. " आप को रूम चाहिये? " उस का मतलब क्या होता है उसे जाने बिना आरती की उंगली पकडकर उसके पीछे चल ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (11)

: : प्रकरण - 11 : : पुरी रात सब लोग ने खूब एंजोय किया था. सुबह गई थी. साथ बज चुके थे. आरती को इशारा कर के मैं अपने घर चला आया था. बाद में फटाफट तैयार हो गये थे. भाविका को अब तक कुछ बताया नहीं था. वह घड़ी घड़ी सवाल कर रही थी. आरती भी कोलेज में कोई कार्यक्रम हैं. ऐसा बहाना बनाकर घर से निकल गई थी. सब कुछ प्लान के मुताबिक चल रहा था. हम लोग ठीक नौ बजे आर्य समाज ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (12)

: : प्रकरण : : 12 सुहानी के बारे में मैंने बहुत कुछ सुना था. उस से कुछ लेना नहीं थी. अब वह मेरी साली थी. उसे सन्मान देना मेरा कर्तव्य था. लेकिन नौकर ने उस को चुम्बन किया था. यह बात मुझे जती नहीं थी. शायद यह बात को उस की निजी जिंदगी से कुछ लेना देना था. उस का आजाद वर्तन हीं उस के लिये जिम्मेदार था. मुझे घर के बिस्तर के सिवा रात को कहीं नींद ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (13)

: : प्रकरण :: 13 हसमुख की वजह से सुहानी मुझ से दूर हो जायेगी. यह मुझे खाये जा रहा था. मुझे गले तक खातिर थी, वह भी सुहानी के पास अपने पैर डबवायेगा. वह चलती गाड़ी में चढ़ने वाला यात्री था. वह कुछ भी कर सकता था. हसमुख आया उस के दूसरे दिन मैं बड़ी मा मुंबई आये थे.. दोनों शाम को हीं मेरे पुत्र को मिलने गये थे. मैं एक दिन देर से आया था ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (14)

: : प्रकरण -14 : : सुहानी के व्यवहार ने मुझे तकलीफ दी थी. उस वजह मैंने सब से बोलना छोड़ दिया था.. यह सिलसिला जारी रहा था. मेरा किसी चीज में दिल नहीं लग रहा था. उस वजह से मैं काम पर भी नहीं जा पाया था. शाम तक मेरा यहीं हाल था. शाम को सुहानी कोलेज से घर आई थी. तब उसे मेरे बारे में पता चला था. मैं उस वक़्त मुंह फुलाये बाहर बैठा था. वह मेरे पास आई ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (15)

: : प्रकरण : 15 हसमुख ज़ब चाहे तब मेरे ससुराल में जा सकता था. लेकिन मैं जा सकता था. मैं एक दामाद था. यह बात भूल गया था. और सुहानी के प्रति लगाव होने से मैं ज़ब चाहूं तब उन के घर चला जाता था. उस बात पर ललिता पवार ने मुझे ताना मारा था. और मैंने ससुराल जाना बंद किया था. और सुहानी को गुजारिश की थी. " रोज रात को मैं बाहर चाली में बैठूंगा.. तुम आकर मुझ से बात ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (16)

: : प्रकरण : : 16 उन दिनों उन के सब से छोटे भाई की शादी वाली थी. हमे सह परिवार शादी में आमंत्रित किया गया था उस वक़्त एक बात बाहर आई थी. विजय कुमार की बीवी को मैं पहचानता था. हम दोनों साथ में खेले थे. हमारे बाजु के घर में उस की नानी मा का घर था. वह अक्सर आती थी. इस वजह से हमारे बीच दोस्ती हो गई थी. ओफिस में ज्यादातर लड़कियो को काम दिया जाता ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (17)

: : प्रकरण : : 17 अजय कुमार के साथ जो हुआ था. बात उन का अहम सह नहीं पाया था. और उन्होंने अपनी जात दिखाई थी. मुझे उन की कंपनी में जोब मिला था.. यह सुनकर वह वहाँ भी पहुंच गये थे. और मैनेजमेंट को मेरे खिलाफ भड़काया था : " उस से बचकर रहना वह यूनियन जैसी तूफानी हरकत करने वालों से. " मुझे उस का पता नहीं था. मैं खुद ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (18)

: : प्रकरण : : 18 एक महिने में दोनों की शादी हुई थी.. डोना केथोलिक से थी.. तो उन की शादी चर्च में हुई थी.. मैं अकेला शादी में उपस्थित था. शाम को होल में सत्कार समारोह आयोजित किया गया था. दोनों ने हमे अलग से आमंत्रण पत्रिका दी थी, हमने भी दोनों को अलग से गिफ्ट दिया था.. उसे देखकर ओफिस का स्टाफ चकित सा ऱह गया था शादी के बाद हम दोनों का आने जाने का रास्ता एक हो ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (19)

: : प्रकरण : : 19 मेरे परिवार और परमेश्वर के परिवार ने साथ अजंता का मिनि पिकनिक आयोजित किया था. उस के लिये सुबह साथ बजे चर्च गेट स्टेशन पर मिले थे. मेरे परिवार सहित फ्लोरा की बहन और परमेश्वर के सौतेले भाई बहन उस में शामिल थे. हम लोग गेट वे ओफ इंडिया गये थे, वहाँ से हम लोग लोंच में अजंता गुफा गये थे. ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (20)

: : प्रकरण -20 : : उस दिन खास तो कुछ नहीं हुआ था. मेरी फ्लोरा कोई बात नहीं हुई थी. मुझे एक लेटर टाइप करवाना था, जो मैं रश्मि को बोल सकता था. लेकिन अगली रात के सपने ने मुझे विचलित कर दिया था. उस को खो बैठने का ख्याल दिलों दिमाग़ पर सवार हो गया था.. इस लिये उस से बात कर के मैं अपना डर दूर करना चाहता था. वह किचन में थी. 12-45 का समय हुआ था. वह किशन से ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (21)

