मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे प्रियांशी, कुछ हुआ तो नहीं मुझे ?" ​प्रियांशी बोली, "हाँ, इतना कुछ हो गया और आप पूछ रहे हैं कि क्या हुआ है? चलिए, अब अपनी सीट पर बैठिए।" ​मैं अपनी सीट की तरफ बढ़ने लगा। ​अंकिता ने पूछा, "भैया, अभी तक कहाँ थे? आपने इतनी देर कर दी!" ​मैंने कहा, "कहीं नहीं था, बस एक छोटी बच्ची मिल गई थी। उसी से बातें करते-करते समय का पता ही नहीं चला।" ​मैं उस लड़की की बातों में खोया हुआ था। वह नन्ही सी बच्ची थी और उसका कोई नहीं था। (मैंने उदास होकर कहा) ​अंकिता बोली, "तो फिर आप उसे अपने साथ क्यों नहीं ले आए? वह बच्ची भी हमारे साथ रह लेती।"

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सफ़र की रंगत - 1

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे प्रियांशी, कुछ हुआ तो नहीं मुझे ?"​प्रियांशी बोली, "हाँ, इतना कुछ हो गया और पूछ रहे हैं कि क्या हुआ है? चलिए, अब अपनी सीट पर बैठिए।"​मैं अपनी सीट की तरफ बढ़ने लगा।​अंकिता ने पूछा, "भैया, अभी तक कहाँ थे? आपने इतनी देर कर दी!"​मैंने कहा, "कहीं नहीं था, बस एक छोटी बच्ची मिल गई थी। उसी से बातें करते-करते समय का पता ही नहीं चला।"​मैं उस लड़की की बातों में खोया हुआ था। वह नन्ही सी बच्ची थी और उसका कोई नहीं था। (मैंने उदास होकर कहा)​अंकिता बोली, "तो फिर आप उसे अपने ...और पढ़े

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सफ़र की रंगत - 2

यात्री ने लंबी सांस खींचते हुए कहा,“देखो बेटी! यह नन्ही-सी बच्ची नशीले पदार्थ बेच तो रही है, लेकिन सिर्फ ताकि इसे एक वक्त की रोटी नसीब हो सके। इसे इस दलदल में धकेला गया है, इसने खुद यह रास्ता नहीं चुना।”मैंने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा,“बेशक! आपकी बात सही है। इस मासूम बच्ची को क्या मालूम कि वह जो बेच रही है, वह कितनी खतरनाक चीज है? उसने यह काम अपनी मर्जी से शुरू नहीं किया होगा, बल्कि किसी न किसी ने उसे जरिया बनाया होगा।”मेरी बात सुनकर प्रियांशी भी चुप न रह सकी, वह बोल पड़ी,“हाँ! यह ...और पढ़े

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