उत्तर प्रदेश की वो सर्द रात और दिल में सुलगती नफरत... इकबाल राज के लिए अब अपना कहने को कुछ भी नहीं बचा था। सगी पत्नी के धोखे ने उसे रातों-रात बेघर और 'लावारिस' कर दिया। शहर छूटा, सुकून छूटा और इकबाल दर-दर भटकता हुआ एक अनजान गाँव पहुँचा, जो उसके भाई का ससुराल था। वहां उसका कोई अपना नहीं था, बस बेबसी थी।गाँव की सरहद पर इकबाल की मुलाकात उस मंजर से हुई जिसने उसकी नफरत को मोहब्बत में बदल दिया। जुबैदा—हाथ में छड़ी लिए अपनी बकरियां चराती हुई एक मासूम लड़की।

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अधुरा प्यार - 1

उत्तर प्रदेश की वो सर्द रात और दिल में सुलगती नफरत... इकबाल राज के लिए अब अपना कहने को भी नहीं बचा था। सगी पत्नी के धोखे ने उसे रातों-रात बेघर और 'लावारिस' कर दिया। शहर छूटा, सुकून छूटा और इकबाल दर-दर भटकता हुआ एक अनजान गाँव पहुँचा, जो उसके भाई का ससुराल था। वहां उसका कोई अपना नहीं था, बस बेबसी थी।गाँव की सरहद पर इकबाल की मुलाकात उस मंजर से हुई जिसने उसकी नफरत को मोहब्बत में बदल दिया। जुबैदा—हाथ में छड़ी लिए अपनी बकरियां चराती हुई एक मासूम लड़की। उसकी सादगी और खिलखिलाती बातों ने इकबाल ...और पढ़े

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अधुरा प्यार - 2

मुंबई की वह पहली रात किसी ठंडे कफन जैसी थी. शांति निवास' नाम की उस जर्जर और पुरानी इमारत कमरा नंबर तीन सौ दो में कदम रखते ही मुझे अहसास हो गया था कि यहाँ कुछ तो बहुत बडा और भयानक गलत है. कमरे के हर कोने में मकडी के जाले इस तरह फैले थे जैसे वे सालों से किसी शिकार का इंतजार कर रहे हों. दीवारों से झडती पपडी और सीलन की बदबू जैसे कोई दफन हो चुकी पुरानी दास्तां सुना रहे थे. बाहर मुंबई की भारी और गरजती हुई बारिश शुरू हो चुकी थी—वही बारिश जो टीवी ...और पढ़े

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अधुरा प्यार - 3

(सावधान: इस अध्याय को पढते समय अपने पीछे का दरवाजा बंद कर लें, क्योंकि इस कहानी के शब्द आपके के सन्नाटे से बातें करेंगे। )शांति निवास' का वह गलियारा अब गलियारा नहीं रहा था. वह एक खिंचती हुई रबर की तरह लंबा होता जा रहा था. मैं भाग रहा था, पर मेरे पैर एक ही जगह पर जम गए थे. इसे मनोविज्ञान में' स्लीप पैरालिसिस' का भ्रम कहते हैं, जहाँ आपका दिमाग भागना चाहता है पर शरीर साथ नहीं देता. पर मेरे साथ यह हकीकत में हो रहा था. दीवारों पर जमी सीलन अब आकृतियाँ बदलने लगी थी—कभी वह ...और पढ़े

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अधुरा प्यार - 4

शॉक थेरेपी का राज और रूहानी साजिशभाग एक: सफेद दीवारों का नरकअस्पताल की छत पर लगा वह पीला बल्ब रहकर झपक रहा था. उसकी आवाज' टिक- टिक' नहीं, बल्कि किसी के दांत किटकिटाने जैसी थी. मेरे हाथ- पैर चमडे के मोटे पट्टों से लोहे के पलंग पर जकडे हुए थे. नसों में दौडती हुई दवा का ठंडा अहसास मुझे यह यकीन दिलाने की कोशिश कर रहा था कि मैं हार चुका हूँ.इकबाल. शांत हो जाओ. जितना लडोगे, दर्द उतना ही गहरा होगा, डॉक्टर ने कहा. उसकी आवाज में एक अजीब सी खनक थी, जैसे कोई पुरानी तिजोरी का दरवाजा ...और पढ़े

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अधुरा प्यार - 5

टाइपराइटर की चीख- स्याही का कत्लेआम​भाग एक: लोहे का पाताल और' की' (Key) का प्रहार​मैं गिर रहा था. हवा कान में सीटी नहीं बजा रही थी, बल्कि वे हजारों पाठकों की फुसफुसाहटें थीं. जैसे ही मैं नीचे पहुँचा, एक कान फोड देने वाली' ठक' की आवाज हुई. मैं एक विशालकाय लोहे के चौकोर खंभे पर गिरा था. वह कोई खंभा नहीं था, वह टाइपराइटर की एक' Key' थी जिस पर अंग्रेजी का अक्षर' I' उकेरा गया था.​जैसे ही मेरा शरीर उस ठंडे लोहे से टकराया, पूरी जमीन हिल गई. ऊपर से एक विशालकाय लोहे का हथौडा (Type- bar) नीचे ...और पढ़े

