पुरातन पद्धति के अनुसार श्री हेमाडपंत श्री साई सच्चरित्र का आरम्भ वन्दना द्वारा करते है। (१) प्रथम श्री गणेश को साष्टांग नमन करते है, जो कार्य को निर्विघ्न समाप्त कर उसको यशस्वी बनाते है और कहते हैं कि श्री साई ही गणपति हैं। (२) फिर भगवती सरस्वती को, जिन्होंने काव्य रचने की प्रेरणा दी और कहते हैं कि श्री साई भगवती से भिन्न नहीं हैं, जो कि स्वयं ही अपना जीवन संगीत बयान कर रहे हैं। (३) फिर ब्रह्मा, विष्णु और महेश, जो क्रमशः उत्पत्ति, स्थिति और संहारकर्ता है और कहते हैं कि श्री साई और वे अभिन्न हैं। वे स्वयं ही गुरु बनकर भवसागर से पार उतार देंगे।

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 1

पुरातन पद्धति के अनुसार श्री हेमाडपंत श्री साई सच्चरित्र का आरम्भ वन्दना द्वारा करते है।(१) प्रथम श्री गणेश को नमन करते है, जो कार्य को निर्विघ्न समाप्त कर उसको यशस्वी बनाते है और कहते हैं कि श्री साई ही गणपति हैं।(२) फिर भगवती सरस्वती को, जिन्होंने काव्य रचने की प्रेरणा दी और कहते हैं कि श्री साई भगवती से भिन्न नहीं हैं, जो कि स्वयं ही अपना जीवन संगीत बयान कर रहे हैं।(३) फिर ब्रह्मा, विष्णु और महेश, जो क्रमशः उत्पत्ति, स्थिति और संहारकर्ता है और कहते हैं कि श्री साई और वे अभिन्न हैं। वे स्वयं ही गुरु ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 2

गत अध्याय में ग्रन्थकार ने अपने मौलिक ग्रन्थ श्री साई सच्चरित्र (मराठी भाषा) में उन कारणों पर प्रकाश डाला जिनके द्वारा उन्हें ग्रंथ रचना के कार्य को आरंभ करने की प्रेरणा मिली। अब वे ग्रन्थ पठन के योग्य अधिकारियों तथा अन्य विषयों का इस अध्याय में विवेचन करते है। ग्रंथ लेखन का हेतु किस प्रकार विषूचिका (हैजा) के रोग के प्रकोप को आटा पिसवाकर तथा उसको ग्राम के बाहर फेंकवा कर रोका तथा उसका उन्मूलन किया, बाबा की इस लिला का प्रथम अध्याय में वर्णन किया जा चुका है। मैंने और भी लीलाएँ सुनीं, जिसे मेरे हृदय को अति ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 3

श्री साईबाबा की स्वीकृति और वचन देनाजैसा कि गत अध्याय में वर्णन किया जा चुका है, बाबा ने सच्चरित्र की अनुमति देते हुए कहा कि सच्चरित्र लेखन के लिये मेरी पूर्ण अनुमति है। तुम अपना मन स्थिर कर, मेरे वचनों में श्रद्धा रखो और निर्भय होकर कर्तव्य पालन करते रहो यदि मेरी लीलाएँ लिखी गई तो अविद्या का नाश होगा तथा ध्यान व भक्तिपूर्वक श्रवण करने से, दैहिक बुद्धी नष्ट होकर भक्ति और प्रेम की तीव्र लहर प्रवाहित होगी और जो इन लीलाओं की अधिक गहराई तक खोज करेगा, उसे ज्ञानरूपी अमूल्य रत्न की प्राप्ति हो जाएगी।इन वचनों को ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 4

संतों का अवतार कार्यभगवद्गीता (चौथा अध्याय ७-८) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि “जब जब धर्म की हानि और की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार धारण करता हूँ। धर्म-स्थापन, दुष्टों का विनाश तथा साधुजनों के परित्राण के लिये मैं युग-युग में जन्म लेता हूँ।” साधु और संत भगवान के प्रतिनिधिस्वरूप हैं। वे उपयुक्त समय पर प्रगट होकर अपनी कार्यप्रणाली द्वारा अपना अवतार-कार्य पूर्ण करते हैं। अर्थात् जब ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाते हैं, जब शूद्र उच्च जातियों के अधिकार छीनने लगते हैं, जब धर्म के आचार्यों का अनादर तथा निंदा होने लगती है, ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 5

