जन्म से कॉलेज तक मेरा नाम अंकित है। मैं उत्तराखंड के चमोली जिले के एक छोटे से गाँव, त्रिकोट, का रहने वाला हूँ। मेरा जन्म 29 दिसंबर को मेरे मामा के गाँव में हुआ था। मेरे नाम की भी अपनी एक खास कहानी है—मेरा नाम मेरी नानी जी ने रखा था। शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह छोटा-सा नाम आगे चलकर मेरी जिंदगी की इतनी सारी कहानियों का हिस्सा बनेगा।

Full Novel

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अभी कहानी बाकी है - 1

जन्म से कॉलेज तकमेरा नाम अंकित है। मैं उत्तराखंड के चमोली जिले के एक छोटे से गाँव, त्रिकोट, का वाला हूँ।मेरा जन्म 29 दिसंबर को मेरे मामा के गाँव में हुआ था। मेरे नाम की भी अपनी एक खास कहानी है—मेरा नाम मेरी नानी जी ने रखा था। शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह छोटा-सा नाम आगे चलकर मेरी जिंदगी की इतनी सारी कहानियों का हिस्सा बनेगा।मैं किसी बड़े शहर से नहीं आया हूँ। मेरी पहचान एक छोटे से गाँव से है, जहाँ रिश्ते, परिवार और अपनेपन की अपनी अलग अहमियत होती है।मेरी जिंदगी भी ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 2

नई जगह, नया जीवनआखिरकार मैं अपनी दादी के रिश्तेदारों के घर रहने चला गया।शुरुआत में सब कुछ थोड़ा नया-नया लग रहा था।नया घर, नए लोग और नया माहौल…लेकिन धीरे-धीरे समय बीतने लगा और मैं भी उस घर के माहौल में ढलता चला गया।मैं वहाँ सिर्फ रहने वाला नहीं था, बल्कि घर के कामों में भी हाथ बँटाता था।कभी घास लाने जाना,कभी पेड़ काटने का काम,तो कभी घर के दूसरे छोटे-बड़े काम…जो काम सामने आता, मैं अपनी तरफ से करने की कोशिश करता।उस समय शायद मुझे ये सब बहुत सामान्य लगता था।मैं बस यही सोचता था कि जिस घर में ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 3

उसी समय मैं पहली बार रुद्रनाथ मंदिर की यात्रा पर गया।करीब 25 किलोमीटर की पैदल यात्रा, पाँच दोस्त और तीन दिन का सफर।लेकिन वह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी।रास्ते में पहाड़ों के बदलते रंग, जंगल, ठंडी हवा, चढ़ाई, थकान और दोस्तों की मस्ती—सब कुछ अपने आप में एक अलग अनुभव था।रुद्रनाथ की यात्रा का वह नजारा आज भी याद आता है तो लगता है कि उसे शब्दों में पूरी तरह बता पाना शायद संभव ही नहीं।कहीं प्रकृति इतनी खूबसूरत लगती थी कि कदम रुक जाते थे और कहीं रास्ता इतना कठिन होता था कि लगता था अब आगे नहीं ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 4

अब समय वो आ गया था, जब मेरी जिंदगी में एक ऐसे इंसान की एंट्री होने वाली थी, जिसने चलकर मेरी जिंदगी को एक अलग ही मोड़ दे दिया।उस इंसान के आने से पहले तक मुझे लगता था कि मैं अपनी जिंदगी को समझने लगा हूँ। गाँव, मेहनत, शेयर मार्केट, YouTube—हर चीज में कुछ नया करने की कोशिश कर रहा था।लेकिन मुझे कहाँ पता था कि अब मेरी जिंदगी में कोई ऐसा आने वाला है, जो मुझे मेरी औकात का एहसास कराने वाला है।वो इंसान मेरी जिंदगी में आया तो शुरुआत में मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि इसका ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 5

गुस्सा चार मिनट का था, लेकिन उसके निशान कई सालों के रह गए।एक साल बाद हमारे रिश्ते को आखिरकार का नाम मिल गया। तब तक सब कुछ ठीक था। करीब पाँच-छह महीने तक हमारा रिश्ता बहुत अच्छे से चला। मुझे लगता था कि अब शायद यही रिश्ता हमेशा ऐसा ही रहेगा।लेकिन फिर धीरे-धीरे हमारे बीच एक तीसरा इंसान आ गया। उसे “बेस्ट फ्रेंड” का नाम मिला। उसके बाद शायद तीसरे के बाद चौथा, चौथे के बाद पाँचवाँ… और पता ही नहीं चला कि हमारे दो लोगों के रिश्ते में कितने लोग शामिल हो गए।शायद यही वह चीज थी जो ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 6

