शाम के ढलते ही जब आँगन में पुरानी साइकिल की वही जानी-पहचानी चैन की आवाज़ गूँजती, तो पूरे घर को बिना घड़ी देखे पता चल जाता कि पिता जी घर लौट आए हैं। रामेश्वर जी एक छोटे से कस्बे के दफ़्तर में क्लर्क की मामूली सी नौकरी करते थे। दिन भर की कड़ी धूप, काम का मानसिक तनाव और चेहरे पर पसीने की बूंदें... लेकिन घर के दरवाज़े पर कदम रखते ही उनके चेहरे पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान आ जाती, मानो दिन भर की सारी थकान पल भर में गायब हो गई हो। वे अपने हर दर्द को दरवाज़े के बाहर ही छोड़ आते थे ताकि घर के अंदर सिर्फ खुशियाँ प्रवेश कर सकें।
पिता जी - भाग 1
शाम के ढलते ही जब आँगन में पुरानी साइकिल की वही जानी-पहचानी चैन की आवाज़ गूँजती, तो पूरे घर बिना घड़ी देखे पता चल जाता कि पिता जी घर लौट आए हैं। रामेश्वर जी एक छोटे से कस्बे के दफ़्तर में क्लर्क की मामूली सी नौकरी करते थे। दिन भर की कड़ी धूप, काम का मानसिक तनाव और चेहरे पर पसीने की बूंदें... लेकिन घर के दरवाज़े पर कदम रखते ही उनके चेहरे पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान आ जाती, मानो दिन भर की सारी थकान पल भर में गायब हो गई हो। वे अपने हर दर्द को ...और पढ़े
पिता जी - भाग 2
"पिता जी ने अपनी ज़िंदगी की आखिरी जमापूंजी भी दांव पर लगा दी थी, लेकिन क्या रोशनी उनका यह कभी उतार पाएगी?रामेश्वर जी के उस अटूट भरोसे और कुर्बानियों ने रोशनी के अंदर एक नई ऊर्जा भर दी थी। उसने खुद से वादा किया कि पिता जी के पसीने की एक-एक बूंद की कीमत वह अपनी सफलता से चुकाएगी। शहर के उस कोचिंग संस्थान में रोशनी की पढ़ाई शुरू हुई। हर दिन भोर के 4 बजे उठना, 18 घंटे की कड़ी मेहनत और किताबों के बीच खुद को झोंक देना ही अब उसकी दिनचर्या बन चुकी थी। न कोई ...और पढ़े