: : प्रकरण - 21 : : ' कीसी ' की विदाय से मैं काफ़ी हुआ था.. मैं उसे किसी भी तरह भूला नहीं पा रहा था.. हम लोग कुछ भी काम होता था, तब साथ हीं होते थे. उस दिन ' कीसी' ओफिस नहीं आई थी. परमेश्वर को पीलिया हो गया था. वह डोक्टर की दवाईया लेता था. लेकिन मुझे पता था, यह बीमारी दवाईयो से ठीक नहीं होती हैं. उस के लिये मुझे याद आया था. भूलेश्वर में एक ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (22)

: : प्रकरण : : 22 ' कीसी' के जाने के बाद मेरी जिंदगी में अंधेरा गया था. आखिरी दिन मैं उस के साथ वी टी स्टेशन तक चल कर गया था. मैं बहुत मायूस हो गया था.. उस वक़्त ' कीसी' ने मुझे आश्वस्त किया था. " संभव भैया मेरा जोब छूटने से हमारे रिश्ते का अंत नहीं होता हैं. आप ज़ब चाहे तब अपनी बहन और भाई जैसे दोस्त को मिलने आ ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (23)

: : प्रकरण : : 23 फ्लाइट ने टेक ओफ कर लिया था. और सब लोग लौट रहे थे. रात को तीन बज चुके थे. और मुस्कान अब भी रो रही थी. काफ़ी रात बीत चुकी थी तो परमेश्वर के साले ने हमे ' कीसी' के घर में रोक लिया था. सोने का तो कोई सवाल नहीं था. सब लोग बातें कर रहे थे. छह बजे की करीब टेलिफोन की रिंग बज उठी थी. परमेश्वर सुख रूप दुबई ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (24)

: : प्रकरण - 24 : : परमेश्वर एक दुर्घटना का शिकार हो गया था. उस गंभीर चोट लगी थी. उस को गुह्य अंग में चोट लगने से शस्त्र क्रिया करनी पड़ी थी जिस ने उसे वैवाहिक सुख से वंचित कर दिया था. उस हादसे की वजह से वह अपनी बीवी के बुलाने पर भी मुंबई नहीं आया था. उस बातने दोनों मिया बीवी के बीच दरार पैदा कर दी थी. बहुत समय बाद वह मुंबई आया था.. उस ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (25)

: : प्रकरण - 25 : : उस एडिटर का नाम जयेश सोनी था. उस की तंत्री एक लड़की थी. जो जनरल विभाग देखती थी. वह मेगेजिन सेक्शन संभालना चाहती थी. लेकिन वह सेक्शन एक काबिल और सक्षम व्यकित मनोज ओझा संभालता था. वह बडे घर का लड़का था. वह पैसे के लिये नहीं बल्कि शोख के लिये जोब करता था. हर बार बार कुछ ना कुछ नया करता रहता था. जयेश सोनी और मिनाक्षी के बीच कोई खिचड़ी पक रही ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (26).

: : प्रकरण - 26 : : ' कीसी ' के जाने के बाद काजल मेरे आ गई थी. हम लोग भी शाम को साथ ही निकलते थे. मेरा पगार तो नहीं बढ़ा था. लेकिन मैं बोंड्या के लेवल का था. उसे फर्स्ट क्लास का पास मिलता था, तो मैंने भी फर्स्ट क्लास के पास की डिमांड की थी जिसे मंजूरी मिल गई थी. काजल अच्छे परिवार से थी. वह अपने पैसे से फर्स्ट क्लास में ट्रेवल करती थी. हम दोनों ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (27)

: : प्रकरण - 27 : : उस का नाम संगीता था. बहुत भोली और सरल लड़की थी. मैंने उस के नाम का अंग्रेजी में अनुवाद किया था. म्युझिका!! जो उसे बेहद पसंद था. वह ज़ब हसती थी तो उस के गालों के खंजन मुझे बहुत भाता था. वह मेरी गुरु थी. उस ने मुझे बेझिक रूप से कम्प्यूटर सिखाया था. उस के लिये मैं ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (28)

: : प्रकरण - 28 :: कुछ दिन बाद मैंने अपने हाथों की उंगलिया दिखाई थी. नाखुनो से पुरी भरी पड़ी थी. यह देखकर म्युझिका चकित ऱह गई थी. उसने मुझे सवाल किया था. " हां! " मैंने एकाक्षरी जवाब दिया. " यह कैसे हो गया? " उस ने मुझे सहज सवाल किया. मैंने उसे जवाब दिया. " यह एक चमत्कार हैं जो एक दादी मा ने किया हैं. " ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (29)

: : प्रकरण -29 : ललना ने मेरी जेब से आधे से ऊपर पैसे निकाल दिये यह जानकर मुझे बड़ा झटका लगा था. मैं तुरंत आवास में गया था. तब वहाँ का नक्शा बदला हुआ था. उस रूम में एक आदमी बैठा था. जो कोई मेहमान होने का एहसास दिला रहा था. और एक दूसरा व्यकित जो पुरुष था जिस ने ऊपर कुछ नहीं पहना था और उस की छाती स्त्री जैसी थी. वह उस आदमी की चाय नास्ते ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (30)

: : प्रकरण - 30 : : मै स्नेहा को नियमित तौर से NGO में मिलने जाता उस बहाने हमारे बीच सारी बातें होती थी. मैंने कभी नहीं सोचा था. मैं कभी दोबारा गरिमा को नहीं मिल पाउँगा, लेकिन हमारे लिये ईश्वर ने कुछ अलग ही सोचा था. मैं एक बार गरिमा के NGO में गया था. उस वक़्त एक लड़का किसी अंधी औरत को लेकर वहाँ आया था. उसे देखकर मैं चकित सा ऱह गया था. वह मेरी पिताजी के परम मित्र की बेटी ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (31)

: : प्रकरण : : 31 मेरी बड़ी बेटी क्षमता ने बी कोम का अभ्यास पूरा लिया था. उस दौरान उस को एक मुस्लिम युवक के साथ प्यार हो गया था. मैंने खुद प्रेम विवाह किया था. इस लिये मुझे उस से शादी करने में कोई समस्या नहीं था. लड़का ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था. उस की मटन की शोप थी. क्षमता ने उस के साथ एक बात का खुलासा कर लिया था. " आप नोन वेज ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (32)

