"कुछ मुलाकातें ज़िंदगी बदल देती हैं... और मेरी ज़िंदगी की वह मुलाकात एक शादी के समारोह में हुई थी।" मैं उससे पहली बार एक शादी के समारोह में मिली थी। वह लड़के वालों की तरफ़ से आया था और मैं भी अपने परिवार के साथ लड़के वालों की तरफ़ से ही वहाँ पहुँची थी। शादी का हॉल बहुत ही खूबसूरती से सजाया गया था। चारों ओर रंग-बिरंगी रोशनियाँ जगमगा रही थीं। फूलों की खुशबू पूरे माहौल को और भी सुहाना बना रही थी। हर कोई अपने रिश्तेदारों से मिल रहा था, हँसी-मज़ाक कर रहा था और शादी की खुशियों में शामिल था।
एक नज़र, एक कहानी - 1
"कुछ मुलाकातें ज़िंदगी बदल देती हैं... और मेरी ज़िंदगी की वह मुलाकात एक शादी के समारोह में हुई थी।"मैं पहली बार एक शादी के समारोह में मिली थी। वह लड़के वालों की तरफ़ से आया था और मैं भी अपने परिवार के साथ लड़के वालों की तरफ़ से ही वहाँ पहुँची थी। शादी का हॉल बहुत ही खूबसूरती से सजाया गया था। चारों ओर रंग-बिरंगी रोशनियाँ जगमगा रही थीं। फूलों की खुशबू पूरे माहौल को और भी सुहाना बना रही थी। हर कोई अपने रिश्तेदारों से मिल रहा था, हँसी-मज़ाक कर रहा था और शादी की खुशियों में शामिल ...और पढ़े
एक नज़र, एक कहानी - 2
भाग 2 – फिर वही मुस्कानशादी खत्म हो गई थी और हम वहाँ से निकल गए। उसके बाद हम कुलदेवी के मंदिर गए, जो शादी के हॉल से कुछ ही दूरी पर था। मंदिर पहुँचते ही हमने माता जी के दर्शन किए, प्रसाद लिया और कुछ देर वहीं शांति से बैठे रहे। मंदिर का वातावरण इतना शांत था कि मन को एक अलग ही सुकून मिल रहा था।लेकिन मेरे दिल में सिर्फ एक ही बात चल रही थी।मैंने आँखें बंद कीं और पूरे दिल से प्रार्थना की।"माता जी... अगर वह मेरी किस्मत में है, तो बस एक बार फिर ...और पढ़े
एक नज़र, एक कहानी - 3
भाग 3 – खामोश नज़रेंउसकी मुस्कान देखने के बाद भी मेरा दिल अब तक शांत नहीं हुआ था। मुझे भी यकीन नहीं हो रहा था कि माताजी ने मेरी प्रार्थना इतनी जल्दी सुन ली। शायद इसलिए कहते हैं कि अगर दुआ सच्चे दिल से माँगी जाए, तो उसका जवाब किसी न किसी रूप में ज़रूर मिलता है।कुछ देर बाद हम सब घर के अंदर चले गए। वहाँ सभी रिश्तेदार एक-दूसरे से मिल रहे थे। घर मेहमानों से भरा हुआ था। मम्मी, मामा और बाकी सब लोग बातचीत में इतने व्यस्त हो गए कि किसी को समय का पता ही ...और पढ़े
एक नज़र, एक कहानी - 4
मैं अभी भी वहीं बैठी थी। मन तो बाहर जाने का था, लेकिन मैंने खुद को रोक लिया था। नहीं क्यों, मुझे लगा कि बिना किसी वजह के उसके पीछे जाना सही नहीं होगा। इसलिए मैं चुपचाप अपनी जगह पर बैठी रही।कुछ ही देर बाद मेरी कज़िन बोली, "चल, बाहर चलते हैं।"इस बार मैं भी उसके साथ उठ गई।जैसे ही हम बाहर पहुँचे, देखा कि मेरे मामा, मामी और परिवार के कुछ बड़े लोग बाहर खड़े होकर बातें कर रहे थे। माहौल बिल्कुल हल्का-फुल्का था। सबके चेहरों पर मुस्कान थी।उसी समय मामा ने हम सब बच्चों को देखकर मुस्कुराते ...और पढ़े