लोग कहते हैं कि बड़े शहर में आकर गाँव का इंसान बदल जाता है, पर कोई यह नहीं पूछता कि उस शहर की कांच की दीवारों ने एक जीते-जागते इंसान को अंदर से कैसे तोड़ दिया।सच कहूँ तो इस बड़े शहर की ये जो ऊँची-ऊँची कांच की इमारतें हैं ना, ये दूर से देखने में जितनी सुंदर लगती हैं, पास आने पर उतनी ही बेदर्द महसूस होती हैं। जब दोपहर की तेज़ धूप इन कांच की दीवारों पर पड़ती है, तो उसकी चकाचौंध सीधे आँखों में चुभती है, मानो चीख-चीख कर कह रही हो कि 'यह जगह तुम्हारे जैसे छोटे लोगों के लिए नहीं है।' मैं ठहरा एक बहुत ही पिछड़े और छोटे से गाँव का रहने वाला सीधा-साधा लड़का।
पीछे छूटा इंसान- भाग 1
लोग कहते हैं कि बड़े शहर में आकर गाँव का इंसान बदल जाता है, पर कोई यह नहीं पूछता उस शहर की कांच की दीवारों ने एक जीते-जागते इंसान को अंदर से कैसे तोड़ दिया।सच कहूँ तो इस बड़े शहर की ये जो ऊँची-ऊँची कांच की इमारतें हैं ना, ये दूर से देखने में जितनी सुंदर लगती हैं, पास आने पर उतनी ही बेदर्द महसूस होती हैं। जब दोपहर की तेज़ धूप इन कांच की दीवारों पर पड़ती है, तो उसकी चकाचौंध सीधे आँखों में चुभती है, मानो चीख-चीख कर कह रही हो कि 'यह जगह तुम्हारे जैसे छोटे ...और पढ़े
पीछे छूटा इंसान- भाग 2
उस छोटे से, बदबूदार कमरे में पसरे सन्नाटे को फाड़ती हुई एक नीली रोशनी चमकी।मेरे हाथ में थमा वह सौ रुपये का पुराना चाइनीज़ मोबाइल, जिसकी स्क्रीन पर मकड़ी के जाले की तरह दरारें पड़ी थीं, अचानक एक तेज़ नीली रोशनी से नहा गया। मेरी आँखें चौंधिया गईं। पसीने से लथपथ उँगलियों में फोन थरथरा रहा था। कलेजा इतनी ज़ोर से धड़क रहा था मानो अभी पसली तोड़कर बाहर आ गिरेगा।मैंने डरते-डरते, आँखों को थोड़ा मूँदकर उस टूटी स्क्रीन पर नज़र डाली। नीली रोशनी के बीचो-बीच काले रंग के शब्द किसी जादुई कलम की तरह खुद-ब-खुद छप रहे थे:"त्रिंयाश, ...और पढ़े