जैसा गत अध्याय में कहा गया है, मैं अब श्री साई बाबा के शिरडी से अन्तर्धान होने के पश्चात् शिरडी में पुनः किस प्रकार आगमन हुआ, इसका वर्णन करूँगा।चाँद पाटील की बारात के साथ पुनः आगमनजिला औरंगाबाद वर्तमान छत्रपति संभाजी नगर (निजाम स्टेट) के धूपगाँव में चाँद पाटील नामक एक धनवान् मुस्लिम रहते थे। जब वे औरंगाबाद को जा रहे थे तो मार्ग में उनकी घोड़ी खो गई। दो मास तक उन्होंने उसकी खोज में घोर परिश्रम किया, परन्तु उसका कहीं पता न चल सका। अन्त में वे निराश होकर उसकी जीन को पीठ पर लटकाये औरंगाबाद को लौट ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 6

गुरु के कर-स्पर्श के गुणजब सद्गुरु ही नाव के खिवैया हैं तो वे निश्चय ही कुशलता तथा सरलतापूर्वक इस के पार उतार देंगे। “सद्गुरु” शब्द का उच्चारण करते ही मुझे श्री साई की स्मृति आ रही है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे स्वयं मेरे सामने खड़े है और मेरे मस्तक पर उदी लगा रहे हैं। देखो, देखो, वे अब अपना वरद्-हस्त उठाकर मेरे मस्तक पर रख रहे हैं। अब मेरा हृदय आनन्द से भर गया है। मेरे नेत्रों से प्रेमाश्रु बह रहे है। सद्गुरु के कर-स्पर्श की शक्ति महान् आश्चर्यजनक है। लिंग (सुक्ष्म) शरीर, जो संसार को भस्म ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 7

श्री साईबाबा समस्त यौगिक क्रियाओं में पारंगत थे। छः प्रकार की क्रियाओं के तो वे पूर्ण ज्ञाता थे। छः जिनमें :धौति (एक ३” चौड़े व २२½” लम्बे कपड़े के भीगे हुए टुकड़े से पेट को स्वच्छ करना),खण्ड योग ( अर्थात् अपने शरीर के अवयवों को पृथक्-पृथक् कर उन्हें पुनः पूर्ववत् जोड़ना) और समाधि आदि भी सम्मिलित हैं। यदि कहा जाए कि वे हिन्दू थे तो आकृति से वे यवन-से प्रतीत होते थे। कोई भी यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता था कि वे हिन्दू थे या यवन। वे हिन्दुओं का रामनवमी उत्सव यथाविधि मनाते थे और साथ ही मुसलमानों का ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 8

जैसा कि गत अध्याय में कहा गया है, अब श्री हेमाडपन्त मानव जन्म की महत्ता को विस्तृत रूप में है। श्री साईबाबा किस प्रकार भिक्षा उपार्जन करते थे, बायजाबाई उनकी किस प्रकार सेवा-शुश्रुषा करती थीं, वे मस्जिद में तात्या कोते और म्हालसापति के साथ किस प्रकार शयन करते तथा खुशालचन्द पर उनका कैसा स्नेह था, इसका आगे वर्णन किया जाएगा।मानव जन्म का महत्वइस विचित्र संसार में ईश्वर ने लाखों प्राणियों (हिन्दू शास्त्र के अनुसार ८४ लाख योनियों) को उत्पन्न किया है (जिनमें देव, दानव, गन्धर्व, जीवजन्तु और मनुष्य आदि सम्मिलित हैं), जो स्वर्ग, नरक, पृथ्वी, समुद्र तथा आकाश में ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 9

गत अध्याय के अन्त में केवल इतना ही संकेत किया गया था कि लौटते समय जिन्होंने बाबा के आदेशों पालन किया, वे सकुशल घर लौटे और जिन्होंने अवज्ञा की, उन्हें दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ा। इस अध्याय में यह कथन अन्य कई पुष्टिकारक घटनाओं और अन्य विषयों के साथ विस्तारपूर्वक समझाया जाएगा।शिरडी यात्रा की विशेषताशिरडी यात्रा की एक विशेषता यह थी कि बाबा की आज्ञा के बिना कोई भी शिरडी से प्रस्थान नहीं कर सकता था और यदि किसी ने किया भी, तो मानो उसने अनेक कष्टों को निमंत्रण दे दिया। परन्तु यदि किसी को शिरडी छोड़ने की आज्ञा ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 10