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अधुरा प्यार - 6

पन्नों से परे का प्रहारभाग एक: कागज की सरसराहट और अदृश्य उंगलियांअस्पताल के उस कमरे में सन्नाटा इतना गहरा कि मुझे अपनी पलकों के झपकने की आवाज भी किसी धमाके जैसी लग रही थी. मेज पर पडा वह तांबे का लॉकेट. जिस पर' आपका' (पाठक का) नाम खुदा था, वह धीरे- धीरे गर्म होने लगा था.मैने नर्स को पुकारने के लिए हाथ बढाया, लेकिन मेरा हाथ हवा में ही जम गया. नर्स, जो अभी कुछ पल पहले मुस्कुराकर बाहर गई थी, वह गलियारे में एकदम स्थिर खडी थी. जैसे किसी ने' पॉज' (Pause) का बटन दबा दिया हो.तभी मुझे ...और पढ़े

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अधुरा प्यार - 7

चेतना का कत्लेआमभाग एक: शून्यता का गर्भाशयजैसे ही वह' ठक' की आखिरी आवाज हुई, सारा शोर थम गया. न की गूँज थी, न अस्पताल की स्मेल. मैं एक ऐसी जगह था जिसे' मार्जिन' कहा जा सकता है—सफेद कागज का वह कोना जहाँ लेखक कभी नहीं लिखता. यहाँ न रौशनी थी, न अंधेरा.मेरे सामने एक विशाल' कर्सर' (Cursor) लटक रहा था, जो किसी खूनी तलवार की तरह धक- धक कर रहा था. हर बार जब वह चमकता, मेरी यादों का एक हिस्सा मिट जाता.तुम्हें क्या लगा इकबाल, कि तुम पाठक के कमरे में जाकर सुरक्षित हो जाओगे?वह आवाज. वह मुस्कान ...और पढ़े

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अधुरा प्यार - 8

शक्कर का जहर और रूह का कत्लेआमभाग एक: एक मखमली साजिश (The False Calm)मुंबई की वह दोपहर इतनी गर्म कि हवा के थपेडे चेहरे पर किसी पुराने गुनाह की तरह लग रहे थे. इकबाल के हाथ में वह खूनी' I' चाबी ठंडी थी, जैसे किसी मुर्दे की उंगली. आज वह हाथ- गाडी वाला इकबाल नहीं, बल्कि अपनी सबसे साफ कमीज में खडा वह पत्रकार था जिसका' AK Service' कभी एक साम्राज्य था.जब दरवाजा खुला, तो इकबाल की' चेतना' चीख पडी. जुबेदा के पिता, जिनके लहजे में कल तक नफरत की आग थी, आज उनकी आँखों में चाशनी जैसी मिठास ...और पढ़े

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अधुरा प्यार - 9

शून्य का सिरा और भटकती रूहभाग एक: वास्तविकता का टूटना (The Glitch)सगाई वाले घर से अपमानित होकर भागने के बाद इकबाल एक तंग गली में मुडता है और अचानक सारा शोर थम जाता है. सामने वही सगाई वाला हॉल है, लेकिन वहां सन्नाटा है. कोई मेहमान नहीं, कोई नगाडा नहीं. फर्श पर वही पाँच सौ का नोट पडा है, लेकिन उस पर गांधी जी की जगह इकबाल राज की फोटो छपी है. इकबाल उस नोट को उठाता है, तो उसके हाथ में नोट नहीं, बल्कि राख का एक ढेर रह जाता है. क्या इकबाल की दिमागी हालत बिगड गई ...और पढ़े

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अधुरा प्यार - 10

आक्रोश का नंगा नाच और रूहानी कत्लेआमभाग एक: आँखों में उतरता खूनइकबाल की आँखें अब सफेद नहीं, बल्कि स्याही तरह नीली और खून की तरह सुर्ख हो चुकी हैं. वह हाथ- गाडी के हैंडल को इतनी जोर से भींचता है कि लोहे से चरमराने की आवाज आती है. वह मुंबई की उन गलियों से गुजर रहा है जहाँ उसने कभी अपनी इज्जत नीलाम होते देखी थी. उसके दिमाग में सिर्फ एक ही धुन बज रही है—बदला. वह बदला जो जुबेदा के घर की दिवारों को गिरा देगा. वह चिल्लाता नहीं है, उसकी खामोशी में हजारों चीखें दफन हैं. आज ...और पढ़े

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