क्या कोई इंसान जानबूझकर अपने हंसते-खेलते जीवन को आग लगा सकता है? शायद नहीं। लेकिन जब वक्त का पहिया उल्टा घूमता है, तो इंसान खुद अपने हाथों से अपनी तबाही का रास्ता चुन लेता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। मेरा नाम सुरेन्द्र है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे खुद पर यकीन नहीं होता कि मैं वही सुरेन्द्र हूँ जो कभी अपने माता-पिता की आँखों का तारा हुआ करता था। मैं एक सीधे-साधे मध्यमवर्गीय परिवार से आता हूँ। घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी, माता-पिता सरकारी नौकरी में थे और मुझे दुनिया की हर खुशी देना चाहते थे।
नशे से जिंदगी तक - एपिसोड 1
क्या कोई इंसान जानबूझकर अपने हंसते-खेलते जीवन को आग लगा सकता है? शायद नहीं। लेकिन जब वक्त का पहिया घूमता है, तो इंसान खुद अपने हाथों से अपनी तबाही का रास्ता चुन लेता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। मेरा नाम सुरेन्द्र है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे खुद पर यकीन नहीं होता कि मैं वही सुरेन्द्र हूँ जो कभी अपने माता-पिता की आँखों का तारा हुआ करता था। मैं एक सीधे-साधे मध्यमवर्गीय परिवार से आता हूँ। घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी, माता-पिता सरकारी नौकरी में थे और मुझे ...और पढ़े
नशे से जिंदगी तक - एपिसोड 2
एपिसोड 2: दलदल की पहली सीढ़ीराघव की जिंदगी में सब कुछ किसी सुनहरे सपने जैसा चल रहा था। कॉलेज टॉपर, शहर की सबसे बड़ी कंपनी का स्टार मैनेजर और मां का इकलौता लाडला—यही राघव की पहचान थी। लेकिन नियति के मन में कुछ और ही चल रहा था। उसे क्या पता था कि कामयाबी के इसी शिखर के पीछे एक ऐसा गहरा और काला दलदल छुपा हुआ है, जो उसे एक ही झटके में निगलने के लिए तैयार बैठा है। और उस दलदल का रास्ता खुला एक बेहद चमचमाती कॉर्पोरेट पार्टी से।कंपनी की सालाना कामयाबी का जश्न मनाने के ...और पढ़े