प्रारम्भश्री साईबाबा का सदा ही प्रेमपूर्वक स्मरण करो, क्योंकि वे सदैव दूसरों के कल्याणार्थ तत्पर तथा आत्मलीन रहते थे। स्मरण करना ही जीवन और मृत्यु की पहेली हल करना है । साधनाओं में यह अति श्रेष्ठ तथा सरल साधना है, क्योंकि इसमें कोई द्रव्य व्यय नही होता। केवल मामूली परिश्रम से ही भविष्य नितान्त फलदायक होता है। जब तक इन्द्रियाँ बलिष्ठ हैं, क्षण-क्षण इस साधना को आचरण में लाना चाहिए। केवल गुरु ही ईश्वर हैं। हमे उनके ही पवित्र चरणकमलों में श्रद्धा रखनी चाहिए। वे तो हर इन्सान के भाग्यविधाता और प्रेममय प्रभु हैं। जो अनन्य भाव से उनकी ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 11

इस अध्याय में अब हम श्री साईबाबा के सगुण ब्रह्म स्वरुप, उनका पूजन तथा तत्वनियंत्रण का वर्णन करेंगे।सगुण ब्रह्म साईबाबाब्रह्म के दो स्वरुप हैं — निर्गुण और सगुण। निर्गुण निराकार है और सगुण साकार है । यद्यपि वे एक ही ब्रह्म के दो रूप हैं, फिर भी किसी को निर्गुण और किसी को सगुण उपासना में दिलचस्पी होती है, जैसा कि गीता का अध्याय १२ में वर्णन किया गया है। सगुण उपासना सरल और श्रेष्ठ है। मनुष्य स्वयं आकार (शरीर, इन्द्रिय आदि) में है, इसीलिये उसे ईश्वर की साकार उपासना स्वभावतः ही सरल है। जब तक कुछ काल सगुण ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 12

इस अध्याय में बाबा किस प्रकार भक्तों से भेंट करते और कैसा बर्ताव करते थे, इसका वर्णन किया गया का कार्यहम देख चुके हैं कि ईश्वरीय अवतार का ध्येय साधुजनों का परित्राण और दुष्टों का संहार करना है । परन्तु संतों का कार्य तो सर्वथा भिन्न ही है । सन्तों के लिए साधु और दुष्ट प्रायः एक समान ही हैं। यथार्थ में उन्हें दुष्कर्म करने वालों की प्रथम चिन्ता होती है और वे उन्हें उचित पथ पर लगा देते हैं। वे भवसागर के कष्टों को सोखने के लिए अगस्त्य के सदृश हैं और अज्ञान तथा अंधकार का नाश करने ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 13

माया की अभेद्य शक्तिबाबा के शब्द सदैव संक्षिप्त, अर्थपूर्ण, गूढ़ और विद्वत्तापूर्ण तथा समतोल रहते थे। वे सदा निश्चिंत निर्भय रहते थे। उनका कथन था कि “मै फकीर हूँ, न तो मेरे स्त्री है और न घर-द्वार ही । सब चिंताओं का त्याग कर, मैं एक ही स्थान पर रहता हूँ। फिर भी माया मुझे कष्ट पहुँचाया करती है। मैं स्वयं को तो भूल चुका हूँ, परन्तु माया मुझे नहीं भूलती, क्योंकि वह मुझे अपने चक्र में फँसा लेती है। श्रीहरि की यह माया ब्रह्मादि को भी नहीं छोड़ती, फिर मुझ सरीखे फकीर का तो कहना ही क्या है ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 14

श्री साईबाबा के वचनों और कृपा द्वारा किस प्रकार असाध्य रोग भी निर्मूल हो गए, इसका वर्णन पिछले अध्याय किया जा चुका है। अब बाबा ने किस प्रकार रतनजी वाडिया को अनुगृहीत किया तथा किस प्रकार उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, इसका वर्णन इस अध्याय में होगा।इस संत की जीवनी सर्व प्रकार से प्राकृतिक और मधुर है। उनके अन्य कार्य भी जैसे भोजन, चलना-फिरना तथा स्वाभाविक अमृतोपदेश बड़े ही मधुर हैं । वे आनन्द के अवतार हैं। इस परमानंद का उन्होंने अपने भक्तों को भी रसास्वादन कराया और इसीलिये उन्हें उनकी चिरस्मृति बनी रही । भिन्न-भिन्न प्रकार के कर्म ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 15

पाठकों को स्मरण होगा कि छठें अध्याय के अनुसार शिरडी में रामनवमी उत्सव मनाया जाता था । यह कैसे हुआ और पहले वर्ष ही इस अवसर पर कीर्तन करने के लिये एक अच्छे हरिदास के मिलने में क्या-क्या कठिनाइयाँ हुईं, इसका भी वर्णन वहाँ किया गया है। इस अध्याय में दासगणु की कीर्तन पद्धति का वर्णन होगा ।नारदीय कीर्त्तन पद्धतिबहुधा हरिदास कीर्त्तन करते समय एक लम्बा अंगरखा और पूरी पोशाक पहनते हैं । वे सिर पर फेंटा या साफा बाँधते है और एक लम्बा कोट तथा भीतर कमीज, कन्धे पर गमछा और सदैव की भाँति एक लम्बी धोती पहनते ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 16-17

