प्रतीकोपासना स्वप्रतीक से आत्मज्योति की ओर भाग १ : प्रतीक का दर्शन और साधना का प्रारंभ शिवसंहिता के इस प्रसंग में योग की एक विशिष्ट साधना का वर्णन मिलता है, जिसे प्रतीकोपासना कहा गया है। यहाँ साधना का आधार साधक का अपना ही प्रतिबिंब है। अर्थात् साधक अपने बाहरी रूप को ही एक प्रतीक बनाकर उसके माध्यम से ध्यान को क्रमशः सूक्ष्म और अंतर्मुख करने का अभ्यास करता है। इस साधना का उद्देश्य केवल अपने प्रतिबिंब को देखना नहीं है। ग्रंथ में इसका एक क्रम दिया गया है प्रतीक का दर्शन, उसका आकाश में अनुभव, निरंतर अभ्यास, हृदयाकाश में उसके भान की अवस्था और आगे चलकर आत्मज्योति तथा नाद तक पहुँचने वाली साधना। इसलिए प्रतीकोपासना को उसके पूरे क्रम में समझना आवश्यक है।

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प्रतीकोपासना - भाग 1

प्रतीकोपासना स्वप्रतीक से आत्मज्योति की ओरभाग १ : प्रतीक का दर्शन और साधना का प्रारंभशिवसंहिता के इस प्रसंग में की एक विशिष्ट साधना का वर्णन मिलता है, जिसे प्रतीकोपासना कहा गया है। यहाँ साधना का आधार साधक का अपना ही प्रतिबिंब है। अर्थात् साधक अपने बाहरी रूप को ही एक प्रतीक बनाकर उसके माध्यम से ध्यान को क्रमशः सूक्ष्म और अंतर्मुख करने का अभ्यास करता है।इस साधना का उद्देश्य केवल अपने प्रतिबिंब को देखना नहीं है। ग्रंथ में इसका एक क्रम दिया गया है प्रतीक का दर्शन, उसका आकाश में अनुभव, निरंतर अभ्यास, हृदयाकाश में उसके भान की अवस्था ...और पढ़े

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प्रतीकोपासना - भाग 2

प्रतीकोपासना :- इंद्रिय-निरोध से आत्मज्योति तकभाग २ : भीतर की ओर मुड़ती साधनाप्रतीकोपासना के पहले चरण में साधक अपने प्रतिबिंब को स्वप्रतीक बनाकर उसका अभ्यास करता है। पहले अपने प्रतिबिंब का दर्शन, फिर आकाश में उसी प्रतीक को देखने का अभ्यास और निरंतर साधना के द्वारा हृदयाकाश में स्वप्रतीक के भान की बात कही गई है। इस प्रकार साधना धीरे-धीरे बाहरी दृश्य से भीतर के अनुभव की ओर बढ़ती है।अब शिवसंहिता इसी साधना को एक और गहरे स्तर पर ले जाती है। यहाँ साधक को अपनी इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर स्थिर करने की एक ...और पढ़े

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