: : प्रकरण : : 32 एक दिन मैं चर्नी रोड स्टेशन के ब्रिज से गुजर था. तब किसी जानी पहचानी आवाज सुनकर मेरे पैरों को ब्रेक लग गई थी. मैंने मुड़कर पीछे देखा तो चौंक सा गया. क्षिप्रा किसी आदमी को पूछ रही थी. " चलना हैं? " बिल्कुल उसी अंदाज में वह आते जाते लोगो को पूछ रही थी, बिल्कुल आशावरी की तरह. मैं कुछ बोलूं या करुं उस के पहले घराक को ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (33)

: : प्रकरण - 33 : : मैंने स्नेहा को मेरी हाथ के नीचे काम पर था. उस के मेरा काम दूसरों के साथ कमला करती थी. वह बेवा थी. काफ़ी दुखी थी. इस स्थिति में वह किसी का अच्छा नहीं देख सकती थी. मैं स्नेहा का अच्छा ख्याल रखता था. वह बात उसे कांटो की तरह चुभती थी. उस की मजबूरी का फायदा उठाकर पैसों की लालच देखकर ज़ब चाहे तब उस का यौवन शोषण करता था. स्नेहा ने भी ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (34)

. : : प्रकरण -34 : : वाला स्नेहा के पीछे दिवाना, पागल हो गया था. उस ने कमला की मदद से उसे फ़ाँसने की कोशिश की थी, लेकिन उस की दाल नहीं गली थी. उस ने कई बार मुझे स्नेहा को लेकर ताने मारे थे. " स्नेहा तो आप की रखैल हैं. मुझे भी भागीदारी दे दो ना! " उस की ऐसी घिनौनी बात से मुझे बड़ा गुस्सा आया था. उसे ठपड़ मारने का ख्याल आया ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (35)

: : प्रकरण -35 : : नानी मा के निर्दय मार से बडे भाई सुखेश का हुआ था. यह बात मैं कभी भूला नहीं पाता था. शादी को मुश्किल से पांच साल हुए थे. और मेरी मा चल बसी थी. उस के बारे में किसी ने उसे कुछ खिला दिया था. हमारे गाव में एक बुजर्ग रहते थे उस को एक बेटा और बेटी थी. उन की मा भी मेरी तरह चल ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (37)

: : प्रकरण - 37 : : मैं खुद एक लेखक था. अपने के अनुभव को याद कर के मैंने एक कहानी लिखी थी. उस की रिस्ट वोच गाड़ी में यात्रा करते समय किसी ने खिंच ली थी. उस को ना जाने क्या सूझा था. हिरो की तरह घडी वाला हाथ खिड़की पर ऱख कर बैठा था, जिस ने चोर का काम आसान कर दिया था. स्प्रिंग वाला पट्टा था जो जरा खिंचने से टूट गया था. और घड़ी ...और पढ़े

37

यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (38)

: : प्रकरण - 38 : दो और बडे प्रोडक्शन हाउस की बोलबाला थी जिन्होंने फिल्मों नई प्रदान की थी, जो थी राजश्री प्रोडक्शन और प्रसाद प्रोडक्शन! राजश्री को ताराचंद बड़जात्या ने स्थापित किया था. उन्होंने अपने बैनर तले ' आरती ' फ़िल्म का निर्माण किया था. बाद में एक से बढ़कर एक फ़िल्म बनाई थी. उन के साथ उन के तीन बेटे भी जुड़े थे. कमल, राज कुमार और अजित बड़जात्या. सालो तक उन्होंने अपनी फिल्मों के जरिये राज किया ...और पढ़े

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 39)

: : प्रकरण -39 : : उस रात को पार्टी के बाद कहते हुए भी दोनों वहाँ से बाहर निकले थे. एक छोटी खोली में हनीमून कैसे मनाना? वह समस्या थी. शकीला ने उन्हें घर से बाहर जाने को कहां था. लेकिन वह माने नहीं थे. उन्होंने ने दूल्हे पर वार किया था और उस की उपस्थिति में शकीला पर बलात्कार किया था. यह देखकर उस के पति अनवर ने उन का सामना करने की कोशिश में शकीला को शादी की रात बेवा कर दिया ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (40)

: : प्रकरण -40 : : मेरी बहन की लड़की की शादी में मैं बड़ोदा गया तब मेरी मुलाक़ात सुख लाल से हुई थी. वह छोटे बच्चों को अपनी रेकड़ी में बिठाकर उन्हें जहाँ जाना होता था वहाँ पहुंचाता था. भाविका की लड़की की शादी खतम होने के बाद कोई साधन नहीं मिला था तो सुखलाल ने बिना कहे सब को रेकड़ी में बिठाकर अपने मुकाम पहुंचाया था, उस के लिये उस ने कोई पैसा नहीं लिया था. सुख लाल ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (41)

: : प्रकरण -41 : : फिल्मों का जमाना जारी था. साथ में टेलीविझन धारावाहिक की भी हो गई थी. दूर दर्शन पर ' हम लोग ' धारावाहिक शुरू हुई. जो अच्छी शुरुआत थी उस में कुछ अच्छा था, लोगो के सबक भी था. उस के बाद 'बुनियाद ' शुरू हुई थी. वह भी एक अच्छी धारावाहिक थी. फिर रामानंद सागर ने ' रामायण ' बनाई थी जिस को अच्छा प्रतिभाव संपादित हुआ था. उस के बाद 'महा भारत ' धारावाहिक शुरू ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (42)

: : प्रकरण - 42 : : उस के बाद ऐसी धारावाहिक प्रदर्शित हो रही थी. सही मायने में काबिले तारीफ हैं.. उस का नाम हैं ' पुष्पा इम्पोसिबल' वह एक ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी, लेकिन अपनी लगन, नेकी और स्वभाव से बहुत कुछ हांसिल करती हैं. उस के दो बेटे और एक बेटी होते हैं. उस को सही शिक्षण दिया था. दोनों की अच्छे घर में शादी होती हैं. वह छोटे बच्चों के साथ वह स्कूल में पढ़ती हैं. और अपनी मेहनत ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (43)

