मैंने कब चाहा था कि उससे मिलूँ? और मिल ही गया था वह किसी यायावर की तरह एकाएक एक अनजाने सफ़र पर निकले हुए, तो मैंने कब यह भी कभी चाहा था कि वो मुझसे प्रेम करे? फिर भी प्रायः सुबह शाम बस यही सब सोचती रहती थी कि प्रेम पर संभवतः ना ही उसका और ना ही मेरा कोई जोर रहा हो! प्रेम होना था, सो हो गया। इस दुनिया में बहुतों सी चीजों के जैसे प्रेम करने और ना करने पर भी किसका बस चल पाया है? लेकिन यह कहाँ लिखा है कभी किसी ने कि एक की ही निभाने की जवाबदेही है, दूसरा पूर्णतः स्वच्छंद है?

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भंवर - भाग 1

़ं एक ़ंमैंने कब चाहा था कि उससे मिलूँ? औरमिल ही गया था वह किसी यायावर की तरह एकाएक अनजाने सफ़र पर निकले हुए, तो मैंने कब यह भी कभी चाहा था कि वो मुझसे प्रेम करे? फिर भी प्रायः सुबह शाम बस यही सब सोचती रहती थी कि प्रेम पर संभवतः ना ही उसका और ना ही मेरा कोई जोर रहा हो! प्रेम होना था, सो हो गया। इस दुनिया में बहुतों सी चीजों के जैसे प्रेम करने और ना करने पर भी किसका बस चल पाया है? ...और पढ़े

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