पूर्व विषयगत अध्याय में श्री चोलकर का अल्प संकल्प किस प्रकार पूर्णतः फलीभूत हुआ, इसका वर्णन किया गया है। कथा में श्री साईबाबा ने दर्शाया था कि प्रेम तथा भक्तिपूर्वक अर्पित की हुई तुच्छ वस्तु भी वे सहर्ष स्वीकार कर लेते थे, परन्तु यदि वह अहंकारसहित भेंट की गई तो वह अस्वीकृत कर दी जाती थी। पूर्ण सच्चिदानंद होने के कारण वे बाह्य आचारविचारों को विशेष महत्व न देते थे और विनम्रता और आदरसहित भेंट की गई वस्तु का स्वागत करते थे।यथार्थ में देखा जाए तो सद्गुरु साईबाबा से अधिक दयालु और हितैषी दूसरा इस संसार में कौन हो ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 18-19

ब्रह्मज्ञान हेतु लालायित एक धनी व्यक्ति के साथ बाबा ने किस प्रकार व्यवहार किया, इसका वर्णन हेमाडपंत ने गत अध्यायों में किया है। अब हेमाडपंत पर किस प्रकार बाबा ने अनुग्रह कर, उत्तम विचारों को प्रोत्साहन देकर उन्हें फलीभूत किया तथा आत्मोन्नति व परिश्रम के प्रतिफल के सम्बन्ध में किस प्रकार उपदेश किये, इनका इन दो अध्यायों में वर्णन किया जाएगा।पूर्व विषययह विदित ही है कि सद्गुरु पहले अपने शिष्य की योग्यता पर विशेष ध्यान देते हैं। उनके चित्त को किंचित्मात्र भी डावाँडोल न कर वे उपयुक्त उपदेश देकर उन्हें आत्मानुभूति की ओर प्रेरित करते हैं। इस सम्बन्ध में ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 20

श्री काकासाहेब की नौकरानी द्वारा श्री दासगणु की समस्या किस प्रकार हल हुई, इसका वर्णन हेमाडपंत ने इस अध्याय किया है।प्रारम्भश्री साई मूलतः निराकार थे, परन्तु भक्तों के प्रेमवश ही वे साकार रूप में प्रकट हुए। माया रूपी अभिनेत्री की सहायता से इस विश्व की वृहत् नाट्यशाला में उन्होंने एक महान् अभिनेता के सदृश अभिनय किया। आओ, श्री साईबाबा का ध्यान व स्मरण करें और फिर शिरडी चलकर ध्यानपूर्वक मध्याह्न की आरती के पश्चात् का कार्यक्रम देखें। जब आरती समाप्त हो गई, तब श्री साईबाबा ने मस्जिद से बाहर आकर एक किनारे खड़े होकर बड़ी करुणा तथा प्रेम के ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 21

इस अध्याय में हेमाडपंत ने श्री विनायक हरिश्चंद्र ठाकुर, बी. ए., श्री अनंतराव पाटणकर, पुणे निवासी तथा पंढरपुर के वकील की कथाओं का वर्णन किया है। ये सब कथाएँ अति मनोरंजक हैं। यदि इनका सारांश मननपूर्वक ग्रहण कर उन्हें आचरण में लाया जाए तो आध्यात्मिक पथ पर पाठकगण अवश्य अग्रसर होंगे।प्रारम्भयह एक साधारण-सा नियम है कि गत जन्मों के शुभ कर्मों के फलस्वरूप ही हमें संतों का सान्निध्य और उनकी कृपा प्राप्त होती है । उदाहरणार्थ हेमाडपंत स्वयं अपनी घटना प्रस्तुत करते हैं। वे अनेक वर्षों तक बम्बई के उपनगर बांद्रा के स्थानीय न्यायाधीश रहे। पीर मौलाना नामक एक ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 22

