शहर की साफ और चौडी सडक पर कबीर मेहरा की नई' मेबैक' किसी काले चीते की तरह हवा से बातें कर रही थी. कबीर मेहरा—शहर का वो नाम जिससे बिजनेस के गलियारों में सन्नाटा पसर जाता था. उसके लिए वक्त ही खुदा था और उसे बर्बाद करना कबीर की डिक्शनरी में पाप था. अपनी गाडी की पिछली सीट पर बैठा कबीर अपने आईपैड पर कुछ ग्राफ देख रहा था, पर उसका ध्यान बार- बार घडी की सुइयों पर जा रहा था. उसे आज तीन दिन की एक बेहद जरूरी इंटरनेशनल बिजनेस ट्रिप के लिए निकलना था। थोडा और तेज चलाओ, मुझे ठीक बीस मिनट में एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में होना है।.

Full Novel

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Ishq ka Ittefaq - 1

शहर की साफ और चौडी सडक पर कबीर मेहरा की नई' मेबैक' किसी काले चीते की तरह हवा से कर रही थी. कबीर मेहरा—शहर का वो नाम जिससे बिजनेस के गलियारों में सन्नाटा पसर जाता था. उसके लिए वक्त ही खुदा था और उसे बर्बाद करना कबीर की डिक्शनरी में पाप था. अपनी गाडी की पिछली सीट पर बैठा कबीर अपने आईपैड पर कुछ ग्राफ देख रहा था, पर उसका ध्यान बार- बार घडी की सुइयों पर जा रहा था. उसे आज तीन दिन की एक बेहद जरूरी इंटरनेशनल बिजनेस ट्रिप के लिए निकलना था। थोडा और तेज चलाओ, ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 2

दिल्ली के सबसे महंगे इलाके में खडा आलीशान मेहरा मेंशन. कबीर मेहरा की आँखों में सुलगता बदला और सिया वो स्वाभिमान जो किसी के आगे झुकने को तैयार नहीं था. कबीर ने सिया को इस घर से भगाने के लिए जो पहली चाल चली, क्या सिया उसमें फंस जाएगी? या फिर कबीर का ये दांव उसी पर उल्टा पडने वाला है?दिल थाम कर बैठिए, क्योंकि नफरत और जिद की ये जंग अब और भी खतरनाक मोड लेने वाली है!दिल्ली की उमस भरी रात आज कुछ ज्यादा ही भारी लग रही थी।.हवा में एक अजीब सी घुटन थी, ठीक वैसी ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 3

कॉरिडोर का वो अंधेरा कोना अब भी कबीर मेहरा की भारी साँसों से सुलग रहा था.सिया तो अपने सधे कदमों से गेस्ट- हाउस की तरफ जा चुकी थी, लेकिन उसकी आखिरी बात—" देखते हैं पहले किसका गुरूर टूटता है" —कबीर के कानों में किसी पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थी.कबीर ने गुस्से में अपने हाथ की मुट्ठी भींची और पास लगी नक्काशीदार दीवार पर दे मारी. दर्द की एक तीखी लहर उसकी उंगलियों से होती हुई कंधे तक गई, पर उसका ध्यान अपनी हथेलियों के दर्द पर नहीं, बल्कि दिल के उस कोने पर था जो सिया ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 4

रात की वो खौफनाक आंधी तो थम चुकी थी, पर कबीर के स्पर्श की जो थरथराहट सिया के बदन उतरी थी, वो सुबह होने तक उसके जहन से गायब नहीं हुई थी. गेस्ट- हाउस के उस छोटे से कमरे में सुबह की ताजी धूप खिडकी से छनकर सीधे सिया के चेहरे पर पड रही थी.उसने अपनी भारी आँखें खोलीं और सबसे पहले सामने टेबल पर रखे लैपटॉप की तरफ देखा. स्क्रीन पर हॉस्पिटल सारा पुराना रिकॉर्ड एक्सेल शीट में एकदम सलीके से दर्ज था. रात भर बिना सोए, आँखों में चुभन और पीठ के दर्द को झेलते हुए उसने ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 5