: : प्रकरण - 43 : : सुंदर काम करता था. उस से मुझे कोई दिक्कत थी. लेकिन काम करने के तरीके से मुझे नाराजगी थी. वह पूरा टाईम भाव के पीछे भागता रहता था. अप डेट लेता रहता था. मैंने उस को समजाया था. " पूरा दिन भाव के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं है. सुबह मार्किट खुलते ही शेयर खरीद लेना. उस की मूवमेंट देख लेना. वह कहाँ तक जा सकता हैं. ऊपर जाता हैं तो टारगेट सेट ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (36)

: : प्रकरण - 36 : : फिल्मों में अधिकाधिक अभिनेत्रीयो ने अपनी कला के दिखाये थे जिस में कानन कौशल, कामिनी कौशल, नूरजहाँ, सुरैया, निम्मी, नरगिस, नूतन, मधु बाला, मीना कुमारी, वैजयंती माला, माला सिन्हा, पद्मिनी, संध्या, श्यामा, शशि कला, शकीला, निरूपा रोय और नये दौर में माधुरी दीक्षित, मीनाक्षी शेषाद्री, महिमा चौधरी, श्रीदेवी, मौसमी चैटर्जी, दिप्ति नवल इत्यादि.. इत्यादि लोग शामिल थे. अभिनेता की फेहरिष्ट में धुरंधर दिलीप कुमार, देव आनंद, राज कपूर और उस के दो ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (43)

: : प्रकरण - 43 : : सुंदर काम करता था. उस से मुझे कोई दिक्कत थी. लेकिन काम करने के तरीके से मुझे नाराजगी थी. वह पूरा टाईम भाव के पीछे भागता रहता था. अप डेट लेता रहता था. मैंने उस को समजाया था. " पूरा दिन भाव के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं है. सुबह मार्किट खुलते ही शेयर खरीद लेना. उस की मूवमेंट देख लेना. वह कहाँ तक जा सकता हैं. ऊपर जाता हैं तो टारगेट सेट ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (44)

: : प्रकरण - 44 : : मेरे दिमाग़ में क्या क्या ख्याल आते थे. मुझे क्रिकेट खेलना अच्छा लगता था.. स्कूल के दिनों में हमारी क्रिकेट की टीम थी. और मैं उस का कप्तान भी था. उस के अलावा मैं आंतर वर्गीय क्रिकेट मैच भी खेला था. एक मैच में मैंने 24 रन बनाये थे. उस के अलावा दो विकेट्स भी लिये थे. एक ही दाव में पांच से अधिक विकेट्स मैंने लिये थे. ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (45)

: : प्रकरण - 45 : : आज से छह से भी ज्यादा दायके के पहले परिस्थिति अलग थी. फिल्मों में कुछ ना कुछ संदेश होता था. लोगो को कुछ नया जानना सीखना मिलता था. उस जमाने में वी शांताराम ने अपनी फिल्मों के जरिये नया मकाम प्राप्त किया था. कुछ अलग दिखाने का प्रयास किया था. ' झनक झनक पायल बाजे ', ' दो आंखे बारह हाथ ' और ' तूफान और दिया ' फिल्मों के जरिये उन्होंने ने हंगामा मचा ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (46)

: : प्रकरण - 46 : : गोवेर्धन राय त्रिपाठी में उपन्यास ' सरस्वती चंद्र' लिखी जो चार भाग में थी और काफ़ी लंबी थी, उन्हें पूर्ण करने के लिये उन्हें काफ़ी समय लगा था. और उसे बार बार लिखना पड़ा था. इसी तरह लिओ टोल्सतोय का किस्सा था. उन्हें भी अपनी उपन्यास बार बार लिखनी पड़ी थी, जिस वजह से उन्हें काफ़ी समय लग गया था. फिल्मों में एक टीम थी, राम से ब्रदर्स की जिन्हे फिल्मों में होरर लाने का ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 47)

: : प्रकरण - 47 : : दिवाली के धमाकेदार फटाखे से सुंदर की आँखों बड़ा झटका लगा था. उस की आँखे टेढी हो गईं थी. वह तो ओपरेशन से ठीक हो गईं थी. लेकिन उस की आँखों की नस तंग हो गईं थी. ललिता पवार के पूर्वजों पर अभिशाप था, कोई कुदरती प्रकोप था. जिस की वजह से ना जाने कभी ना देखी, ना सुनी बीमारी. घर में किसी ना किसी भरख लेती थी. अंधापन इस परिवार के लिये एक उपहार बन ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई -( 48)

: : प्रकरण - 48 : : मैं अगले इतवार को बिभूति को छोड़ने कुर्ला टर्मिनस गया था. उस का टिकिट बुक था और बोगी नंबर मेरे पास थे. इस वजह से उसे ढूंढने में कोई दीक्क़त नहीं हुई थी. मैंने रेलवे स्टेशन से उस के लिये नास्ते के पैकेटस ख़रीदे. सफर लंबा था. उस की मौसी ने भी उसे टिफिन भर के दिया था. उस पर बिभूति ने मुझे अपनी बेटी की तरह डांट दिया था. " बडे पापा! ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (49)

: : प्रकरण - 49 : : बिभूति को मिलने के लिए मैं सदैव उत्सुक रहता वह भी मुझ से बात करने के लिये बेताब रहती थी. एक बार उस ने सुबह दस बजे के करीब मुझे वीडियो कोल किया था. उस वक़्त मैं सोया हुआ था . मेरी तबियत ठीक नहीं थी.. उसे वह मालूम नहीं था. उस ने मुझे दादी मा की तरह डांटा फटकारा था. " यह क्या बडे बापा. इतनी देर तक ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (50)

: : प्रकरण -50 : : " बडे पापा! एक खुश खबर हैं! सुनकर आप के पैर पर नहीं टिकेंगे.. " " क्या खबर है? जल्दी बताओ, मेरे सब्र का इम्तिहान ना लो. " " तुम्हारे दामाद की बदली हुई हैं. उन्हें मुंबई ओफिस में ट्रांसफर किया गया हैं. हम लोग बहुत जल्दी मुंबई आ रहे हैं. " " यह तो वाकई में बड़ी खबर हैं.. " " हां लेकिन एक दिक्कत हैं. कंपनी के कोई ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई, ( 51)

