शाम के लगभग सात बज रहे थे। सूरज पहाड़ियों के पीछे छिप चुका था और गाँव के चारों ओर अँधेरा धीरे-धीरे फैल रहा था। हवा में हल्की ठंडक थी और दूर जंगल से झींगुरों की आवाजें लगातार सुनाई दे रही थीं। गाँव के आखिरी छोर पर रहने वाला आर्यन अपनी साइकिल लेकर घर लौट रहा था। रास्ता सुनसान था। चारों तरफ पेड़ों की लंबी परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं। अचानक उसे जंगल की तरफ से किसी के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी।
रहस्यमयी जंगल का दरवाज़ा - भाग 1
रहस्यमयी जंगल का दरवाज़ा — भाग 1लेखक: संदीप बिन्दशाम के लगभग सात बज रहे थे। सूरज पहाड़ियों के पीछे चुका था और गाँव के चारों ओर अँधेरा धीरे-धीरे फैल रहा था। हवा में हल्की ठंडक थी और दूर जंगल से झींगुरों की आवाजें लगातार सुनाई दे रही थीं।गाँव के आखिरी छोर पर रहने वाला आर्यन अपनी साइकिल लेकर घर लौट रहा था। रास्ता सुनसान था। चारों तरफ पेड़ों की लंबी परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।अचानक उसे जंगल की तरफ से किसी के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी।“बचाओ... कोई है?”आर्यन ने तुरंत साइकिल रोक दी।उसने ध्यान से सुना।कुछ क्षण तक ...और पढ़े
रहस्यमयी जंगल का दरवाज़ा - भाग 2
रहस्यमयी जंगल का दरवाज़ा — भाग 2लेखक: संदीप बिन्दआर्यन कुछ क्षण तक उस पत्थर के दरवाज़े के सामने खड़ा उसके कानों में अभी भी वही आवाज गूँज रही थी—“आर्यन... दरवाज़ा मत खोलना।”उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।“अगर अंदर मेरे पिता हैं, तो मैं उन्हें छोड़कर नहीं जा सकता।”आर्यन ने दरवाज़े को फिर से छूने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया।तभी उसके साथ आया रहस्यमयी आदमी अचानक चिल्लाया—“रुको!”आर्यन ने पीछे मुड़कर देखा।“आप मुझे रोक क्यों रहे हैं?”आदमी ने धीमी आवाज में कहा—“क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे यही जिम्मेदारी दी थी कि मैं तुम्हें उस दरवाज़े से दूर रखूँ।”आर्यन हैरान ...और पढ़े