नागबंधन: मुक्ति का श्राप.

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इतना घना कि सूरज की सुनहरी किरणें भी ज़मीन तक पहुँचने से पहले ही थककर बिखर जाती थीं। यहाँ रोशनी का प्रवेश वर्जित था। पत्तों की अनगिनत परतें ऊपर से नीचे तक ऐसे एक-दूसरे में गुथी हुई थीं मानो किसी ने जानबूझकर आकाश को धरती से छिपा दिया हो। यहाँ दिन के बारह बजे भी एक अजीब-सा, मटमैला धुंधलका छाया रहता था—न पूरा उजाला, न पूरी रात। बस एक अंतहीन गोधूलि बेला, जो कभी खत्म नहीं होती थी।

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नागबंधन: मुक्ति का श्राप - 1

अध्याय 1जंगल का श्रापघना जंगल—इतना घना कि सूरज की सुनहरी किरणें भी ज़मीन तक पहुँचने से पहले ही थककर जाती थीं। यहाँ रोशनी का प्रवेश वर्जित था। पत्तों की अनगिनत परतें ऊपर से नीचे तक ऐसे एक-दूसरे में गुथी हुई थीं मानो किसी ने जानबूझकर आकाश को धरती से छिपा दिया हो। यहाँ दिन के बारह बजे भी एक अजीब-सा, मटमैला धुंधलका छाया रहता था—न पूरा उजाला, न पूरी रात। बस एक अंतहीन गोधूलि बेला, जो कभी खत्म नहीं होती थी।हज़ारों साल पुराने बरगद और सागौन के पेड़ आसमान को चीरते हुए, किसी मूक प्रहरी की तरह खड़े थे। ...और पढ़े

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