: : प्रकरण -51 : : मुझे रिधिमा ने बताया था. वह साहित्य में पी एच कर रही थी. उस ले सिडनी में काफ़ी लोगो के साथ उठना बैठना था. वह मुझे मदद कर सकती थी, मेरी छोटी कहानिया और उपन्यास प्रकाशित करने में मेरी मदद कर सकती हैं. मेरी कहानिया और उपन्यास गुजराती हिंदी में था उस का मुझे टेंशन था यह सुनकर उस ने मुझे सुझाव दिया था. " आप चाहे तो गूगल ट्रांसलेट एप्लीकेशम के जरिये उसे जिस भाषा ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 52)

: : प्रकरण - 52 : : मैंने माधुरी एक्सपोर्ट्स को छोड़ दिया था. और पोस्ट बेनिफिट्स की रिकवरी के लिये कंसल्टेंसी service देना जारी किया था. उस में मुझे काफ़ी क्लाइंन्ट्स मिले थे. मैंने बहुत से लोगो का काम किया था. उस में अच्छा कमाया भी था. ज्यादा मुझे फार्मेसीटिकल कंपनी काम मिला था. उस में एक कंपनी का अच्छा काम मिला था. उस के अफसर को मैं कमिशन देता था. उस वजह से मुझे अच्छा काम मिला था. वह लोग ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (53)

: : प्रकरण - 53 : : सब से बड़ा दूर उपयोग मोबाइल का होता हैं. हर कोई उम्र की लड़की या औरत फ्रेंड शिप रिक्वेस्ट भेजती हैं.. उस का स्वीकार भी करती हैं. लेकिन आगे कुछ नहीं होता था. फेसबुक बुक, यु ट्यूब में भी लड़कियां अपने फोटोस भेजती हैं, रील्स भेजती हैं और लोगो को उकसाने की कोशिश करती हैं. कुछ लड़कियां तो अपनी खुद की वैबसाइट बनानी हैं और पुरुषो को आमंत्रित करती हैं. ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (54)

: : प्रकरण 54 : : रणधीर कपूर की दो बेटियां थी. फिर भी उस की बीवी गई थी. करिश्मा कपूर और करीना कपूर. दोनों ने फिल्मो में काम किया था. उन के साथ कपूर परिवार में बेटियां भी फिल्मों में काम करने लगी थी. दोनों ने अपनी कला का करतब दिखाया था. अपना नाम बनाया था. दोनों की शादी हो गई थी. आगे जाकर करिश्मा की शादी टूट गई थी करीना ने ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (55)

 : : प्रकरण 55 : : कहते हैं हर क़े दिमाग़ में कुछ ना कुछ चहल पहल होती रहती हैं. दिमाग़ बिना सोचे एक पल भी रह नहीं सकता. मेरा भी कुछ ऐसा हाल था. मैं हर पल कुछ ना कुछ सोचता रहता था. मेरी जिंदगी में कई लोग आये थे, जिस की याद मुझे समय समय पर आती रहती थी. मेरी याद दास्त भी बड़ी तेज थी. कुछ भी चीज मानो फेविकोल की तरह मेरे दिमाग़ में घुसकर पूरी तरह चिपक जाती थी, जिसे मैं चाहकर भी मैं ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (56)

: : प्रकरण - 56 : : सुंदर ने भी खुद अपनी जिंदगी बर्बाद की थी. अपने पैरों पर मारी थी. उस ने पिछ्ली उम्र में शेयर बाजार में पदार्पण किया था. कुछ भी हो उस का दिमाग़ तभी तेज था. वह पूरा दिन शेयर बाजार में डूबा रहता था. सुबह 6-30 बजे वह टी वी खोलकर बैठ जाता था. हर एक शेयर के भाव देखता था. एक्सपर्टस की राय सुनता था. मैं उसे मोबाइल में देखकर भाव की जानकारी देता था. वह जरूर कुछ कमाया था. उस ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (57)

: : प्रकरण - 57 : : ' बेबी बर्थ कंपनी ' नई दिल्ली में इस नाम से इस का उदय हुआ हैं. जो स्त्री को बच्चा देने के लिये पुरुषो को आमंत्रित करते हैं जिस के पति उन्हें बच्चा नहीं दे सकते. उस के लिये बड़ी ओफर करती हैं. स्त्री को बच्चा देने वालों को लाखो रूपये की लालच देते हैं. एडवांस पैसे देने का वादा करते हैं. रिजल्ट पोजिटिव आने पार बाकी की रकम देने का वायदा करते हैं, उस ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (58)

: : प्रकरण : : 58 सुहानी का क़ोई ठिकाना नहीं था. वह तितली की तरह एक जगह से जगह उड़ती फिरती थी. . भौतिक सुख की कामना उसे संजय की ओर ले जाती थी और दया, हमदर्दी उसे अनिकेत के पास खिंच लाती थी. घर बदलते ही सुहानी ने अपना प्रेमी बदल दिया था. वह बहुत जल्दी आनंदी बहन के सौतेले बेटे अनिश के साथ शुरू हो गई थी. और देखते ही देखते वह दोनों आगे बढ़ गये थे.. ललिता पवार ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई, ( 59)

: : प्रकरण 59 : : सपनो के अभाव से गली, मोहल्लेकी क्रिकेट से कभी आगे बढ़ नहीं पाया में क्रिकेट जरूर खेला था.. मैंने बडे लोगो के साथ कई मैच भी खेले थे.एक बार ग्यारहवे नंबर पर बेटिंग कर के नाबाद 19 रन भी बनाये थे. बोलिंग डिपार्टमेंट मे जरूर मैंने अपना करिश्मा दिखाया था. एक ओवर मे चार विकेट्स लेने का रेकॉर्ड मेरे नाम दर्ज था. आंतर शालीय मेचो में भी मैंने अच्छा प्रदर्शन किया था. तीसरे नंबर पर बेंटिंग कर के मैंने 24 का योगदान दिया ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (60)