बाबा की सर्प मारने पर सलाहश्री साईबाबा का ध्यान कैसे किया जाए ? उस सर्वशक्तिमान् की प्रकृति अगाध हैं, वर्णन करने में वेद और सहस्त्रमुखी शेषनाग भी अपने को असमर्थ पाते हैं। भक्तों की रुचि स्वरूप-वर्णन से नहीं। उनकी तो दृढ़ धारणा है कि आनन्द की प्राप्ति केवल उनके श्री चरणों से ही संभव है। उनके चरणकमलों के ध्यान के अतिरिक्त उन्हें अपने जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति का अन्य मार्ग विदित ही नहीं। हेमाडपंत भक्ति और ध्यान का जो एक अति सरल मार्ग सुझाते हैं, वह है—कृष्ण पक्ष के आरम्भ होने पर चन्द्र-कलाएँ दिन प्रतिदिन घटती जाती ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 23

प्रस्तावनावस्तुतः मनुष्य त्रिगुणमय (तीन गुण अर्थात् सत्व-रज-तम) है तथा माया के प्रभाव से ही उसे भासित होने लगता है मैं शरीर हूँ। दैहिक बुद्धि के आवरण के कारण ही वह ऐसी धारणा बना लेता है कि मैं ही कर्त्ता और उपभोग करने वाला हूँ और इस प्रकार वह अपने को अनेक कष्टों में स्वयं फँसा लेता है। फिर उसे उससे छुटकारे का कोई मार्ग नहीं सूझता । मुक्ति का एकमात्र उपाय है — गुरु के श्री चरणों में अटल प्रेम और भक्ति। सबसे महान् अभिनयकर्ता भगवान् साई ने भक्तों को पूर्ण आनन्द पहुँचाकर उन्हें निज-स्वरूप में परिवर्त्तित कर लिया ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 24

प्रारम्भअगले अध्याय में अमुक-अमुक विषयों का वर्णन होगा, ऐसा कहना एक प्रकार का अहंकार ही है। जब तक अहंकार में अर्पित न कर दिया जाए, तब तक सत्यस्वरूप की प्राप्ति संभव नहीं । यदि हम निरभिमान हो जाएँ तो सफलता प्राप्त होना निश्चित ही है।श्री साईबाबा की भक्ति करने से ऐहिक तथा आध्यात्मिक दोनों पदार्थों की प्राप्ति होती है और हम अपनी मूल प्रकृति में स्थिरता प्राप्त कर शांति और सुख के अधिकारी बन जाते हैं। अतः मुमुक्षुओं को चाहिए कि वे आदरसहित श्री साईबाबा की लीलाओं का श्रवण कर उनका मनन करें। यदि वे इसी प्रकार प्रयत्न करते ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 25

प्राक्कथनजो अकारण ही सभी पर दया करते हैं तथा समस्त प्राणियों के जीवन व आश्रयदाता हैं, जो परब्रह्म के अवतार हैं, ऐसे अहेतुक दयासिन्धु और महान् योगिराज के चरणों में साष्टांग प्रणाम कर अब हम यह अध्याय आरम्भ करते हैं।श्री साई की जय हो! वे सन्त चूड़ामणि, समस्त शुभ कार्यों के उद्गम स्थान और हमारे आत्माराम तथा भक्तों के आश्रयदाता हैं। हम उन साईनाथ की चरण-वन्दना करते हैं, जिन्होंने अपने जीवन का अन्तिम ध्येय प्राप्त कर लिया है।श्री साईबाबा अनिर्वचनीय प्रेमस्वरूप हैं। हमें तो केवल उनके चरणकमलों में दृढ़ भक्ति ही रखनी चाहिए। जब भक्त का विश्वास दृढ़ और ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 26

इस सृष्टि में स्थूल, सूक्ष्म, चेतन और जड़ आदि जो कुछ दृष्टिगोचर हो रहा है, वह सब एक ब्रह्म और इसी एक अद्वितीय वस्तु ब्रह्म को ही हम भिन्न-भिन्न नामों से सम्बोधित करते तथा भिन्न-भिन्न दृष्टियों से देखते हैं। जिस प्रकार अँधेरे में पड़ी हुई एक रस्सी या हार को हम भ्रमवश सर्प समझ लेते हैं, उसी प्रकार हम समस्त पदार्थों के केवल बाह्य स्वरूप को ही देखते हैं, न कि उनके सत्य स्वरूप को । एकमात्र सद्गुरु ही हमारी दृष्टि से माया का आवरण दूर कर हमें वस्तुओं के सत्यस्वरूप का यथार्थ में दर्शन करा देने में समर्थ ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 27

