कहते हैं कि अंधी आँखें दुनिया का कोई रंग नहीं देख सकतीं। न उजाला, न कफ़न का सफेद रंग और न ही हाथों पर लगा खून का लाल धब्बा। लेकिन क्या वाकई रोशनी के चले जाने से सच भी अंधा हो जाता है? या फिर कभी-कभी आँखें न होना एक वरदान बन जाता है, क्योंकि तब आप इंसानों के चेहरों को नहीं, बल्कि उनके झूठ की गंध और उनके कदमों के फरेब को सुनने लगते हैं।
धुंध के पीछे - 1
कहते हैं कि अंधी आँखें दुनिया का कोई रंग नहीं देख सकतीं। न उजाला, न कफ़न का सफेद रंग न ही हाथों पर लगा खून का लाल धब्बा। लेकिन क्या वाकई रोशनी के चले जाने से सच भी अंधा हो जाता है? या फिर कभी-कभी आँखें न होना एक वरदान बन जाता है, क्योंकि तब आप इंसानों के चेहरों को नहीं, बल्कि उनके झूठ की गंध और उनके कदमों के फरेब को सुनने लगते हैं।यह कहानी है मुस्कान की। एक ऐसी लड़की जिसकी दुनिया सिर्फ सन्नाटों, आहटों और खुशबुओं के सहारे चलती थी। उसे नाज़ था अपनी इस महफूज़ ...और पढ़े