पौराणिक कथाओं में विष्णुभक्त प्रह्लाद की कथा का अत्यंत महत्त्व है। यह कथा अन्याय, अत्याचार एवं अभिमान पर न्याय, सदाचार और स्वाभिमान की जीत की शिक्षा देती है। यह कथा उस समय की है, जब संपूर्ण सृष्टि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु जैसे असुरों के आंतक से त्रस्त थी। चारों ओर आसुरी शक्तियों की प्रबलता थी। धर्म, कर्म और वेद, यज्ञ आदि की प्रतिष्ठा लगभग निष्प्राण हो चुकी थी। ऐसे विपरीत और गहन धार्मिक संकटकाल में भी प्रह्लाद जैसे भक्त की पावन भक्ति ने श्रीहरि को नृसिंह अवतार धारण करने हेतु प्रेरित किया।

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भक्त प्रह्लाद - 1

श्रीहरि का नरसिंह अवतारपौराणिक कथाओं में विष्णुभक्त प्रह्लाद की कथा का अत्यंत महत्त्व है। यह कथा अन्याय, अत्याचार एवं पर न्याय, सदाचार और स्वाभिमान की जीत की शिक्षा देती है। यह कथा उस समय की है, जब संपूर्ण सृष्टि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु जैसे असुरों के आंतक से त्रस्त थी। चारों ओर आसुरी शक्तियों की प्रबलता थी। धर्म, कर्म और वेद, यज्ञ आदि की प्रतिष्ठा लगभग निष्प्राण हो चुकी थी। ऐसे विपरीत और गहन धार्मिक संकटकाल में भी प्रह्लाद जैसे भक्त की पावन भक्ति ने श्रीहरि को नृसिंह अवतार धारण करने हेतु प्रेरित किया। भक्त प्रह्लाद की कथा का आरंभ ...और पढ़े

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भक्त प्रह्लाद - 2

हिरण्याक्ष का उत्थान एवं पतनजब से सृष्टि-चक्र आरंभ हुआ, तभी से पुण्य व पाप का इतिहास-चक्र भी अपने अंदर रहस्य समेटे हुए निरंतर अबाध गति से चलायमान है। जिस प्रकार अच्छाई और बुराई आरंभिक काल से विद्यमान हैं, उसी प्रकार देव और असुर भी आदिकाल से आपस में संघर्ष करते चले आए हैं।देवों और असुरों के पिता भगवान् कश्यप थे। उनकी अनेक पत्नियाँ थीं, जिनमें अदिति से देवों ने और दिति से असुरों ने जन्म लिया।सतयुग का समय था। भूमंडल में पुण्य का प्रताप अधिक और पाप का प्रकोप कम था। चहुँओर शांति और समृद्धि का साम्राज्य था। प्राणियों ...और पढ़े

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भक्त प्रह्लाद - 3

प्रतिशोध की ज्वालाहिरण्याक्ष से राजपाट की बागडोर मिलने के पश्चात् हिरण्यकशिपु अत्यंत अहंकारी और अत्याचारी हो गया था। वह जीवन व्यतीत करने लगा था। जब उसे पता चलता कि अमुक स्थान पर लोग देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं तो वह उन्हें अपने सैनिकों को मृत्युदंड देने की आज्ञा दे देता। इस प्रकार उसकी अत्याचारी नीतियाँ जोर पकड़ने लगी थीं। उसने अनेक गाँवों को वीरान बना दिया था।हिरण्यकशिपु के राज्य में शैवमत के लोगों को हर प्रकार की स्वतंत्रता प्राप्त थी। जहाँ वैष्णवों का पतन हो चला था, वहीं शैवों का उत्थान अपनी चरम सीमा पर पहुँच रहा था। हिरण्यकशिपु ...और पढ़े

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भक्त प्रह्लाद - 4

अजेय वरदान की प्राप्तिअसुर नगरी में जो भी घटित हुआ, उससे अनभिज्ञ असुरराज हिरण्यकशिपु अपनी तपस्या में लीन था। करते-करते हिरण्यकशिपु को कई वर्ष बीत गए, लेकिन अभी तक उसे इच्छित परिणाम की प्राप्ति नहीं हुई थी। उसका शरीर अत्यंत कमजोर हो गया था, भुख-प्यास सब लुप्तप्रायः हो गई थी, लेकिन अभी तक वह इच्छित फल की प्राप्ति से वंचित था। उसके मन में यदा-कदा यह विचार भी आता कि वह तपस्या छोड़कर वापस लौट चले, लेकिन अगले ही क्षण उसके अंतर्मन से आवाज निकलती, ‘नहीं असुरराज, नहीं। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए तुम इतने वर्षों से कठोर ...और पढ़े

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भक्त प्रह्लाद - 5

देवताओं के साथ युद्धअपने अंतःपुर दुर्ग और राज्य की विनाशलीला देखकर हिरण्यकशिपु क्रोध के मारे फुफकार उठा। रानी कयाधू अंतःपुर में न होने की बात उसे सबसे अधिक चिंतित कर रही थी। वह इसी बारे में सोच-विचार कर ही रहा था कि उसे कोई अपनी ओर आता दिखाई दिया। जब वह निकट आ गया तो हिरण्यकशिपु के मुख से सहसा ही निकल पड़ा, “सेनापति तुम !”“हाँ महाराज!” सेनापति इल्वल ने अपना मस्तक झुकाते हुए कहा।“यह सब क्या है, इल्वल ?” सेनापति को देखते ही हिरण्यकशिपु के धैर्य का बाँध जैसे टूट गया, “असुरराज के दुर्ग की दुर्दशा और अंतःपुर ...और पढ़े

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भक्त प्रह्लाद - 6

विष्णु भक्त प्रह्लाद का जन्मरानी कयाधू ने अब तक तीन पुत्रों को जन्म दिया था, जिनके नाम क्रमशः आह्लाद, और संह्लाद थे। बाद में देवर्षि के आश्रम में कयाधू ने अपने सबसे छोटे पुत्र को जन्म दिया, जिसका नामकरण प्रह्लाद के रूप में किया गया।असुल-कुल में प्रह्लाद का जन्म लेना असुरों के लिए एक बड़ी दुर्घटना सिद्ध हुई। प्रह्लाद का जन्म असुरों के लिए एक ऐसी अनहोनी थी, जिसमें परमेश्वर का एक बड़ा रहस्य छिपा हुआ था। जिस हिरण्यकश्यपु का हृदय विष्णु के प्रति वैर-द्वेष से भरा हुआ था, उसी के यहाँ विष्णु भक्त प्रह्लाद का जन्म हुआ। यह ...और पढ़े

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भक्त प्रह्लाद - 7

गुरुकुल की ओर गमनसमय का चक्र बिना किसी अवरोध के निरंतर अपनी धुरी पर घूमता रहता है। उसे किसी प्रतीक्षा नहीं होती अपितु हर कोई उसी की प्रतीक्षा करता है। संसार में होने वाला परिवर्तन प्रह्लाद को कोई बड़ा आश्चर्य ही दिखाई देता। वे उसके रहस्य को समझने का प्रयास करते और फिर कुछ समझकर और कुछ न समझते हुए व्याकुल हो उठते। उनकी आयु पाँच वर्ष हो चुकी थी, किंतु इतनी छोटी सी आयु में वे सार और असार के ज्ञान से परिचित हो गये थे। संसार में जन्म लेने का उद्देश्य धीरे-धीरे उनकी समझ में आने लगा ...और पढ़े

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