नौकरी ढूँढनी है और किसी भी तरह अपने पैरों पर खड़ा होना है।देहरादून पहुँचे तो असली परीक्षा शुरू हुई।तभी अपनी ही कही हुई एक बात याद आई थी—“अपने हमेशा अपने नहीं होते, कई बार पराए ही अपने बन जाते हैं।”एक दोस्त ने हमें अपने कमरे पर बुलाया। खाना खिलाया और रहने की जगह दी। उस समय वह मदद छोटी नहीं थी, क्योंकि हमारे पास सच में कोई दूसरा सहारा नहीं था।अगले तीन दिन हम सुबह निकलते और शाम तक नौकरी की तलाश में इधर-उधर भटकते रहते।हर दिन उम्मीद लेकर निकलते और खाली हाथ लौट आते।तीसरे दिन तक शरीर से ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 7

बहन की शादी को अब करीब दो महीने ही बचे थे। शादी की शॉपिंग के लिए मैंने अपनी बहन देहरादून बुला लिया। शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं और देखते ही देखते कपड़ों से लेकर बाकी जरूरी सामान तक, हमने एक-एक करके सारे काम पूरे कर लिए।फिर वह दिन भी आ गया, जिसका घर में सभी को इंतजार था। हम दोनों देहरादून से घर की तरफ चल दिए। बहन की शादी बड़ी धूमधाम से हुई। घर में खुशियों का माहौल था, रिश्तेदारों की भीड़ थी और कई दिनों तक घर हंसी-खुशी से भरा रहा।मैं भी करीब तीन हफ्ते घर पर ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 8

घूमने का शौकआज भी वैसा ही था। बस फर्क इतना था कि अब जिंदगी में नौकरी और जिम्मेदारियाँ भी गई थीं।देहरादून में रहते हुए मैं कई जगह घूमने गया—एफआरआई, डाट काली मंदिर, ऋषिकेश, गंगा आरती और भी न जाने कितनी जगहें। दोस्तों के साथ घूमना भी अच्छा लगता था, लेकिन इन सब जगहों में मुझे सबसे ज्यादा पसंद एफआरआई था।शायद इसलिए क्योंकि वहाँ जाकर मुझे गाँव जैसा सुकून मिलता था। चारों तरफ हरियाली, शांत माहौल और प्रकृति के करीब होने का एहसास… वहाँ पहुँचते ही मन कुछ देर के लिए अपनी सारी परेशानियाँ भूल जाता था।एफआरआई की एक खास ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 9

सब पर भरोसा करो, लेकिन पहली बार कोई भरोसा तोड़ दे तो फिर दोबारा भरोसा मत करो।आज भी मैं नियम पर चलता हूँ।मैं अपनी गलतियों से भागता नहीं हूँ। अगर गलती मेरी हो तो मैं अपनी गर्दन झुका दूँगा, अपनी गलती स्वीकार कर लूँगा और जरूरत पड़ी तो माफी भी माँग लूँगा।लेकिन अगर गलती मेरी नहीं है, तो फिर मैं गलत को सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं करूँगा कि सामने वाला अपना है।शायद यही मेरी एक खासियत है।मैं रिश्तों को दिल से निभाता हूँ, लेकिन जब कोई बार-बार मेरे भरोसे को तोड़ता है, तो फिर मैं उसे अपनी जिंदगी में ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 10

माँ के सामने फिर बच्चा बन जाता हूँ,दादी की डांट पर मुस्कुरा देता हूँ,बहनों के साथ हँसता हूँ,और रात अपनी बिल्ली को साथ लेकर सो जाता हूँ।दुनिया ने मुझे चाहे जितना दुनियादार बना दिया हो…घर पहुँचते ही मैं फिर वही पुराना वाला मैं बन जाता हूँ। ️जिंदगी ने अपने सबक तो मुझे दे ही दिए थे, लेकिन अब इंसानों की पहचान भी धीरे-धीरे होने लगी थी। उन सारी घटनाओं को घटते-घटते करीब दो साल हो चुके थे। ये दो साल मेरे लिए सिर्फ समय का गुजरना नहीं था, बल्कि मेरी जिंदगी का ऐसा दौर था, जिसमें मैंने बहुत कुछ ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 11

