कुछ यादें अचानक गायब नहीं होतीं। वे बस धीरे-धीरे पीछे खिसक जाती हैं, इस तरह कि हमें लगता है हमने ही उन्हें छोड़ दिया है। और जब वे लौटती हैं, तो शोर नहीं करतीं—बस चुपचाप अपनी जगह ले लेती हैं। मैं लिख रही थी। कमरा शांत था, इतना शांत कि पंखे की आवाज़ भी ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ लग रही थी। सामने मेज़ पर मेरी डायरी खुली पड़ी थी, जबकि मुझे पूरा यक़ीन था कि आज मैंने उसे खोला नहीं था। मैंने पन्ने पर नज़र डाली। लिखावट मेरी थी—अक्षरों का वही दबाव, वही हल्की तिरछी लकीरें। सब कुछ पहचाना-सा, फिर भी अजनबी।
जागती परछाई - 1-2
Chapter 1 : जो याद नहीं रहना चाहिए था कुछ यादें अचानक गायब नहीं होतीं।वे बस धीरे-धीरे पीछे खिसक हैं, इस तरह कि हमें लगता है हमने ही उन्हें छोड़ दिया है।और जब वे लौटती हैं, तो शोर नहीं करतीं—बस चुपचाप अपनी जगह ले लेती हैं।मैं लिख रही थी।कमरा शांत था, इतना शांत कि पंखे की आवाज़ भी ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ लग रही थी। सामने मेज़ पर मेरी डायरी खुली पड़ी थी, जबकि मुझे पूरा यक़ीन था कि आज मैंने उसे खोला नहीं था।मैंने पन्ने पर नज़र डाली।लिखावट मेरी थी—अक्षरों का वही दबाव, वही हल्की तिरछी लकीरें। सब क ...और पढ़े
जागती परछाई - 3
अगली सुबह मुझे सपने याद नहीं थे।बस एक अजीब-सा बोझ था, जैसे रात में कुछ अधूरा रह गया हो।डायरी नहीं खोली।कम से कम, मुझे ऐसा ही लगा।मैंने खुद से तय किया था कि आज उसे हाथ नहीं लगाऊँगी। कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनसे दूरी ही बेहतर लगती है, भले ही वो जवाब माँगते रहें।ऑफिस का दिन सामान्य था। मीटिंग्स, ई-मेल, वही रोज़ का शोर। मैं सब कर रही थी, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे दिमाग़ का एक हिस्सा कहीं और अटका हुआ है।दोपहर में कॉफी लेने गई तो रिसेप्शन पर एक पुरानी फाइल रखी दिखी। शायद किसी ...और पढ़े