सिया की आँखों से निकले वो गर्म आंसू कबीर के हाथ पर गिरे, तो उसे ऐसा लगा जैसे किसी दहकते हुए अंगारे उसकी हथेली पर रख दिए हों. कमरे में पुलिस बुलाने की बात पर सन्नाटा ऐसा पसरा थाकि बाहर चल रही हवा की सरसराहट भी साफ सुनाई दे रही थी. विक्रम अपनी चाल पर मन ही मन इतना खुश था कि उसकी बाछें खिली जा रही थीं, पर वो अपनी इस कमीनी मुस्कान को कबीर के सामने छुपाने की पूरी कोशिश कर रहा था. कबीर भाई, अब सोच क्या रहे हो?इस चोर लडकी को पुलिस के हवाले करो, ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 6

विक्रम के जेल जाने के बाद मेहरा मेंशन के गलियारों में सन्नाटा तो पसर गया था, पर वह सन्नाटा बडे तूफान के आने की आहट था. काम्या मेहरा अपने कमरे की बालकनी में खडी ठंडी हवा के बीच भी गुस्से से तप रही थीं. उनका इकलौता बेटा पुलिस की सलाखों के पीछे था, और कबीर. कबीर उस मामूली फिजियोथैरेपिस्ट के सामने नंगे पैर खडा होकर अपनी गलती मान चुका था ।.एक मामूली डॉक्टर की छोरी ने मेरे बेटे को जेल भिजवा दिया और कबीर उसके आगे भीगी बिल्ली बन गया? नहीं. यह काम्या मेहरा इतनी आसानी से हार नहीं ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 7

मेहरा मेंशन के लिविंग रूम में सन्नाटा इतना भारी था कि वहां खड़ी पुरानी घड़ी के पेंडुलम की आवाज किसी हथौड़े की तरह कान में बज रही थी। कबीर अपने सोफे पर बैठा था, उसके पैर मेज पर थे और आंखों में वो खौफनाक चमक थी जो सिर्फ तब आती थी जब कोई उसके साम्राज्य में सेंध लगाने की हिम्मत करता था।उसके सामने सिक्योरिटी हेड शर्मा खड़ा पसीने से नहा रहा था। शर्मा, मैंने तुमसे सिर्फ दस मिनट मांगे थे। अब आधा घंटा होने को आया है। फुटेज कहाँ है? कबीर की आवाज इतनी धीमी और ठंडी थी कि ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 8

मेहरा मेंशन की सुबह आज कुछ ज्यादा ही हलचल भरी थी. गायत्री दादी अब बिना सहारे के हॉल तक लगी थीं, और इसका पूरा श्रेय सिया की उस कडी मेहनत और दिन- रात की थेरेपी को जाता था. बलराज दादाजी के चेहरे पर बरसों बाद एक सुकून वाली मुस्कान थी,पर इस सुकून के नीचे एक बहुत बडी आग सुलग रही थी. काम्या बुआ, जो सुबह से ही घर से गायब थीं, वो किसी पार्टी की शॉपिंग करने नहीं, बल्कि सिया की जडों को खोदने निकली थीं. उन्हें यकीन था कि इस मासूम चेहरे के पीछे कोई न कोई काला ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 9

मेहरा मेंशन की सुबह आज किसी भारी पत्थर की तरह उगी थी. सूरज की किरणें खिडकियों से छनकर अंदर आ रही थीं, लेकिन घर के माहौल में जो एक चमक हुआ करती थी, वो गायब थी. कबीर अपने कमरे की बालकनी में खडा नीचे बगीचे को देख रहा था. कल रात की उस पार्टी की गूँज अब भी उसके कानों में शोर मचा रही थी.कबीर के चेहरे पर आज वो पुराना आत्मविश्वास नहीं था, बल्कि एक अजीब सी कशमकश थी. उसका मन उसे बार- बार कह रहा था कि उसने गलत किया, पर उसका ईगो, उसका घमंड अब भी ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 10

