एक माँ आज रो रही है। उसका दम घुट रहा है, वह धीरे-धीरे मर रही है। क्या कोई उसकी पीड़ा को समझ पाएगा, या यह दर्द उसे उसके अंत की ओर ले जाएगा? मैं उसे देख रही हूँ… क्योंकि मैं उसी की कोख में पिछले पच्चीस सालों से रह रही हूँ। उसकी कोख में मुझे हमेशा सुकून मिला है। लेकिन आज वही कोख घायल हो रही है, जिसे हमें संभालना था, जिसे हमें बचाना था… आज उसी को मार दिया जा रहा है।
कोख से अंत तक - 1
एक माँ आज रो रही है।उसका दम घुट रहा है, वह धीरे-धीरे मर रही है।क्या कोई उसकी पीड़ा को पाएगा,या यह दर्द उसे उसके अंत की ओर ले जाएगा?मैं उसे देख रही हूँ…क्योंकि मैं उसी की कोख में पिछले पच्चीस सालों से रह रही हूँ।उसकी कोख में मुझे हमेशा सुकून मिला है।लेकिन आज वही कोख घायल हो रही है,जिसे हमें संभालना था,जिसे हमें बचाना था…आज उसी को मार दिया जा रहा है।जिस जीव ने सबसे पहले इसकी कोख से जन्म लिया होगा,क्या उसने कभी सोचा होगा कि एक दिन अपनी ही माँ का अंत देखने की नौबत आ जाएगी?क्या ...और पढ़े
कोख से अंत तक - 2
“माँ, जिसका काम है चोट खाकर भी फिर से खड़े हो जाना, वह अपने घाव भर लेगी। लेकिन अगर ही कोख में अब हम सुरक्षित नहीं रह सकते, तो वह फिर जीवन को जन्म दे देगी। पर क्या हम ही अपने भविष्य को खोते जा रहे हैं? शायद हम दोबारा इस धरती माँ की गोद में जन्म ही न ले पाएं।तो फिर हम यह विकास किसके लिए कर रहे हैं? क्या हमने इतना विकास सिर्फ इसलिए किया है कि अंत में हम ही न रहें? अगर हमारी आने वाली पीढ़ियाँ ही सुरक्षित नहीं रहेंगी, तो इस प्रगति का अर्थ ...और पढ़े