"किसी अनकहे सच का पता लगाना ठीक उतना ही मुश्किल है, जितना आग की लपटों से किसी ज़िंदा इंसान को निकाल लाना..." एक ऐसे ही अनकहे सच की तलाश में था राजू। उसे खुद मालूम नहीं था कि वह किस राह पर चल रहा है। वह तो बस अपने ही विचारों में खोया हुआ था। उसे रह-रहकर लगता था कि कुछ है जो पीछे छूट रहा है—कोई ऐसी बात जो हवा में तैर रही है, पर उसकी पकड़ से बाहर है।

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अनकहा सच ( भाग - 1)

"अनकहा सच____""किसी अनकहे सच का पता लगाना ठीक उतना ही मुश्किल है, जितना आग की लपटों से किसी ज़िंदा को निकाल लाना..."एक ऐसे ही अनकहे सच की तलाश में था राजू।उसे खुद मालूम नहीं था कि वह किस राह पर चल रहा है। वह तो बस अपने ही विचारों में खोया हुआ था। उसे रह-रहकर लगता था कि कुछ है जो पीछे छूट रहा है—कोई ऐसी बात जो हवा में तैर रही है, पर उसकी पकड़ से बाहर है।लेकिन हकीकत में देखा जाए तो ऐसा कुछ था ही नहीं। उसके सामने सब कुछ साफ था, बिल्कुल खुली किताब की ...और पढ़े

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अनकहा सच ( भाग - 2)

"अनकहा सच____"फोन वाली उस बात के बाद भी ऐसे ही कुछ दिन बीतते चले गए...एक दिन कोचिंग से लौटते राजू ने घर जाने के लिए एक ऑटो लिया। ऑटो में उसकी बगल में आकर एक दूसरा शख्स बैठा।ऑटो में बैठे उस शख्स से राजू की हल्की-फुल्की बातचीत होने लगी। बातों ही बातों में दोनों को पता चला कि वे दोनों तो पड़ोसी गाँव से ही हैं! दोनों यह जानकर बेहद खुश हुए कि इस अजनबी शहर की भीड़ में कोई तो अपने इलाके का मिला—पड़ोसी ही सही, पर गाँव का तो है।बस फिर क्या था, कोचिंग से लौटते वक्त ...और पढ़े

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अनकहा सच (भाग - 3)

अनकहा सच___धीरे-धीरे हितेश और राजू की दोस्ती बहुत गहरी होती जा रही थी। दोनों इस अजनबी शहर में अपनी-अपनी जी रहे थे, पर हर दिन का उनका एक-दूसरे का साथ उनके सफ़र को आसान बना रहा था।ऐसे ही बातों-बातों में एक दिन हितेश ने राजू से पूछ ही लिया, "अरे यार, तू कभी गाँव नहीं जाता क्या? मतलब... मैंने तुझे हमेशा यही देखा हैं, कभी घर जाते नहीं देखा।"हितेश का यह अचानक पूछा गया सवाल सुनकर राजू थोड़ा घबरा गया। उसने खुद को संभालते हुए कहा, "जाता तो हूँ... शायद तेरा ध्यान नहीं रहा होगा।"हितेश ने थोड़ा सोचकर कहा, ...और पढ़े

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