: : प्रकरण - 60 : : उस के पहले मैंने " नैना बरसे रिमझिम रिमझिम "उपन्यास लिखी जो भाई बहन के प्यार पर आधारित थी.. वह दोनों एक ही मा की संतान थे, जिस के बारे में वह दोनों अज्ञात थे. इस कहानी की प्रेरणा मुझे हमारे संबंधी परिवार से मिली थी. दो बहने थी. उन के सगे बेटे बेटी ने शादी की थी.शास्त्रों में ऐसे रिश्ते में शादी के लिये अनुमति नहीं दी गई हैं. सगे बाप बेटी को भी ज्यादा समय साथ रहने के लिये मना की गई हैं. यहाँ भी ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (61)

: : प्रकरण - 61 : : अनन्या की शादी हो गई थी. हमें शादी में न्योता मिला था. में मैं केवल उपस्थित था. गीता बहन ने खुद गिफ्ट देकर मुझे अनन्या की शादी में भेजा था. मुझे देखकर उस ने ख़ुशी जाहिर की थी. उस के साथ मेरा क्या रिश्ता था? मैं कभी नहीं समझ पाया था. मैं इस रिश्ते को लेकर सदैव असमंजस में रहा था. इस के लिये अनन्या और अपूर्व का दो रंगी रिश्ता जिम्मेदार था. एक तरफ वह अपूर्व को राखी बांधती थी और ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (62)

: : प्रकरण - 62 : : अनन्या की शादी हो गई थी. हमें शादी में न्योता मिला था. में मैं केवल उपस्थित था. गीता बहन ने खुद गिफ्ट देकर मुझे अनन्या की शादी में भेजा था. मुझे देखकर उस ने ख़ुशी जाहिर की थी. उस के साथ मेरा क्या रिश्ता था? मैं कभी नहीं समझ पाया था. मैं इस रिश्ते को लेकर सदैव असमंजस में रहा था. इस के लिये अनन्या और अपूर्व का दो रंगी रिश्ता जिम्मेदार था. एक तरफ वह अपूर्व को राखी बांधती थी और ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (63)

: : प्रकरण - 63 : : रिधिमा की वजह से मेरी लेखन प्रवृत्ति को गति हुई थी, बुस्ट मिला था. मेरी सारी कहानिया अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर के प्रकाशित करने के लिये उस ने काफ़ी जहमत उठाई थी, रिधिमा की वजह से मुझे एक लेखक का रुतवा प्राप्त करने में कामयाबी हांसिल हुई थी. मेरी जीवनी में उस की मम्मी के साथ के रिश्ते को मैंने यथावत पेश किया था. उस पर रिधिमा ने बेहद ख़ुशी व्यक्त की थी.. अमेरिका में मेरी ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (64)

 : : प्रकरण - 64 : : जिस तरह मैं सुशील के एडजस्ट नहीं कर पाता था. वही हाल उन के बेटो का था. उन्हें तैयार थाली में खाना मिला गया था. धंदे के उत्थान के लिये उन्हों ने क़ोई सक्रिय प्रयास नहीं किया था. उन के दादा ने जो कहां था वह सच ही था. " जो महेनत मैंने धंधा जमाने के लिये की थी उस से आधी मेहनत मेरे बेटों ने नहीं की हैं और उन के बेटे का क्या कहना? तैयार थाली में बैठकर मजे से खाना खा ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (65)

 : : प्रकरण - 65: : सुंदर शारीरिक तौर अपाहिज था, लेकिन घर के नकारात्मक माहौल ने उसे ओर अपाहिज बना दिया था. उस की हालत बिगाड़ने में मेरे पिताजी ओर खुद आरती के बेसमज प्यार ने एक अहम भूमिका निभाई थी. उस की कमजोरी को वजह बनाकर उसे कुछ करने ही नहीं दिया था ओर उस की इस तकलीफ को ईश्वरीय देन समझ कर स्वीकार लिया था. बच्चो के भविष्य के लिये मा का प्यार जरूरी होता हैं, लेकिन बेसमज प्यार नुकसान कर्ता होता हैं. इस बात का ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - ( 67)

: : प्रकरण - 67 : : ऐसी स्थिति में ऐसा ख्याल आना लाजिम था. भगवान ने उस के में यह यातना लिखी थी? . वह मुझे ऐसी तकलीफ देना नहीं चाहता था. इस लिये चालाकी से मुझे गरिमा से अलग कर दिया था. चलो वह मेरे नसीब में नहीं थी. फिर उस ने गरिमा के साथ ऐसा क्यों किया था? ऐसा कहां जाता हैं. हमे दोबारा जन्म मिला हैं उस के लिये हमारी कहानी, हमारे कुकर्म और पाप जिम्मेदार ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 66)

 यादों की सहेलगाह" -प्रकरण 66 एक बात मैं कभी भूला नहीं रहा था मेरे मौसे ने अपने मतलब के लिये मुझे काफ़ी प्रताड़ित, तंग किया था. मैं कुछ कर नहीं सकू उन के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाऊं, इस ख्याल से उन्हों ने मेरा आत्म विश्वास तोड़ने के लिये गंदे राज कारण का सहारा लिया था. मुझे नीचा दिखाने में क़ोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी. मुझे हमेशा यही एहसास दिलाने का प्रयास किया था. मैं बेवकूफ हूं, अनाड़ी हूं. उन के ऐसे रवइये ने मेरा आत्म विश्वास को ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (68)

 : :प्रकरण - 68 : : उसी वक़्त से एक खाली एम्बुलेंस अम्बाजी जा रही थी हम लोग पहले श्री नाथजी जाने वाले थे, फिर बाद में अम्बाजी. वह लोग हमें बस के किराये में अम्बाजी तक ले जाने को तैयार हो गये थे और हम लोग ने कार्यक्रम बदलकर पहले अम्बाजी जाना तय किया था.एम्बुलेंस में दो और आदमी थे. उन्हों ने सामान चढ़ाने में हमारी मदद की थी. एम्बुलेंस की साइरन की वजह से हम लोग को ट्राफिक की तकलीफ से छुटकारा मिल गया था. ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (69)

