एक अनजाना सा इश्क

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लखनऊ, नवाबों का शहर। शाम के सात बज रहे थे। हजरतगंज की रौशनी, चौक की चाट की खुशबू और गोमती नगर की ठंडी हवा, सब कुछ रोज की तरह ही था। पर आयशा के लिए आज कुछ भी रोज जैसा नहीं था। आयशा सिद्दीकी, इक्कीस साल की एक सीधी-सादी लड़की। लखनऊ यूनिवर्सिटी में बी.ए. फाइनल ईयर की छात्रा। पापा रफीक अहमद एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। माँ घर संभालती थीं और एक छोटा भाई अमन था। आयशा को किताबें पढ़ना और डायरी लिखना बहुत पसंद था। वह अपनी डायरी में रोज कहानियाँ लिखती थी, पर उसकी अपनी जिंदगी की कहानी अभी अधूरी थी।

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एक अनजाना सा इश्क - भाग 1

लखनऊ, नवाबों का शहर। शाम के सात बज रहे थे। हजरतगंज की रौशनी, चौक की चाट की खुशबू और नगर की ठंडी हवा, सब कुछ रोज की तरह ही था। पर आयशा के लिए आज कुछ भी रोज जैसा नहीं था।आयशा सिद्दीकी, इक्कीस साल की एक सीधी-सादी लड़की। लखनऊ यूनिवर्सिटी में बी.ए. फाइनल ईयर की छात्रा। पापा रफीक अहमद एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। माँ घर संभालती थीं और एक छोटा भाई अमन था। आयशा को किताबें पढ़ना और डायरी लिखना बहुत पसंद था। वह अपनी डायरी में रोज कहानियाँ लिखती थी, पर उसकी अपनी जिंदगी की कहानी ...और पढ़े

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एक अनजाना सा इश्क - भाग 2

पापा के मुंह से "हां बेटा मजबूरी थी" सुनते ही आयशा का दिल टूट गया।वो भागकर हॉस्पिटल के कॉरिडोर आ गई। पीछे अव्यांश खड़ा था। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि दर्द था।"आयशा, सुनो तो...""मत आओ मेरे पास! तुमने सुना ना तुम्हारे पापा ने क्या कहा? मेरे पापा ने तुम्हारी कंपनी को धोखा दिया! अब तो तुम भी मुझे धोखेबाज कहोगे!"अव्यांश ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। "मैं किसी के कहने पर प्यार नहीं करता, अपने दिल से करता हूँ। मुझे फर्क नहीं पड़ता तुम्हारे पापा ने क्या किया।"तभी अव्यांश के पापा, राजवीर राठौर वहां आ गए।"अव्यांश, चलो यहाँ ...और पढ़े

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एक अनजाना सा इश्क - भाग 3

पिछले भाग का सार - आराधना अपने पिता के कर्ज़ की वजह से रेयांश की नफरत भरी दुनिया में गई थी। रेयांश ने सबके सामने कहा था - तुम सिर्फ मेरी हो। और उस रात उसने आराधना को अपनी पार्टी में अपनी पत्नी कह कर सबको चौंका दिया था।अब आगे...रात के बारह बज चुके थे। बगीचे वाला घर खाली हो चुका था। सारे मेहमान जा चुके थे।आराधना अब भी उसी लाल साड़ी में बैठी थी। उसके हाथ काँप रहे थे। रेयांश उसके सामने खड़ा था, उसकी आँखों में गुस्सा और कुछ और भी था जो आराधना समझ नहीं पा ...और पढ़े

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एक अनजाना सा इश्क - भाग 4

एकपिछले भाग का सार - रेयांश ने आराधना के पिता को धमकाया और आराधना के सामने शर्त रखी - शाम मंदिर में सबके सामने मेरे नाम का सिंदूर भरना होगा।अब आगे...शाम के छह बजे थे।आराधना उसी लाल साड़ी में तैयार खड़ी थी जो रेयांश ने उसे दी थी। उसकी माँग सूनी थी। हाथ में सिंदूर की डिबिया नहीं, बल्कि डर था।नीचे रेयांश सफ़ेद कुर्ते में इंतज़ार कर रहा था। उसके साथ दो गार्ड भी थे।"चलो," रेयांश ने कहा।आराधना ने धीरे से कहा, "रेयांश, प्लीज़... मंदिर में सबके सामने मत करो। ये बहुत बड़ी बात है।"रेयांश उसके पास आया, उसकी ...और पढ़े

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एक अनजाना सा इश्क - भाग 5

आराध्या और रेयांश का अधूरा मिलन। परिवार वालों ने दोनों की बात सुनकर उनका विवाह तय कर दिया था। में ही छोटा सा विवाह हुआ।पर विवाह के दिन ही एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरी रात को बदल दिया।विवाह के बाद जब आराध्या ससुराल आई तो रेयांश के पिताजी ने कहा, "रेयांश, तुमने भोपाल में नौकरी छोड़ दी, यहाँ शिक्षक की नौकरी करोगे, पर घर की जिम्मेदारी कैसे संभलेगी?"रेयांश कुछ न बोला। आराध्या को लगा कि रेयांश फिर से अपने मन की बात उससे छुपा रहा है।रात हुई। कमरे को सजाया गया था। फूल, दीपक, सुगंध। बाहर सब लोग ...और पढ़े

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एक अनजाना सा इश्क - भाग 6

वह रात जो सुहागरात नहीं, सज़ा की रात बन गई थी, धीरे-धीरे सीख की रात बन गई थी। बाहर हो रही थी, अंदर दो हृदय एक दूसरे को समझने का प्रयत्न कर रहे थे। न कोई सजावट काम आई थी, न कोई फूल। काम आया था तो केवल एक हाथ का दूसरे हाथ को थाम लेना।रात भर दोनों सोए नहीं। उसी मेज पर बैठे रहे जिस पर रेयांश की किताब रखी थी। आराध्या लाल जोड़े में थी, पर अब उसे जोड़े का भार नहीं लग रहा था। रेयांश सफेद कुर्ते में था, पर अब उसके चेहरे पर अपराध बोध ...और पढ़े

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