जैन दर्शन में आत्मा को मूलतः शुद्ध, बुद्ध और अनंत गुणों से युक्त माना गया है। लेकिन कर्मों के बंधन के कारण आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाती है। प्रतिक्रमण उसी आत्मा की ओर लौटने की साधना है। प्रतिक्रमण = अपने किए हुए दोषों से पीछे हटना। हम दिनभर में केवल शरीर से ही नहीं, बल्कि मन, वचन और काय से भी अनेक भूलें करते हैं। किसी को कठोर शब्द कहना, मन में किसी के प्रति द्वेष रखना, क्रोध करना, छल करना, किसी जीव को कष्ट पहुँचाना, अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह करना—ये सब आत्मचिंतन के विषय हैं। इसलिए प्रतिक्रमण केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है। यह एक प्रकार का आध्यात्मिक ऑडिट है। जैसे व्यापारी दिन के अंत में अपने खाते का हिसाब करता है, वैसे ही साधक प्रतिक्रमण में अपने मन-वचन-काय के कर्मों का हिसाब करता है।

1

प्रतिक्रमन सूत्र - 1

मैं इसे पुस्तक के रूप में अध्याय-दर-अध्याय दूँगा। जहाँ पाठ की परंपरा के अनुसार शब्द/क्रम में अंतर हो सकता वहाँ उसे स्पष्ट रखूँगा।🪷 जैन प्रतिक्रमण सूत्रमूल प्राकृत • शब्दार्थ • सरल हिन्दी अर्थ • भावार्थ • आत्मचिंतनसंकलन: Ashish Shahभूमिकाजैन दर्शन में आत्मा को मूलतः शुद्ध, बुद्ध और अनंत गुणों से युक्त माना गया है। लेकिन कर्मों के बंधन के कारण आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाती है।प्रतिक्रमण उसी आत्मा की ओर लौटने की साधना है।प्रतिक्रमण = अपने किए हुए दोषों से पीछे हटना।हम दिनभर में केवल शरीर से ही नहीं, बल्कि मन, वचन और काय से भी अनेक ...और पढ़े

अन्य रसप्रद विकल्प