यह कहानी बहुत समय पहले की है ... करीब चार सौ - पांच सौ साल पहले की ................ नेपाल के सरहद से सटा भारत में एक छोटा सा गाँव था विष्णुपुर । इसी गाँव के ठीक बीचोबीच बने कुएँ से एक लड़की पानी भर रही थी .... धूप से तप रहे बदन पर पुराने घिसे हुए कपड़े थे पर ऐसा रूप - लावण्य की देखकर ऐसा लगता था कि जैसे स्वर्ग से कोई देवकन्या धरती पर उतर आई हो ... चाॅंद सा मुखड़ा ... सूरज सा दमकता हुआ गोरा रंग ... सुरमई ऑंखें ... नाजुक गुलाब से होंठ ... लम्बे काले रेशम से बाल ... ईश्वर ने जैसे सम्पूर्ण प्रकृति से तिल तिल सौन्दर्य लेकर इस अतीव सुन्दरी की रचना की थी और इस अद्भुत रूप - लावण्य की स्वामिनी का नाम था ' रोहिणी ' । भगवान ने जितना अद्भुत रूप - लावण्य दिया था रोहिणी को, उतनी ही बुरी किस्मत दी थी।
किघकन्या - 1
यह कहानी बहुत समय पहले की है ... करीब चार सौ - पांच सौ साल पहले की ......................................नेपाल के से सटा भारत में एक छोटा सा गाँव था विष्णुपुर । इसी गाँव के ठीक बीचोबीच बने कुएँ से एक लड़की पानी भर रही थी .... धूप से तप रहे बदन पर पुराने घिसे हुए कपड़े थे पर ऐसा रूप - लावण्य की देखकर ऐसा लगता था कि जैसे स्वर्ग से कोई देवकन्या धरती पर उतर आई हो ... चाॅंद सा मुखड़ा ... सूरज सा दमकता हुआ गोरा रंग ... सुरमई ऑंखें ... नाजुक गुलाब से होंठ ... लम्बे काले ...और पढ़े
किघकन्या - 2
जैसे - जैसे रोहिणी के रूप - लावण्य का जादू टूटने लगा वैसे - वैसे हसीन रूमानी रातों का छूटने लगा और वीर सिंह का आततायी रूआब उसकी जगह लेने लगा। लेकिन रोहिणी बड़ी ही समझदार और संतोषी लड़की थी ... वो अपने जीवन में इतना कुछ देख - सुन - सह चुकी थी कि अब जैसा भी उसका जीवन था उसे ही अपना भाग्य मान प्रसन्न रहा करती थी। वीर सिंह का मोह उससे भले ही टूट गया हो पर वह अपना पत्नी धर्म पूरे लगन से निभाती थी। पहली किरण के उगते ही वो जाग जाती, सबसे ...और पढ़े
किघकन्या - 3
अमावस की घनघोर काली अॅंधेरी रात थी, रोहिणी ने इस रात को चुना हवेली से भागने के लिए ... रात उसने वही दुल्हन का लाल जोड़ा पहना जिसे पहनकर वो ससुराल आई थी। वो दबे पाँव हवेली से निकल गई लेकिन ज्यादा दूर तक नहीं जा पाई। इसे रोहिणी का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उस रात बड़ी ही तेज हवाएँ चल रहीं थीं जिसके कारण छज्जे में लटका लालटेन झनाक से जोर की आवाज करता हुआ टूट गया और वीर सिंह की नींद खुल गई। उसने शुरू में ध्यान नहीं दिया पर जल्दी ही उसे अहसास हो गया कि ...और पढ़े
किघकन्या - 4
कुछ दिन बाद कुछ लकड़हारे उसी घाटी में लकड़ियाँ काटने गए। वहाँ उनकी नजर जमीन से निकले हुए हाथ गई, हाथ में हड्डियां थीं ... मांस लगभग गल चुका था । यह खौफनाक दृश्य देखकर वे लकड़हारे डर गए , उनमें से एक जल्दी से भागकर गाँव में पहूँचा और गाँव वालों को जमा किया। सारा किस्सा सुनकर तुरंत गाँव वाले उसके साथ उस जगह पर चले आये। खड्डा खोदने पर रोहिणी की लाश मिल गई ... सिर्फ कंकाल बचा था। कंकाल पर जो गहने थे, उन्हें देखकर पता चल रहा था कि यह लाश किसी औरत की है। ...और पढ़े
किघकन्या - 5
कुछ दिनों में ही वीर सिंह का हाल भयावह हो गया था ... आॅंखें खुन सरीखी लाल ... कांपती ... आवाज धीमी, ऐसी मानों कोई फुसफुसा रहा हो मगर सांसों का स्वर बेहद तीव्र ... संपूर्ण शरीर में दर्द की लहर सी दौड़ती रहती थी ... अन्न खाया नहीं जाता था, जो कुछ जबरदस्ती खाता वो भी कै हो जाता था ... शरीर धीरे - धीरे कमजोर हो कर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था, जैसे कोई उसके शरीर का शक्ति चूस रहा हो ... वीर सिंह की जीवन शक्ति खत्म होती जा रही थी ..................बड़ी ठकुराइन समझ ...और पढ़े
किघकन्या - 6
अंधेरी रात थी ... सब ओर नीरवता छाई थी ... रात के अशुभ पक्षी चीत्कार कर रहे थे ... - कुत्ते अपने - अपने कर्कश स्वर में अशुभ का आभास कराते हुए चीख़ रहे थे। ऐसे डरावने माहौल में हवेली के पीछे बना एक छोटा सा दरवाजा धीरे से खुला, एक साये ने पैर दबा के हवेली में प्रवेश किया । यह घुॅंघरू थी - हवेली की मुख्य महराजिन की बेटी । किस्मत ने इसके साथ अजीब खेल खेला था, बाल विवाह के बाद गौना से पहले ही बेवा होने का कलंक उसके माथे पर लग गया था। बेवा ...और पढ़े