लखनऊ की नवाबी शाम अपनी पूरी रंगत में थी, पर कबीर मेहरा के लिए इस शहर की हर आवाज शोर की तरह थी. दिल्ली की बडी- बडी सडकों पर राज करने वाला कबीर आज चौक की उन संकरी और बदबूदार गलियों में खुद को बेबस महसूस कर रहा था. उसके महंगे जूतों पर लखनऊ की धूल जम चुकी थी और माथे पर पसीने की बूंदें, पर उसकी नजरें सिर्फ एक बोर्ड ढूँढ रही थीं—' सेवा सदन' कबीर यहाँ किसी प्यार की तलाश में नहीं आया था, कम से कम वो खुद को तो यही समझा रहा था.उसके आने की ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 11

रात के दो बज रहे थे जब कबीर की काली एसयूवी मेहरा मेंशन के भारी गेट को खोलती हुई दाखिल हुई. हेडलाइट्स की तेज रोशनी में सफेद गुलाब के पौधे थरथरा रहे थे, मानो वो भी इस नई हलचल को महसूस कर रहे हों. कबीर ने गाडी का इंजन बंद किया, पर उसका हाथ स्टीयरिंग व्हील पर ही जमा रहा. उसके बगल वाली सीट पर सिया बैठी थी, जिसकी नजरें बाहर अंधेरे में कहीं खोई हुई थीं. पूरे रास्ते दोनों के बीच एक शब्द का भी लेन- देन नहीं हुआ था. कबीर ने बिना सिया की तरफ देखे, ठंडी ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 12

मेहरा मेंशन की सुबह आज कुछ ज्यादा ही भारी थी. सूरज की रोशनी खिडकियों से अंदर तो आ रही पर घर के कोनों में पसरी कडवाहट को दूर नहीं कर पा रही थी. सिया सुबह पाँच बजे ही उठ गई थी. उसने अपनी साधारण सी सूती साडी पहनी, बालों का ढीला सा जूडा बनाया और सीधे गायत्री दादी के कमरे की तरफ बढ गई.उसके लिए ये घर अब एक वर्क- प्लेस (काम की जगह) से ज्यादा कुछ नहीं था. दादी की जाच करने के बाद जब सिया रसोई की तरफ बढी, तो उसका सामना काम्या बुआ से हुआ. बुआ ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 13

मेहरा मेंशन की रात की उस खामोश बातचीत के बाद, अगली सुबह का सूरज कुछ नई उलझनों के साथ कबीर रात भर सो नहीं पाया था. उसे बार- बार सिया की वो बातें याद आ रही थीं—" बदलना आसान नहीं होता कबीर मेहरा। उसने आज तक खुद को एक चट्टान की तरह समझा था, जिसे कोई हिला नहीं सकता, पर सिया की सादगी उस चट्टान में दरारें पैदा कर रही थी.कबीर सुबह जल्दी तैयार होकर नीचे आया. हॉल में सन्नाटा था, पर रसोई से बर्तनों के टकराने की धीमी आवाज आ रही थी. वो अनजाने में ही रसोई की ...और पढ़े

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Ishq ka Ittefaq - 14

मेहरा मेंशन की उन आलीशान और ठंडी दीवारों के पीछे छिपे रहस्यों का सबसे भयावह अध्याय उस रात फार्महाउस खुलना था. कबीर मेहरा, जिसे लगता था कि वह दुनिया के हर इंसान की फितरत अपनी उंगलियों के पोरों से पढ सकता है, आज खुद अपनी ही बनाई गई धारणाओं के चक्रव्यूह में फंसा हुआ था. उसकी काली एसयूवी जब फार्महाउस के अंधेरे अहाते में रुकी, तो सन्नाटा इतना गहरा था कि टायरों की रगड भी किसी चीख जैसी सुनाई दे रही थी. गाडी के भीतर की हवा एसी की वजह से बर्फीली थी, लेकिन कबीर और सिया के बीच ...और पढ़े

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