इस अध्याय में बतलाया गया है कि श्री साईबाबा ने किस प्रकार धार्मिक ग्रन्थों को करस्पर्श कर अपने भक्तों पारायण के लिये देकर अनुग्रहीत किया तथा और भी अन्य घटनाओं का उल्लेख किया गया है।प्रारम्भजन-साधारण का ऐसा विश्वास है कि समुद्र में स्नान कर लेने से समस्त तीर्थों तथा पवित्र नदियों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त हो जाता है। ठीक इसी प्रकार सद्गुरु के चरणों का आश्रय लेने मात्र से तीनों शक्तियों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) और परब्रह्म को नमन करने का श्रेय सहज ही प्राप्त हो जाता है। श्री सच्चिदानंद साईमहाराज तो भक्तों के लिये कल्पतरु, दया ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 28

प्राक्कथनश्री साई अनंत हैं । वे एक चींटी से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त सर्वभूतों में व्याप्त है। वेद और आत्मविज्ञान में पारंगत होने के कारण वे सद्गुरु कहलाने के सर्वथा योग्य हैं। चाहे कोई कितना ही विद्वान् क्यों न हो, परन्तु यदि वह अपने शिष्य की जागृति कर उसे आत्मस्वरूप का दर्शन न करा सके तो उसे सद्गुरु के नाम से कदापि सम्बोधित नहीं किया जा सकता। साधारणतः पिता केवल इस नश्वर शरीर का ही जन्मदाता है, परन्तु सद्गुरु तो जन्म और मृत्यु दोनों से ही मुक्ति करा देने वाले हैं। अतः वे अन्य लोगों से अधिक दयावन्त हैं।श्री साईबाबा हमेशा ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 29

(१) मद्रासी भजनी मेलालगभग सन् १९१६ में एक मद्रासी भजन मंडली पवित्र काशी की तीर्थयात्रा पर निकली। उस मंडली एक पुरुष, उनकी स्त्री, पुत्री और साली थी। अभाग्यवश, उनके नाम यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं। मार्ग में कहीं उनको सुनने में आया कि अहमदनगर के कोपरगाँव तालुका के शिरडी ग्राम में श्री साईबाबा नाम के एक महान् सन्त रहते हैं, जो बहुत दयालु और पहुँचे हुए हैं। वे उदार हृदय और अहेतुक कृपासिन्धु हैं। वे प्रतिदिन अपने भक्तों को रुपया बाँटा करते हैं । यदि कोई कलाकार वहाँ जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करता है तो उसे भी ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 30

इस अध्याय में बतलाया गया है कि तीन अन्य भक्त किस प्रकार शिरडी की ओर खींचे गए।प्राक्कथनजो बिना किसी भक्तों पर स्नेह करने वाले दया के सागर हैं तथा निर्गुण होकर भी भक्तों के प्रेमवश ही जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक मानव शरीर धारण किया, जो ऐसे भक्त-वत्सल हैं कि जिनके दर्शन मात्र से ही भवसागर के भय और समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं, ऐसे श्री साईनाथ महाराज को हम नमन करें। भक्तों को आत्मदर्शन कराना ही सन्तों का प्रधान कार्य है। श्री साई, जो सन्त शिरोमणि हैं, उनका तो मुख्य ध्येय ही यही है । जो उनके श्रीचरणों की शरण ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 31

मुक्ति-दानइस अध्याय में हेमाडपंत बाबा के सामने कुछ भक्तों की मृत्यु तथा बाघ के प्राण-त्याग की कथा का वर्णन हैं।प्रारम्भमृत्यु के समय जो अंतिम इच्छा या भावना होती है, वही भवितव्यता का निर्माण करती है। श्रीकृष्ण ने गीता (अध्याय ८) में कहा हैं कि जो अपने जीवन के अंतिम क्षण में मुझे स्मरण करता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है तथा उस समय वह जो कुछ भी दृश्य देखता है, उसी को अन्त में पाता है। यह कोई भी निश्चयात्मक रूप से नहीं कह सकता कि उस क्षण हम केवल उत्तम विचार ही कर सकेंगे। जहाँ तक अनुभव ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 32

इस अध्याय में हेमाडपंत ने दो विषयों का वर्णन किया है।(१) किस प्रकार बाबा की अपने गुरु से भेंट और उनके द्वारा ईश्वरदर्शन की प्राप्ति कैसे हुई।(२) श्रीमती गोखले, जो तीन दिन से उपवास कर रही थीं, को पूरनपोली का भोजन कैसे कराया।प्रस्तावनाश्री हेमाडपंत वटवृक्ष का उदाहरण देकर इस गोचर संसार के स्वरूप का वर्णन करते हैं। गीता के अनुसार वटवृक्ष की जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे को चारों ओर फैली हुई हैं। “उर्ध्वमूलमधःशाखम्” (गीता पंद्रहवाँ अध्याय, श्लोक १)। इस वृक्ष के गुण, पोषक और अंकुर, इंद्रियों के भोग्य पदार्थ हैं । जड़ें जिनका कारणीभूत कर्म हैं, वे सृष्टि ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 33

