मन स्वयं आनंद है, स्वयं ब्रह्म है। बस उसे कर्ता से द्रष्टा बना दो—कर्ता नहीं बचता। यही द्रष्टा प्रेम है, आनंद है। तब मन स्थिर होता है, ऊर्जा बहती है—प्रेम, करुणा, दया, सेवा अपने आप प्रकट हो जाते हैं। सबसे बड़ा भय यही है— “अगर द्रष्टा बन गया तो संसार कहाँ जाएगा? मेरी हासिल की गई चीज़ें, मेरी इज्जत, मेरी जीत—इनका क्या होगा?” यही दुविधा बंधन है। मन का काम देखना और बोध कराना है, प्रतिक्रिया देना नहीं। बाक़ी काम बुद्धि, इंद्रियाँ और ऊर्जा करती हैं। मन स्थित होकर “मेरा” नहीं कहता।

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मै मन - 1

(जीवन का प्रत्यक्ष विज्ञान-दर्शन — वेदांत 2.0) अज्ञात अज्ञानी मन आनंद है, स्वयं ब्रह्म है। बस उसे कर्ता से द्रष्टा बना दो—कर्ता नहीं बचता। यही द्रष्टा प्रेम है, आनंद है। तब मन स्थिर होता है, ऊर्जा बहती है—प्रेम, करुणा, दया, सेवा अपने आप प्रकट हो जाते हैं। सबसे बड़ा भय यही है— “अगर द्रष्टा बन गया तो संसार कहाँ जाएगा? मेरी हासिल की गई चीज़ें, मेरी इज्जत, मेरी जीत—इनका क्या होगा?” यही दुविधा बंधन है। मन का काम देखना और बोध कराना है, प्रतिक्रिया देना नहीं। बाक़ी काम बुद्धि, ...और पढ़े

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मै मन - 2

अध्याय — जीवन को समझना नहीं, देखना क्यों जरूरी है? (जीवन का प्रत्यक्ष विज्ञान-दर्शन — वेदांत 2.0) मनुष्य जीवन समझना चाहता है।वह शब्द बनाता है, सिद्धांत बनाता है, दर्शन बनाता है। लेकिन समझ और देखना एक नहीं हैं। 1️⃣ समझ मन की प्रक्रिया है समझ विचार से बनती है। तुलना विश्लेषण निष्कर्ष इनसे मन को लगता है कि उसने जीवन पकड़ लिया। लेकिन यह केवल मानसिक नक्शा है — जीवन नहीं। 2️⃣ देखना प्रत्यक्ष अनुभव है देखना मतलब: बिना धारणा बिना निष्कर्ष बिना पहले से तय अर्थ जीवन को जैसे है वैसे देखना। यहाँ मन थोड़ी ...और पढ़े

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