 : : प्रकरण - 69 : पिताजी का मुंबई से दूर अहमदाबाद में निधन हुआ था, उस पर लोगो को अचरज हुआ था. वह 90 के करीब पहुंच गये थे. फिर भी ज़ब चाहा तब बिना कुछ कहे, बताये निकल पड़ते थे. रास्ते में कहीं कुछ हो गया तो? उस के बारे में सोचना जरूरी नहीं समझा था. उन्हें इतनी बड़ी दुनिया में कहाँ तलाशना.? यह मेरी समस्या थी. वह पुरे दिन कुछ ना कुछ टोपिक पकड कर आरती के साथ उलझते रहते थे. कुछ ना ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (70)

: : - प्रकरण - 70 : : रिधिमा की वजह से मेरी लेखन प्रवृत्ति को प्राप्त हुई थी, बुस्ट मिला था. मेरी सारी कहानिया अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर के प्रकाशित करने के लिये उस ने काफ़ी जहमत उठाई थी, रिधिमा की वजह से मुझे एक लेखक का रुतवा प्राप्त करने में कामयाबी हांसिल हुई थी. मेरी जीवनी में उस की मम्मी के साथ के रिश्ते को मैंने यथावत पेश किया था. उस पर रिधिमा ने बेहद ख़ुशी व्यक्त की थी.. अमेरिका में मेरी ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 71)

 : : प्रकरण - 71 : : तरह मैं सुशील भाई के एडजस्ट नहीं कर पाता था. वही हाल उन के बेटो का था. उन्हें तैयार थाली में खाना मिला गया था. धंदे के उत्थान के लिये उन्हों ने क़ोई सक्रिय प्रयास नहीं किया था. उन के दादा ने जो कहां था वह सच ही था. " जो महेनत मैंने धंधा जमाने के लिये की थी उस से आधी मेहनत मेरे बेटों ने नहीं की हैं और उन के बेटे का क्या कहना? तैयार थाली में बैठकर ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 72 )

: : प्रकरण - 72: : रिधिमा की वजह से मेरी लेखन प्रवृत्ति को गति हुई थी, बुस्ट मिला था. मेरी सारी कहानिया अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर के प्रकाशित करने के लिये उस ने काफ़ी जहमत उठाई थी, रिधिमा की वजह से मुझे एक लेखक का रुतवा प्राप्त करने में कामयाबी हांसिल हुई थी. मेरी जीवनी में उस की मम्मी के साथ के रिश्ते को मैंने यथावत पेश किया था. उस पर रिधिमा ने बेहद ख़ुशी व्यक्त की थी.. अमेरिका में ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (73)

: : : : प्रकरण - 73 : : साल के बाद परमेश्वर वापस इंडिया आया था. सुनकर मुझे ख़ुशी हुई थी. दूसरे ही पल मुझे बड़ा झटका लगा था. परमेश्वर को ब्रेन ट्यूमर हो गया था. वह अस्पताल में था. सुनकर मैं तुरंत अस्पताल दौड़ गया था. उसे देखकर मैं चकित रह गया था. वह फ़िल्म ' आनंद ' के राजेश खन्ना के अंदाज में सब से हस हस कर बातें कर रहा था. लोगो के दिल जीत रहा ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (74)

: : प्रकरण - 74 : : यादों की सहेलगाह - प्रकरण 81 दूसरी बार मैं ओफिस तो. कृतिका के सिवा ओफिस में क़ोई नहीं आया था. उस ने मुझे देखा था फिर भी दरवाजा नहीं खोला था कुछ देर बाद केबिन का दरवाजा अर्ध खुल्ला रखकर उस ने मुझे सवाल किया था: "आप को किस का क्या काम हैं? " " संभव भारतीय! " " यहाँ ऐसा क़ोई नहीं हैं!" कहकर उस ने दरवाजा बंद करने का प्रयास किया था. तो मैंने उसे रोक लिया था. और ओफिस ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (75)

: : प्रकरण -75 : : ललिता पवार हमारी पड़ोस में रहने आई थी ओर गरिमा का किस्सा उस कानो तक पहुंच गया था. खुद मेरी मौसी ने उन्हें भड़काया था. " संभव से बचकर रहना. आप के घर में ज्यादा लड़कियां हैं. वह लड़की के पीछे पागल हो जाता हैं. "S यह सुनकर ललिता पवार सोच में पड़ गये थे, लेकिन उन्हों ने मौसी की बात को ज्यादा अहमियत नहीं दी थी. मैं उन के घर जाता ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 76)

: यादों की सहेलगाह - प्रकरण -83 ललिता पवार का अंतिम दौर चल रहा था. बिन हक का खाना उन का पेट मानो फट सा गया था. उन्हें कई बीमारियो ने अपनी गिरोह में लपेट लिया था. उन को खुद को एक लड़का था. जो कई सालो से बिस्तर में केवल सांसे गिन रहा था. वह मा बाप की गैर कानूनी तरीके से जमा की गई संपत्ति पर साप की भ्रान्ति बैठ गया था, लेकिन उस का क़ोई उपभोग कर नहीं पाया था. इस बात का तो क़ोई भी ...और पढ़े

78

यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (77)

: यादों की सहेलगाह - प्रकरण 84 स्नेहा मेरे बेटे की बहु थी. उस से ललिता पवार ही बल्कि बहुत से लोगो को समस्या थी. कुछ समय तक खुद तृषाली और आशुतोष ने भी उस का बहिष्कार किया था. इस बात से मुझे काफ़ी तकलीफ हुई थी. तृषाली ज़ब खुद उस स्थिति में नहीं आई थी, उस ने स्नेहा का स्वीकार नहीं किया था. कई साल वह स्नेहा से दूर रही थी. फिर अपने बेटे की शादी के समय उस को ब्रह्म ज्ञान हुआ था. और स्नेहा को अपने बेटे ...और पढ़े

79

यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 78)