उदि की महिमा (भाग-1)पूर्व अध्याय में गुरु की महानता का दिग्दर्शन कराया गया है। अब इस अध्याय में उदी माहात्म्य का वर्णन किया जाएगा।प्रस्तावनाआओ, पहले हम सन्तों के चरणों में प्रणाम करें, जिनकी कृपादृष्टि मात्र से ही समस्त पापसमूह भस्म होकर हमारे आचरण के दोष नष्ट हो जाएँगे। उनसे वार्तालाप करना हमारे लिये शिक्षाप्रद और अति आनंददायक है। वे अपने मन में “यह मेरा और वह तुम्हारा” ऐसा कोई भेद नहीं रखते । इस प्रकार के भेदभाव की कल्पना उनके हृदय में कभी भी उत्पन्न नहीं होती। उनका ऋण इस जन्म में तो क्या, अनेक जन्मों में भी न ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 34

उदी की महिमा (भाग २)इस अध्याय में भी उदी की ही महत्ता क्रमबद्ध है तथा उन घटनाओं का भी किया है, जिनमें उसका उपयोग बहुत ही प्रभावकारी सिद्ध हुआ।डॉक्टर का भतीजानासिक जिले के मालेगाँव में एक डॉक्टर रहते थे। उनका भतीजा एक असाध्य रोग (एक प्रकार का तपेदिक) से पीड़ित था। उन्होंने तथा उनके सभी डॉक्टर मित्रों ने समस्त उपचार किये। यहाँ तक कि उसकी शल्यचिकित्सा भी कराई, फिर भी बालक को कोई भी लाभ न हुआ। उसके कष्टों का पारावार न था। मित्र और सम्बन्धियों ने बालक के माता-पिता को दैविक उपचार करने का परामर्श देकर श्री साईबाबा ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 35

काका महाजनी के मित्र और सेठ, निर्बीज अंगुर, बान्द्रा के एक गृहस्थ की अनिद्रा, बालाजी पाटील नेवासकर, बाबा का के रूप में प्रगट होना।इस अध्याय में भी उदी का महात्म्य ही वर्णित है। इसमें ऐसी दो घटनाओं का उल्लेख है कि परीक्षा करने पर देखा गया कि बाबा ने दक्षिणा अस्वीकार कर दी। पहले इन घटनाओं का वर्णन किया जाएगा।आध्यात्मिक विषयों में साम्प्रदायिक प्रवृत्ति उन्नति के मार्ग में एक बड़ा रोड़ा है। निराकारवादियों से कहते सुना जाता है कि ईश्वर की सगुण उपासना केवल एक भ्रम ही है और संतगण भी अपने सदृश ही सामान्य पुरुष हैं। इस कारण ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 36

इस अध्याय में गोवा के दो महानुभावों और श्रीमती औरंगाबादकर की अद्भुत कथाओं का वर्णन है।गोवा के दो महानुभावएक गोवा से दो महानुभाव श्री साईबाबा के दर्शनार्थ शिरडी आए । उन्होंने आकर उन्हें नमस्कार किया । यद्यपि वे दोनों एक साथ ही आए थे, फिर भी बाबा ने केवल एक ही व्यक्ति से पन्द्रह रुपये दक्षिणा माँगी, जो उन्हें आदरसहित दे दी गई । दूसरा व्यक्ति भी उन्हें सहर्ष ३५ रुपये दक्षिणा देने लगा तो उन्होंने उसकी दक्षिणा लेना अस्वीकार कर दिया। लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ । उस समय शामा भी वहाँ उपस्थित थे । उन्होंने कहा कि, ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 37

चावड़ी समारोहइस अध्याय में हम कुछ वेदान्तिक विषयों पर प्रारम्भिक दृष्टि से समालोचना कर चावड़ी के भव्य समारोह का करेंगे।प्रारम्भधन्य हैं श्री साई, जिनका जैसा जीवन था, वैसा ही अवर्णनीय लीला विलास, और अद्भुत क्रियाओं से पूर्ण नित्य के कार्यक्रम भी। कभी तो वे समस्त सांसारिक कार्यो से अलिप्त रहकर कर्मकाण्डी से प्रतीत होते और कभी ब्रह्मानंद और आत्मज्ञान में निमग्न रहा करते थे। कभी वे अनेक कार्य करते हुए भी उनसे असंबद्ध रहते थे। यद्यपि कभी-कभी वे पूर्ण निष्क्रिय प्रतीत होते तथापि वे आलसी नहीं थे। प्रशान्त महासागर की तरह सदैव जागरूक रहकर भी वे गंभीर, प्रशान्त और ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 38