वो दोस्त, जिसने मुझ पर आंख बंद करके भरोसा कियाइन्हीं दो सालों के बीच मेरी जिंदगी में एक ऐसा भी था, जिसके साथ मेरी दोस्ती धीरे-धीरे इतनी गहरी हो चुकी थी कि अब उसे सिर्फ दोस्त कहना शायद कम लगता था।वो मेरे साथ Jio में काम करता था, लेकिन हमारी दोस्ती नौकरी की वजह से नहीं बनी थी। हमारी दोस्ती उससे भी पुरानी थी। समय के साथ हम दोनों ने एक-दूसरे को इतना करीब से जाना कि अब एक-दूसरे के सामने कुछ छिपा रह ही नहीं गया था।फिर एक दिन अचानक उसे कुछ हो गया और उसे अस्पताल जाना ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 12

जिसे अपना मान लिया, उसके लिए सब कुछसमय के साथ मैं ऐसा इंसान बन चुका था, जिसके लिए रिश्तों मतलब ही बदल गया था। मुझे अब किसी रिश्ते से पैसा, फायदा या कोई बड़ी उम्मीद नहीं थी।मेरी दुनिया बहुत छोटी थी, लेकिन उसमें अपनापन बहुत बड़ा था।जो इंसान मुझे दिल से अपना मान लेता, उसके लिए मैं अपनी जान तक लगाने को तैयार रहता। शायद मैं रिश्तों में जरूरत से ज्यादा सच्चा था। सामने वाला मुझे कितना अपना मानता है, ये सोचने से पहले मैं उसे अपना मान लेता था।मुझे बदले में आखिर चाहिए ही क्या था?बस थोड़ी-सी खुशी...कोई ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 13

बचपन से ही मेरे अंदर एक आदत थी—और शायद आज भी है। अगर किसी चीज़ के लिए मैंने एक “नहीं” बोल दिया, तो फिर चाहे सामने वाला कितना भी समझाए, मनाए या प्यार से बुलाए, मैं दोबारा उस काम को करने के लिए तैयार नहीं होता।बचपन में तो मेरी इस आदत का मुझे खुद भी इतना अंदाज़ा नहीं था। मुझे बस इतना पता था कि जो बात दिल पर लग गई, फिर वो बात आसानी से नहीं निकलती।उन दिनों मैं पापा के साथ रहता था। पापा अपनी दुकान पर चले जाते थे और रविवार के दिन मेरी हालत ऐसी ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 14

मेरी बहुत सी आदतें हैं…कुछ ऐसी हैं जिन्हें मैं खुद भी खराब मानता हूँ, और कुछ ऐसी हैं जिनके शायद मैं खुद को अधूरा समझूँगा।अगर मेरी जिंदगी को ध्यान से देखा जाए तो शायद आपको लगेगा कि मैं भी बड़ा अजीब इंसान हूँ। कभी बहुत अच्छा, कभी बहुत जिद्दी, कभी बहुत बातूनी, कभी बच्चों जैसा और कभी-कभी इतना शांत कि सामने वाला सोचने लगे कि आखिर इसके दिमाग में चल क्या रहा है।लेकिन सच कहूँ तो…मैं जैसा हूँ, वैसा ही हूँ।मेरी कुछ खराब आदतों की शुरुआत मेरे गुस्से से होती है।मुझे गुस्सा थोड़ा जल्दी आ जाता है। कई बार ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 15

मेरे परिवार से भी मेरा रिश्ता कुछ ऐसा ही है।कभी बहन का फोन आ जाता है, कभी मम्मी का।बात रोज़ नहीं होती।शायद हफ्ते में एक बार।लेकिन जब बात होती है तो पता नहीं कैसे समय निकल जाता है।कभी आधा घंटा…कभी एक घंटा…और अगर बात करने वाला भी मेरी तरह बातूनी हो तो फिर फोन रखने का सवाल ही नहीं।एक बात से दूसरी बात निकलती है।दूसरी से तीसरी।फिर अचानक पुरानी कोई बात याद आ जाती है।फिर उसके ऊपर चर्चा।फिर हँसी-मजाक।और आखिर में कोई कहता है—“अच्छा चलो, अब फोन रखते हैं।”और उसके बाद भी पाँच मिनट की बात बाकी।शायद इसी वजह ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 16