यादों की सहेलगाह - प्रकरण 85 अब कुछ फ़िल्म और क्रिकेट के साथ टी वी धारावाहिक के साथ बची कुछ और बातें करते है. जैसा पहले बताया. आज के समय क़ोई भी निर्माता धारावाहिक ख़तम करने के बारे में सोचता नहीं हैं. कहानी कुछ भी हो, लाख दिलचस्प हो लेकिन उसे खलनायक और खलनायिका की साजिश के बलभूते सालोतक चलाकर अपनी तिजोरिया भरते रहते हैं. किस किस धारावाहिक का नाम ले. मेरी बात साबित करने के लिये मैंने पहले भी दो धारावाहिक का जिक्र कर ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (79)

: : प्रकरण -79 : : कुछ भी हो.. भगवान सदैव मुझे प्यार करने वाले लोगो से मिलाया है. करोना के आगमन के दौरान मैं फुटपाथ पर बैठकर घरेलू चीज वस्तु का धंधा करता था. उस दौरान साथ में कई औरते शाक भाजी, फूल - फल, श्रृंगार इत्यादि चीजों को बेचने का धंदा करती थी. उन सब को मैं अच्छी तरह से जानता था. मैंने उन का सन्मान अर्जित किया था. मैं जहाँ बैठता था उस की थोड़ी दुरी पर ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 80)

: : प्रकरण - 80 : : संजना के साथ भगवान ने मुझे दूसरा उपहार दिया था. उस का माया था. जिस के पति ने भी हमारे रिश्ते को तहेदिल से कबूल किया था. सचमुच प्यार के मुआमले में भगवान मुझ पर बड़ा मेहरबान था. माया सचमुच प्यार की अनमोल मिशाल थी. उस की दो संतान थी जो जवानी की दहलीज पर आकर ख़डी थी. लड़का चिनाई में काम करता. उस का पति का भी खुद का धंधा था. वह सोसायटी का सेक्रेटरी था. वह प्रभु का चुस्त भक्त था. ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई -( 81)

: : प्रकरण - 88 : : फिर भी गरिमा के प्रयास के जरिये मैंने उसे उस के NGO दाखिल किया था. जहाँ वह स्नेहा के परिचय में आया था. और उसे देखकर उस की सोच में कुछ बदलाव आने लगा था. लेकिन उस की अकड़ और अहम उस के आड़े आ रहे थे. उस की शादी नहीं हुई थी. उस वजह से दुनिया के सब से बडे सुख से वह अलिप्त हो गया था. यह एक ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (82)

: : प्रकरण - 82 : कृष्णा मेरी लाडो बेटी थी. तीनो वह मुझे सब से ज्यादा लाडली थी. उस के जन्म के समय भी मुझे काफ़ी कष्ट झेलने पड़े थे. डोक्टर की बातों ने मुझे हिला दिया था. " डिलीवरी नोर्मल नहीं होगी. दो में से किसी एक को बचाया जा सकता हैं... ऐसी स्थिति में हर क़ोई क्या चाहता हैं? आरती की यह तीसरी प्रसूति थी जो बारह साल के अंतराल के बाद हुई थी. हमारे नसीब कुछ अच्छे थे. भगवान ने दोनों ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (83)

: : प्रकरण - 83 : : करोना के आगमन के बाद मैं पर बैठकर काम करता था. सुबह चार घंटे कड़ी धुप में काम करता था. शाम को चार घंटे मच्छर त्रास सहन करता था. फिर भी जेब में मुश्किल से 50 रूपये भी जमा नहीं होते थे. घराक भी तरह तरह के आते थे. 20 रूपये की चीज पांच रूपये में मांगते थे. ऐसी परिस्थिति में भी मैंने तीन साल काम किया था, फिर हार कर बंद ...और पढ़े

85

यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (84)

: : प्रकरण 84 : : कई साल बाद दोबारा मुझे अपने पिताजी की तरह एसिडिटी का अटैक था. यह बीमारी मुझे भी विरासत में मिली थी. उस के लिये मेरी पास एक ही इलाज उपलब्ध था. ' इनो! ' वह लेने से मुझे जल्दी आराम हो जाता था. लेकिन इस बार कुछ ज्यादा दर्द हो रहा था. मेरे लिये आयुर्वेदिक एक ही राम बाण ईलाज था. जिस ने सालो पहले मुझे मौत के मुंह से छुड़वाया था, वह एक महिला थी.. उस के इलाज से ...और पढ़े

86

यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - ( 85)

-  यादों की सलेहगाह" - प्रकरण 92 नीला भी उस की जिंदगी के साथ जो था उसे भूला नहीं पा रही थी.. अपनी बेटी की शादी के दौरान उस की मौत हो गई थी. वह हादसा अक्सर अपनी आँखों के सामने मंडरा रहा था. गरिमा की NGO में उस ने स्नेहा को देखा था.. उसे स्नेहा को देखकर अपनी मृतक बेटी याद आ गई थी. उस की आवाज में भी उसे अपनी बेटी की आवाज का भास हुआ था. उस का पति को बहुत पहले उस का साथ छोड़कर चला गया था.. उस स्थिति ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - ( 86)

- : : प्रकरण 86 : : नीला उस की जिंदगी के साथ जो हुआ था उसे भूला नहीं पा रही थी.. अपनी बेटी की शादी के दौरान उस की मौत हो गई थी. वह हादसा अक्सर अपनी आँखों के सामने मंडरा रहा था. गरिमा की NGO में उस ने स्नेहा को देखा था.. उसे स्नेहा को देखकर अपनी मृतक बेटी याद आ गई थी. उस की आवाज में भी उसे अपनी बेटी की आवाज का भास हुआ था. उस का पति को बहुत पहले उस का ...और पढ़े

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (87)

( माया- मनोज दोस्ती की अनोखी मिशाल) : : प्रकरण : : औरउस ने संभव के नाम को लेकर बहुत बड़ी बात की थी. इस उपन्यास के नायक का नाम संभव हैं, वह एक प्रतीकात्मक हैं.. वह जो कुछ चाहे करने की क्षमता रखता था. वह ' पुष्पा इम्पोसिबल' धारावाहिक की तरह सब कुछ सही करने को सक्षम था, उस के लिये यह मुश्किल नहीं था. इस कहानी की जरिये उस ने बहुत सारी चीजों के बारे में लोगो को जानकारी दी हैं ...और पढ़े

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