गत अध्याय में चावड़ी के समारोह का वर्णन किया गया है। अब इस अध्याय में बाबा की हांडी तथा अन्य विषयों का वर्णन होगा।प्रस्तावनाहे सद्गुरु साई! तुम धन्य हो! हम तुम्हें नमन करते हैं। तुमने विश्व को सुख पहुँचाया और भक्तों का कल्याण किया। तुम उदार हृदय हो। जो भक्तगण तुम्हारे अभय चरण-कमलों में अपने को समर्पित कर देते हैं, तुम उनकी सदैव रक्षा एवं उद्धार किया करते हो। भक्तों के कल्याण और परित्राण के निमित्त ही तुम अवतार लेते हो। ब्रह्म के साँचे में शुद्ध आत्मारूपी द्रव्य ढाला गया और उसमें से ढलकर जो मूर्ति निकली, वही संतों ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 39

इस अध्याय में बाबा ने गीता के एक श्लोक का अर्थ समझाया है। कुछ लोगों की ऐसी धारणा थी बाबा को संस्कृत भाषा का ज्ञान न था और नानासाहेब की भी उनके प्रति ऐसी ही धारणा थी। इसका खंडन हेमाडपंत ने मूल मराठी ग्रंथ के ५० वे अध्याय में किया है। दोनों अध्यायों का विषय एक सा होने के कारण वे यहाँ सम्मिलित रूप में दिए जाते हैं।प्रस्तावनाशिरडी के सौभाग्य का वर्णन कौन कर सकता है? श्री द्वारकामाई भी धन्य है, जहाँ श्री साई ने आकर निवास किया और वहीं समाधिस्थ हुए।शिरडी के नर-नारी भी धन्य हैं, जिन्हें साई ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 40

इस अध्याय में दो कथाओं का वर्णन है :(१) बाबा किस प्रकार श्रीमान् देव की माँ के यहाँ उद्यापन सम्मिलित हुए। और (२) बाबा किस प्रकार होली त्योहार के भोजन समारोह के अवसर पर बाँद्रा में हेमाडपंत के गृह पधारे।प्रस्तावनाश्री साई समर्थ धन्य हैं, जिनका नाम बड़ा सुन्दर है! वे सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही विषयों में अपने भक्तों को उपदेश देते हैं और भक्तों को अपना जीवनध्येय प्राप्त करने में सहायता प्रदान कर उन्हें अपनी शक्ति प्रदान करते हैं। वे भेदभाव की भावना को नष्ट कर उन्हें अप्राप्य वस्तु की प्राप्ति कराते है। भक्त लोग साई के चरणों ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 41

गत अध्याय में वर्णित घटना के नौ वर्ष पश्चात् अली मुहम्मद हेमाडपंत से मिले और वह पिछली कथा निम्नलिखित में सुनाई :-“एक दिन बम्बई में घूमते-फिरते मैंने एक दुकानदार से बाबा का चित्र खरीदा। उसे फ्रेम कराया और अपने घर (मध्य बम्बई की बस्ती में) लाकर दीवार पर लगा दिया। मुझे बाबा से स्वाभाविक प्रेम था। इसलिये मैं प्रतिदिन उनका श्री दर्शन किया करता था। जब मैंने आपको (हेमाडपंत को) वह चित्र भेंट किया, उसके तीन माह पूर्व मेरे पैर में सूजन आने के कारण शल्यचिकित्सा भी हुई थी । मैं अपने साले नूर मुहम्मद के यहाँ पड़ा हुआ ...और पढ़े

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संत श्री साईं बाबा - अध्याय 42

बाबा ने किस प्रकार समाधि ली, इसका वर्णन इस अध्याय में किया गया है।प्रस्तावनागत अध्यायों की कथाओं से यह प्रतीत होता है कि गुरुकृपा की केवल एक किरण ही भवसागर के भय से सदा के लिये मुक्त कर देती है तथा मोक्ष का पथ सुगम करके दुःख को सुख में परिवर्तित कर देती है। यदि सद्गुरु के मोहविनाशक पूजनीय चरणों का सदैव स्मरण करते रहोगे तो तुम्हारे समस्त कष्ट और भवसागर के दुःखो का अन्त होकर जन्म-मृत्यु के चक्र से छुटकारा हो जाएगा। इसलिये जो अपने कल्याणार्थ चिन्तित हों, उन्हें साई समर्थ के अलौकिक मधुर लीलामृत का पान करना ...और पढ़े

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