इंसानियत का हिसाबलोगों की सोच और मेरी सोच में शायद जमीन-आसमान का फर्क है।मैं अक्सर सोचता हूँ कि अगर लोगों में से 5 लोग भी ऐसे हों जो दूसरों का भला देखकर खुश होते हों, तो शायद दुनिया थोड़ी बेहतर होती। लेकिन कई बार जिंदगी ने मुझे ऐसा महसूस कराया कि ज्यादातर लोग अपने फायदे से आगे सोच ही नहीं पाते।मैं यह नहीं कहता कि हर इंसान बुरा है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। लेकिन मैंने अपनी जिंदगी में जितने लोगों को करीब से देखा, उनमें से बहुत कम ऐसे मिले जिन्होंने बिना किसी मतलब के किसी के लिए कुछ ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 17

एक छोटी-सी गलती और जिंदगी की बड़ी सीख ️जिंदगी में ऐसे बहुत से किस्से हैं, जिनसे मैं हर रोज न कुछ सीखता रहता हूं। आज उन्हीं किस्सों में से एक किस्सा याद आ गया।एक बार ऑफिस में मैं और मेरे मैनेजर दोनों अपना-अपना काम कर रहे थे। मैं कुछ फाइलें भर रहा था और सर लैपटॉप पर सैलरी से जुड़ा कुछ काम कर रहे थे।शाम को रोज की तरह सर ने लैपटॉप बंद किया और घर जाने लगे। जाते समय उन्होंने मुझसे कहा—"देख लेना ऑफिस, मैं घर जा रहा हूं।"मेरे स्टाफ में कुछ लड़के ऐसे हैं जिनके साथ मेरी ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 18

गुस्सा मेरा सबसे बड़ा दुश्मनलड़ाई-झगड़े में मैं हमेशा समानता रखने की कोशिश करता हूं।मेरी लाइन में रोज कोई न छोटा-मोटा झगड़ा होता ही रहता है। कभी स्टाफ आपस में उलझ जाता है, कभी स्टाफ और कस्टमर के बीच बात बिगड़ जाती है।जहां तक बात आपस की हो, मैं कोशिश करता हूं कि मामला वहीं खत्म हो जाए। मेरे पास कोई कस्टमर की शिकायत लेकर आता है तो पहले मैं उसकी बात सुनता हूं और अगर मेरी समझ में मामला सुलझने वाला होता है तो वहीं सॉल्व कर देता हूं।लेकिन अगर सामने वाला समझने वाला नहीं है तो मैं भी ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 19

किताबों के पन्नों में मेरा एक अलग संसारमुझे पढ़ने का शौक बचपन से ही कुछ अलग तरह का रहा जब बाकी लोग अपना खाली समय किसी और चीज़ में बिताते हैं, मैं अक्सर किसी किताब के पन्नों में खो जाता हूँ। मेरे लिए किताब सिर्फ कागज़ के कुछ पन्ने नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी दुनिया हैं जहाँ मैं कुछ देर के लिए अपनी जिंदगी, अपनी परेशानियों और अपने सवालों से दूर चला जाता हूँ।मैंने अब तक “मुसाफिर कैफे”, “यार पापा”, “गोदान”, “रेत की मछली”, “कहीं दूर” और “प्यार है तुमसे” जैसी बहुत सी किताबें पढ़ी हैं। कुछ किताबें अभी ...और पढ़े

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अभी कहानी बाकी है - 20

मेरे अंदर अच्छी बातें कम और बुरी बातें ज़्यादा हैं — ऐसा मुझे क्यों लगता हैकई बार मैं अपने में सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि मेरे अंदर अच्छी बातें कम हैं और बुरी बातें ज़्यादा। मुझे जल्दी गुस्सा आता है, मैं कई बातों को दिल पर ले लेता हूँ और खासकर जब बात मेरे घरवालों तक पहुँचती है, तब मेरे अंदर का इंसान बदल जाता है। कोई मेरे बारे में कुछ कह दे, मैं शायद उतना बुरा न मानूँ, लेकिन अगर किसी ने मेरे घरवालों की गलती निकाली और वह बात मेरे कानों तक पहुँच गई, तो ...और पढ़े

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